श्रीमती शशिकला सेन की प्रथम कृति विमोचित


एक तुम्हारा अपनापन का विमोचन पर्व 14 जून को पाथेय ने सौंप दिया सुधि जन के हाथों में । १८ मार्च ५६ को जन्मीं शशिकला सेन के जीवन की यात्रा संघर्ष पूर्ण रही है किंतु उनकी ७३ कविताओं में स्व पीडा से ज़्यादा सामस्टिक पीडा का पल्लवन दिखाई देता है
उनकी पहली कविता "अंतस की पीर "में भ्रूण हत्या को निशाना बनाया तो अतुकांत अन्य कवितायेँ मनोभावों की वाहिका हैं । इसमें कोई शक नहीं कि राजेश पाठक "प्रवीण'' और सुमित्र जी द्वारा संचालित एवं संयोजित"पाथेय " ने कई रचनाकारों को प्रकाशित किया , किंतु मुझे इस बात का मलाल सदा ही रहा है कि पठनीयता एवम कृति चर्चा जैसी बात अब समाप्त हो गयी है इस शहर से । खैर ये अन्य सभी शहरों में ऐसा ही होता है.....!
यदि आप पाथेय की कोई कृति प्राप्त करना चाहते हैं तो सम्पर्क कीजिए
राजेश पाठक "प्रवीण"
157,फूटा ताल,जबलपुर
फोन: 9827262605

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कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!