22 फ़र॰ 2023

पाकिस्तान डायरी 2: अपनी सांस्कृतिक पहचान खो बैठा है पाकिस्तान..!


   बंटवारे के साथ भारत से पाकिस्तान गए लोग असमंजस की स्थिति में हैं। उनकी परंपराएं और उनकी सांस्कृतिक पहचान विलुप्त हो गई है। मुगल काल में और उसके बाद भी यहां तक कि आज भी उत्तर प्रदेश की अपनी एक सांस्कृतिक विरासत है। परंतु बंटवारे के बाद क्यों लोग पाकिस्तान गए उन्होंने अपनी पहचान को गवां दिया है।
वास्तव में ना तो उनकी पहचान कोई है और ना ही यह भारत से पृथक सांस्कृतिक लगे इसी का हिस्सा है बल्कि फर्क जरा सा है कि वह मानसिक रूप से अपने आप को इस संस्कृति से अर्थात भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं से पृथक करके रखते हैं। खास तौर पर पाकिस्तान के पंजाब सूबे में भारत से गए मुस्लिम परिवारों ने तो स्वयं को अरब से जुड़ा होना बताया जा रहा है। मुगलिया सल्तनत के जरिए विभाजित आबादी ने जो भी सीखा बस उसी भ्रम को लेकर वे स्वयं को पृथक संस्कृति का हिस्सा मानते रहे। परंतु वे यह भूल गए कि-" आक्रमणकारियों ने उनके पूर्वजों को भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं से अलग करके कुछ नई परंपराओं को समावेशित करके मुगल काल में एक नई व्यवस्था स्थापित की थी।"
    अधिकांश लोगों की पूजा प्रणाली में परिवर्तन हुआ है। परंतु सांस्कृतिक परंपराएं पूर्ववत नहीं है। और यदि है तो भी उसे वहां स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।
    अगर आप अध्ययन एवं पाकिस्तान की परिस्थितियों पर नजर डालें तो आपको पता चलेगा कि वह स्वयं को भारत से जोड़ने से अधिक अरब से जोड़ना पसंद करते हैं। यह समस्या पाकिस्तान के पंजाब सूबे में सबसे ज्यादा देखने को मिलती है।
    बलूचिस्तान गिलगित बालटिस्तान पीओके सिंध प्रांत भी सांस्कृतिक रूप से विविधताओं से भरा हुआ है। परंतु पाकिस्तान में विभाजन के बाद पहुंचे भारतवंशियों ने यह ऐलान सा कर रखा है कि पाकिस्तान वे  सिर्फ एक कल्चर को स्थापित करेंगे। जिसमें उनका रिश्ता अरब से साबित करने की व्यवस्था हो।
    इससे उलट भारत में संतूर का ही उदाहरण लीजिए जो ईरान से आई और भारत में बस गई। समोसा भारतीय प्रोडक्ट नहीं है यह भी एक अरबी व्यंजन है। पर भारत ने जहां से जो अच्छा मिला उसे स्वीकार ही नहीं बल्कि उसे इससे चाबी प्रदान की है।
   इससे उलट पाकिस्तान के हुक्मरान और पाकिस्तानी प्रशासन मेरी मुर्गी की ढेड़ टांग वाले सिद्धांत पर काम कर रहे हैं।
   भारतीय सामाजिक विचारक अथवा socio-economic विशेषज्ञ सभी रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर भरोसा करते हैं यह सनातन रूप से सिद्ध है। परंतु कुछ राष्ट्र ऐसे होते हैं जो रूढ़ीवादी व्यवस्था को अपनाते हैं और अपनी पहचान तक खो देते हैं। पाकिस्तान में भी यही कुछ हो रहा है। पाकिस्तानी जनता खास तौर पर पंजाब सूबे के लोग वहां के मूल निवासियों के प्रति न तो अच्छा व्यवहार रखते हैं और न ही उन्हें सांस्कृतिक अथवा धार्मिक रूप से महत्व देते हैं।
   पिछले 5 सालों में पाकिस्तान विविधता में एकात्मता की रोड में को अंगीकार न करने के परिणाम भली प्रकार भूख लिए हैं। इतना ही नहीं उसके भी पहले 1971 के पूर्व पश्चिम पाकिस्तान का बंगला देश के रूप में अभ्युदय केवल इसी कारण से हुआ है।
क्या अब भी ऐसा कुछ होने जा रहा है?
    जी हां अब भी कमोबेश वही स्थिति है। सिंधुदेश की मांग बलूचिस्तान की मांग पीओके तथा केपीके (खैबर पख्तूनख्वा) मैं पाकिस्तान विरोधी आंधियां रुकी नहीं है शायद तेज अवश्य हुई है। और यह पाकिस्तान के विखंडन के लिए निरापद रास्ता है।

