सीने में जलन आंखों में तूफ़ान सा क्यूं है
इस शहर में हर शख्श परेशान सा क्यूं है

श्रद्धा जैन जी की भीगी गज़लें

ऐसा नहीं कि हमको मोहब्बत नहीं मिली
ऐसा नहीं कि हमको मोहब्बत नहीं मिली
थी जिसकी आरज़ू वही दौलत नहीं मिली

जो देख ले तो मुझसे करे रश्क ज़माना
सब कुछ मिला मगर वही क़िस्मत नहीं मिली

घर को सजाते कैसे,ये हर लड़की हैं सीखती
ज़िंदा रहे तो कैसे नसीहत नहीं मिली

किसको सुनाएँ क़िस्सा यहाँ, तेरे ज़ॉफ का
कहते हैं हम सभी से कि आदत नहीं मिली

देखा गिरा के खुद को ही क़दमों में उसके आज
“श्रद्धा” नसीब में तुझे क़ुरबत नहीं मिली
श्रद्धा जैन के ब्लॉग से साभार

2 comments:

Udan Tashtari said...

श्रृद्धा जी के यहाँ आज ही तो पढ़ी है.

advocate rashmi saurana said...

जो देख ले तो मुझसे करे रश्क ज़माना
सब कुछ मिला मगर वही क़िस्मत नहीं मिली
ye paktiya kuch khas pasand aai. likhate rhe.