17 फ़र॰ 2023

Pakistan Diary Part 01 : Uncivilized Nation Pakistan By Girish Billore

 
Those who expect secularism from India are requested to see this BBC's report. I have no regrets in calling Pakistan an "Most uncivilized nation of the south asia".  Those who say India is anti-minority rights speak what is being taught in the curriculum of Pakistani children. 
      The content of this BBC video is exposing Pakistan's rude education system. "How can this country, which proves India to be an enemy of Muslims and puts KAFIR words for Hindus, Sikhs and other non-Muslims in the minds of Pakistani children, can be called Pak i.e. holy? " 
      But now some Pakistani scholars, thoughtful people, and youth are beginning to recognize the political instability and anarchy of their country.  
        Pakistan was born out of the insistence of frustrated Mohammad Ali Jinnah. In such a situation, Pakistani policymakers were obliged to establish a wrong narrative about Hindus, Sikhs, Buddhists, and other non-Muslims.
        It is clear from this video that - "What is the social condition of Hindus in Pakistan ...!
        Kasab is a perfect example of this. Believe it or not, but I am sure the Pakistani people were completely misled for the last 75 years.  The revelation of Jinnah's act by lying and misleading the tribes of Baluchistan by swearing by the Quran is reaching us through social-media these days.
        Voices are now being raised in POK against the military administration of this country.  A former  officers  of the Pakistan Army, the so-called big people of Punjab Province have been exposed. The Pakistani people are no longer in a position to decide whether to listen to the old melody of Kashmir or fight for rice and bread..?" 
        Some people's guesses and the admission of an important former politician of the Pakistani administration suggest that now, Pakistan itself will liberate the Sindhudesh and Baluchistan. The people of POK are also united against the Pakistani army.  
        The manner in which the Pakistani Prime Minister was stopped from visiting Turkey after the Turkish-Syrian earthquake on 6 February 2023 is an example of the latest humiliation of a head of state. 
        The information received on February 15 shows that -" Clever- China also wants to distance itself from Pakistan. China has stopped those coming to China from Pakistan by closing the consulate.
     (Article continues. Please wait for the next part )



11 फ़र॰ 2023

“बलोच नागरिकों पर जुल्मो-सितम : पाकिस्तानी आर्मी पर आरोप लगाते एक्टिविस्ट”

 



बलूचिस्तान , पाकिस्तान  का पश्चिमी प्रान्त है जिसकी जनसंख्या 2 करोड़ के आसपास है.। बलूचिस्तान  ईरान के “सिस्तान एवं बलूचिस्तान”  तथा अफ़गानिस्तान के सटे हुए क्षेत्रों में बँटा हुआ है, बलोचिस्तान की राजधानी क्वेटा  है । यहाँ के लोगों की प्रमुख भाषा बलूच या बलूची के   है

1944 में बलूचिस्तान को स्वतन्त्रता देने के लिए ब्रिटिश इंडिया के एक जनरल मनी ने किया था .  पाकिस्तान के संस्थापक और प्रथम गवर्नर-जनरल मोहम्मद अली जिन्ना ने अंतिम स्वाधीन बलूच शासक मीर अहमद यार खान को पाकिस्तान में शामिल होने के समझौते पर कुरआन की क़सम देकर समझौते दस्तखत करने के लिए मजबूर किया था

यह कार्य 11 अगस्त 1947 को ब्रिटिश एवं यूरोपीयन देशों के  इशारे पर इसे जिन्ना ने पाकिस्तान में शामिल कर लिए गए बलूचिस्तान में 1970 के दशक से प्रो-आर्मी पाकिस्तानी डेमोक्रेसी एवं प्रशासनिक सामाजिक भेदभाव से दु:खी होकर बलोच-राष्ट्रवाद का अभ्युदय हुआ.इस प्रांत की जनसंख्या 78 लाख से अधिक एवं क्षेत्रफल  347190 वर्ग कि.मी.  (1,34,050 वर्गमील) है. जो पाकिस्तान का 44% भू-भाग है.

पाकिस्तान में बलूचिस्तान,सिंध,केपीके में मौजूद प्राकृतिक-संपदा एवं व्यापारिक दृष्टि से अन्य प्रान्तों से अपेक्षाकृत अधिक है परन्तु वहां की जनता की बदहाली  (स्वास्थ्य,शिक्षा, रोज़गार,) चिंताजनक है. सारी सुख-सुविधाएं  पाकिस्तानी पंजाब सूबे के पास जाती है.  बलूचिस्तान,सिंध,केपीके की जनता बेहद गरीब हैं. उनका जिनोसाईट किया जाता है. हाल ही में स्पेस में बलोचों नें बताया –“2 हज़ार महिलाओं को लापता कर दिया गया. ताहिर बलोच, हनी बलोच, मिराब्ल बलोच ने बताया कि-“हमारे पढ़ने लिखने वाले बच्चों, महिलाओं, तक  को कंसंट्रेशन-कैम्पस में रखा जा रहा है.”

2015 में  जिनेवा में आयोजित कांफ्रेंस जिसका विमर्श एजेंडा था  'बलूचिस्तान इन द शैडोज' , कांफ्रेंस का सारांश , "बलूचिस्तान में मानवाधिकारों की स्थिति बुरी तरह से खराब हो रही है। नागरिकों को सुरक्षा देने और कानून का राज कायम रखने के बुनियादी कर्तव्य में क्षेत्र की प्रांतीय एवं राष्ट्रीय सरकार नाकाम साबित हुई हैं वहां केवल सेना और उनकी बन्दूक वाला विधान चलता है.

  1948-49 से अब तक पाकिस्तान के विरुद्ध अब तक  ब्लोचों द्वारा पांच बार सशस्त्र क्रांतिकारी आन्दोलन की गई है. वर्तमान में बलोच-सिन्धुदेश-केपीके की आज़ादी के लिए सोशल-मीडिया पर अंतर्राष्ट्रीय-नैरेटिव लगातार जारी है.  

 मशहूर बलूच कार्यकर्ता नाएला कादरी ने एक प्रेस मीटिंग में कहा था कि- 'राजनैतिक, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष स्वतंत्रता संघर्ष को दबाने के लिए पाकिस्तान नरंसहार कर रहा है।' यह भी उनके द्वारा ही  कहा था-बीते एक दशक में 2 लाख बलूचियों को मार डाला गया है। 25000 मर्द और महिलाएं  लापता हुई हैं, जिनमें पाकिस्तान की सेना का हाथ रहा है। वो लोग नरंसहार की पहचान के लिए निर्धारित संयुक्त राष्ट्र के सभी आठ संकेतों पर अमल कर रहे हैं और इसमें अमानवीयकरण, ध्रुवीकरण, विनाश और अस्वीकार भी शामिल हैं

 

 


9 फ़र॰ 2023

हमने मानवता के तट पर दुश्मन का भी सम्मान किया: #टर्की_सहायता

हम ने मानवता के तट पर दुश्मन का भी सम्मान किया..!
( विशेष संदर्भ: टर्की सीरिया भूकंप और भारतीय संवेदनाएं)

   स्वर्गीय घनश्याम चौरसिया बादल ने  गीत रचा था जिसमें भरत की महिमा का गुणगान किया गया था। जो मुझे अब तक कंठस्थ है. बादल जी ने एक गीत लिखा था जब हम बहुत कम उम्र के हुआ करते थे शायद सन उन्नीस सौ 70 की बात है।
यहां तीर्थ तुल्य माता होती
पति को परमेश्वर होते हैं।
यह नदियों पेड़ पहाड़ों में
हर रूप में ईश्वर होते हैं।।
हम एकलव्य के वंशज हैं
दे काट अंगूठा दान किया।
हमने मानवता के तट पर
दुश्मन का भी सम्मान किया।।
दुनिया समझे पागलपन है
या समझे की नादानी है।।
यह देश हमारा है यारों
भारत की यही कहानी है।।
   इतना पुराना गीत आज तक जेहन में अक्सर गूंजता है । आपको स्मरण होगा कि जब सिकंदर बीमार हो गया था तो पोरस की  अनुमति से सिकंदर का इलाज भारत के एक वैद्य ने किया था।
आपको यह भी तो याद होगा न-" हिटलर के सताए मासूम यहूदी परिवार जब भारत आए तो भारत में उन्हें संरक्षण दिया आत्मसात किया।
   भारत के सूत्र वाक्य सनातन से उद्धृत किए जा सकते हैं। उनमें सर्व प्रचलित और हमेशा चर्चाओं में आता है यह वाक्य जिसमें लिखा है- "सर्वे जना सुखिनो भवंतु..!" और भारत विश्व बंधुत्व का सबसे बड़ा पोषक राष्ट्र है।
   यह सच है कि सांप्रदायिकता की मोह जाल में फंसा अर्दोगोन जिस पाकिस्तान का पक्का मित्र कहलाता है उसी पाकिस्तान के राजनेता और राजनीतिक प्रशासन टर्की के लिए कुछ भी ना कर सका। इधर ग्लोबमास्टर में भरकर सहायता सामग्री पहुंच चुकी। कहा जाता है कि पाकिस्तान ने अपने एयर स्पेस से ग्लोबमास्टर को रास्ता तक नहीं दिया।
   मानवता के बीए संघर्ष करने वाली प्रगतिशील आवाजें भी मौन है इन ज्ञानियों के मस्तिष्क में टर्की के हित के संबंध में ना तो कोई संवेदना है ना ही किसी तरह की रचना देखने को मिली। भारत का यह कदम बेशक मानवता की संरक्षण और वैश्विक एकात्मता के भावात्मक स्वरूप को रेखांकित करता है। मैं यहां किसी सत्ता का गुणगान नहीं कर रहा हूं परंतु वैचारिक रूप से मजबूत भारत को नमन करने का इससे बेहतर अवसर कब मिलेगा?
स्वेट मार्टिन ने अपनी पुस्तक अवसर बीता जाए  में कहा था -"अवसर नहीं जीतना चाहिए सही अवसर पर सही निर्णय लेना चाहिए। सही अवसर मिलते ही हमारे किए गए कार्य एक अच्छा परिणाम देते हैं। यह व्यक्तिगत रूप में जितना शेती सूत्र वाक्य है उतना ही राष्ट्रीय परिपेक्ष में महत्वपूर्ण साबित हो चुका है। जबलपुर के स्वर्गीय कवि की इन पंक्तियों को याद कर मेरे रोंगटे खड़े हो रहे हैं। साहित्यकार कितना विजनरी हो सकता है इसका अनुमान आप जरूर लगा लेंगे। साइबेरिया और रसिया के प्रवासी पंछियों को आपने हजारों हजार किलोमीटर की दूरी से भारत आते देखा ही है। वेल ग्वारीघाट मां नर्मदा के तट पर प्रयागराज की गंगा तट पर ही नहीं बल्कि भारत के कई और ऐसे स्थानों पर अपनी मातृभूमि में प्रतिकूल परिस्थिति उत्पन्न होने पर भारत की शरण लेते हैं। यहूदियों ने भी यही सोचा होगा। गुजरात के एक राजा ने जिन्हें संरक्षण दिया।
   अगर कहा जाए तो भारतीय राज्य व्यवस्था में संवेदना ओं का सम्मिश्रण टर्की को पहुंचाई गई सहायता के रूप में 2023 के दौर में दिखा।
भारत ने टर्की के लिए कितना किया और कितना किया जाना है यह एक अलग मुद्दा है इस पर बहुत से सवाल उठ भी सकते हैं परंतु पीड़ित मानवता के हित में काम करने वाला भारत वैश्विक धरातल पर दुश्मन देश मैं रहने वाले नागरिकों की रक्षा के लिए हमेशा से तत्पर रहता है।
    संप्रदायिकता से ऊपर मानवता का यह दृश्य देखकर मुझे विंस्टन चर्चिल एक राक्षस की तरह दिखाई दे रहे हैं जिन्होंने बंगाल के अकाल में ब्रिटिश कॉलोनी भारत के बारे में शर्मनाक टिप्पणियां की थी। वह हमारे पूज्य बापू से व्यक्तिगत घृणा करता था। ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल भारत के लिए महात्मा गांधी के लिए भारत के लोगों के लिए जो भाव रखता था वह जगजाहिर है।
विषय अंतर न होते हुए फिर से हम अपने मुद्दे पर आते हैं तो देखते हैं कि सिंधु जल बंटवारा संधि आपसे कुछ दिनों में समाप्त होने जा रही है। परंतु मानसिक रूप से दिवालिया पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की जनता के लिए सिंधु जल बंटवारे में तयशुदा शर्तें आंशिक फेरबदल के साथ यथावत रहेंगी ऐसा मेरा मानना है।

28 जन॰ 2023

सिंधु जल संधि: 90 दिन में समाप्त हो जाएगी..?

सिन्धु जल संधि, नदियों के जल के वितरण के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच हुई एक संधि है। इस सन्धि में विश्व बैंक (तत्कालीन 'पुनर्निर्माण और विकास हेतु अंतरराष्ट्रीय बैंक') ने मध्यस्थता की। इस संधि पर कराची में 19 सितंबर, 1960 को भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे।
इस समझौते के अनुसार, तीन "पूर्वी" नदियों — ब्यास, रावी और सतलुज — का नियंत्रण भारत को, तथा तीन "पश्चिमी" नदियों — सिंधु, चिनाब और झेलम — का नियंत्रण पाकिस्तान को दिया गया। हालाँकि अधिक विवादास्पद वे प्रावधान थे जिनके अनुसार जल का वितरण किस प्रकार किया जाएगा, यह निश्चित होना था। क्योंकि पाकिस्तान के नियंत्रण वाली नदियों का प्रवाह पहले भारत से होकर आता है, संधि के अनुसार भारत को उनका उपयोग सिंचाई, परिवहन और बिजली उत्पादन हेतु करने की अनुमति है। इस दौरान इन नदियों पर भारत द्वारा परियोजनाओं के निर्माण के लिए सटीक नियम निश्चित किए गए। यह संधि पाकिस्तान के डर का परिणाम थी कि नदियों का आधार (बेसिन) भारत में होने के कारण कहीं युद्ध आदि की स्थिति में उसे सूखे और अकाल आदि का सामना न करना पड़े।( विकिपीडिया से साभार)
उपरोक्त समस्त बिंदु पब्लिक डोमेन में उपलब्ध हैं। इधर भारत में सिंधु वॉटर ट्रीटी यानी सिंधु जल संधि पर पुनर्विचार करने का मन बना लिया है।
   भारत सरकार इस समझौते पर पुनर्विचार करना चाहती है। यह सही वक्त है जब पाकिस्तान को घुटनों पर लाया जा सके । परंतु इस समझौते का एक पक्ष है अंतरराष्ट्रीय बैंक जिसे हम विश्व बैंक के नाम से जानते हैं। यद्यपि इस समझौते रिव्यु के लिए समझौते में ही बिंदु मौजूद थे। भारत सरकार इस पर क्या निर्णय लेती है और किस तरह से पाकिस्तान को अपने आतंकी स्वरूप से बाहर आने की बात कहती है यह अलग बात है परंतु सिंधुदेश बलूचिस्तान केपीके और पश्तो डोगरा आबादी के अधिकांश लोग जाते हैं कि किसी भी स्थिति में एक बूंद भी पानी पाकिस्तान को ना दिया जाए।
   भारत एक मानवतावादी देश है शायद यह ना कर सकेगा। परंतु आजादी के चाहने वाले बलोच एक्टिविस्ट चाहते हैं कि यदि मानवता को आधार बनाया जाता है तो पाकिस्तान ने हजारों बच्चों को युवाओं को अगवा करके उनकी लाशें बाहर फेंक दी हैं ऐसे देश के लिए  मानवीयता के आधार पर छूट देना ठीक नहीं है। इस समय बलूचिस्तान एवं सिंधुदेश के एक्टिविस्ट खुलेआम कहते हैं कि-" भारत एक ऐसा राष्ट्र बन चुका है जिसकी आवाज विश्व समझ रहा है सुन रहा है, अगर भारत सिंधु देश एवं बलूचिस्तान केपीके एवं पश्तो लोगों के मानव अधिकार को संरक्षित करते हैं तो विश्व में एक नई मिसाल कायम होगी।
  पाकिस्तान की जर्जर हालत देखते हुए मदद करने की इच्छा तो सभी की होती है परंतु पाकिस्तान की चरित्रावली पर नजर डालें तो इस देश ने केवल टेररिस्ट पैदा किए हैं, दक्षिण एशिया में चीन की सहायता से अस्थिरता पैदा करने के लिए इस देश अर्थात पाकिस्तान ने सबसे आगे रहकर काम किया है।
   भारत के पास दो विकल्प हैं
[  ] समझौता रद्द कर दिया जाए
[  ] समझौता सिंधु देश तथा बलूचिस्तान केबीके पीओके के लोगों के मानव अधिकार की गारंटी मांग कर समझौता रिन्यू किया जाए
भारत दोनों ही एक्शन ले सकता है जैसा कि बलूचिस्तान के एक्टिविस्ट कहते हैं। दोनों की परिस्थिति में भारत का विश्व स्तर पर सम्मान बढ़ना स्वाभाविक है।
    इस संबंध में एक्टिविस्टों की सकारात्मक उम्मीद है।

( संधि के संबंध में विवरण विकिपीडिया से साभार)

1 जन॰ 2023

बलूचिस्तान सिंधुदेश मुक्ति आंदोलन आतंकी तालिबान से संबंधित नहीं है : रेज़ा बलोच


(बलोच सिंधुदेश मुक्ति आंदोलन ने पाकिस्तान में इन दिनों जोर पकड़ा   है। परंतु वे किसी भी सूरत में आतंकी संगठनों की मदद से किसी भी प्रकार के स्वतंत्रता आंदोलन को अपनी सहमति नहीं देते। यह आलेख पाकिस्तान की अस्थिर आर्थिक राजनीतिक एवं सामाजिक परिस्थितियों को एक्टिविस्ट के कथनों पर आधारित है।)

    यह सच है कि बलूचिस्तान सिंधुदेश अपनी आजादी के लिए संघर्षरत है। परंतु वह किसी भी स्थिति में आतंक के रास्ते पर चलना नहीं चाहते बावजूद इसके कि उनके परिवार के हजारों युवक पाकिस्तानी सेना की भेंट चढ़ चुके हैं। मुक्ति संघर्ष में जितने भी लोगों को लापता किया है मुक्ति संघर्ष के आंदोलनकारी मानते हैं कि इसकी जिम्मेदारी पाकिस्तानी आर्मी आई एस आई जैसे महकमों की है। वह पाकिस्तान के संपूर्ण विकास के लिए भी पहले से संघर्षरत थे जिसमें देश के सामूहिक विकास के संदर्भ में काम किए जाएं। पाक द्वारा हटाए गए कश्मीर के लोग तो अब बेहद खफा हो गए हैं। वह आदमी से बेइंतेहा नाराजगी व्यक्त करते हैं। पाकिस्तान की माली हालत देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि पाकिस्तान अब किसी भी तरह के संघर्ष से मुक्ति पाने में सक्षम है। दक्षिण एशिया में socio-economic डेवलपमेंट जरूरी फैक्टर बन चुका है। एक और बलूचिस्तान अपनी भूगर्भीय संपत्ति के विदोहन के लिए चीन के प्रयासों को घटक मानता है तो दूसरी ओर सिंधु देश के लोगों का मानना है कि वह जो भी कमाते हैं वह पाकिस्तान के दूसरे इलाकों के लिए खर्च कर दिया जाता है। जबकि पाक द्वारा हटाए गए कश्मीर के मामले में वहां के लोग जब भारत से पहुंच रही खबरों को देखते हैं तो वह अपनी कौम की बेहतरी के लिए अपने क्षेत्र के विकास के लिए अधीर हो रहे हैं। भारत के कश्मीर में विकास की जो पटकथा लिखी जा रही है और जितना दृश्य नजर आ रहा है उसे देखते ही पाक अधिकृत कश्मीर के लोगों के मन में एक तरह से अपने आप को ठगे जाने वाली भावना  तेजी से उभर रही है।
   दक्षिण एशिया के सभी देशों में अशांति का वातावरण निर्मित करने के लिए अधिकांश लोग चाइना के स्वार्थ को दोषी मानते हैं। बलूचिस्तान और पीओके के लोगों का कहना है कि-" हम अपने प्राकृतिक भूगर्भीय संसाधनों का उपयोग ना कर पाएंगे इसका लाभ चीन को मिलेगा ऐसी परियोजनाओं का सीधा सीधा असर पाकिस्तान की आर्थिक सामाजिक व्यवस्था पर पड़ना स्वाभाविक है। वह अपनी राजनीतिज्ञ एवं नीति निर्धारण करने वालों के चिंतन को देखकर हतप्रभ होते हैं। उनका कहना है कि हम-" अकूत प्राकृतिक संसाधनों भूगर्भीय संपदाओं का विदोहन करने के लिए हम कि जैसे राष्ट्र के समक्ष आत्मसमर्पण कर रहे हैं।"
   1971 की घटना के बाद से यह साफ तौर पर स्पष्ट है कि-" पाकिस्तान का अर्थ केबल पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र तक सीमित रह गया है। अधिकांश लोगों का मानना है कि सारा रिवेन्यू कलेक्शन पंजाब सूबे पर खर्च किया जाता है।
   रेज़ा शाह का कहना है कि-" हम आजादी की जंग जरूर लड़ रहे हैं लेकिन हमें तालिबानी तरीकों से आजादी नहीं चाहिए न ही हम उनके प्रति किसी भी तरह की सहमति रखते हैं।"
   दक्षिण एशियाई देशों में म्यांमार संघर्ष में चीन का सबसे बड़ा योगदान रहा है। पाकिस्तान से बड़ा सर दर्द दक्षिण एशिया के लिए चाइना के अलावा और कोई राष्ट्र नहीं है। श्रीलंका की स्थिति जगजाहिर है कर्जे में दबे हुए यह राष्ट्र कुल मिलाकर भारत से सपोर्ट चाहते हैं परंतु उनकी अपनी क्या मजबूरियां है ? इस बात का अंदाज लगाया जाना जरा मुश्किल हो रहा है।
   सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे  वीडियो यह बताते हैं कि-" पाकिस्तानी युवा और अधिकांश प्रौढ़ आबादी भारत के विकास और पाकिस्तान के पिछड़ेपन के कारणों की पतासाजी करते हैं।
  शिक्षा चिकित्सा जीवन यापन के लिए अर्थव्यवस्था उत्पादन रोजगार पाकिस्तान की सबसे बड़ी समस्या है। परंतु प्रो-आर्मी पाकिस्तानी प्रबंधन कुल मिलाकर इस संदर्भ में कितना सोच रहा है इसका अंदाज़ा आपको पाकिस्तान की स्थिति से लग  सकता है।
    इससे अलग भारत चाहता है कि-" दक्षिण एशिया में शांति और सामाजिक आर्थिक मजबूती स्थापित हो।"
   इस आर्टिकल के लिखे जाने के कुछ समय पूर्व पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिफ मीर मुनीर ने इस बात को स्वीकार लिया है कि-" पाकिस्तान एक जबरदस्त आर्थिक एवं आतंकी समस्याओं से सामना कर रहा है!"
   2022 के सप्ताहांत मुनीर  के इस बयान को लेकर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ खासे परेशान और हैरान जरूर होंगे। इस बयान का सीधा-सीधा अर्थ है कि-" पाकिस्तान का प्रशासन जो सेना गौरव प्रबंधित है वह वास्तविकता के बिल्कुल करीब है।"
   सैयद मुनीर सभी पक्षों से इस मसले पर एक रणनीति तैयार करने के इच्छुक भी हैं। इतिहास गवाह है कि-" जहां भी राजव्यवस्था जनता के प्रति संवेदनशील नहीं होती है वह व्यवस्था चाहे वह मोनार्की हो , डेमोक्रेसी हो अथवा आर्टिफिशियल डेमोक्रेटिक सिस्टम (कम्युनिज़्म) छिन्न-भिन्न होते डेट नहीं होती। ऐसी ही परिस्थितियां भारत के इर्द-गिर्द के राष्ट्रों में अर्थात दक्षिण एशियाई देशों में नजर आ रही है।
  कुल मिलाकर राष्ट्र के प्रबंधन का मुख्य लक्ष्य जन कल्याणकारी कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू करना है। परंतु जिन राष्ट्रों में ऐसा नहीं किया जाता वे राष्ट्र कालांतर में बेहद कष्ट में होते हैं कई बार तो ऐसे राष्ट्रों का अस्तित्व ही खत्म हो जाता है। अगर उन्हें सुधारने का तरीका सीखना चाहिए तो वह जापान से सीखने की कोशिश कर सकते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के समय जापान ने जिस तरह की वैश्विक दादागिरी की थी उसका परिणाम सबके सामने हिरोशिमा नागासाकी के रूप में आया यद्यपि यह मानवीय परिपेक्ष में बेहद शर्मनाक घटना है,  फिर भी राष्ट्रों को जनकल्याणकारी राष्ट्र बनने की तरफ अपने प्रयास निरंतर जारी रखनी चाहिए। आपको स्मरण ही होगा कि वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने खुले शब्दों में रसिया को यह बताते हुए पूरे विश्व को संदेश दिया कि-" यह समय युद्ध का नहीं है।"
   आज से कई वर्ष पूर्व ही भारत ने अपनी मंशा स्पष्ट कर दी थी और उस पर आज भी स्थिर है। भारत अच्छे आतंकवाद और बुरे आतंकवाद को भली प्रकार विश्लेषक कर चुका है। भारत का स्पष्ट मानना है कि टेररिज्म किसी भी सूरत में कल्याणकारी राष्ट्र का आधार नहीं हो सकता। स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत राष्ट्रों के लोग अपने आंदोलन को आतंक से जोड़कर नहीं रखना चाहते जैसा बलोच और सिंधुदेश के एक्टिविस्ट स्पष्ट कर चुके हैं।
( लेखक के रूप में मैं दक्षिण एशियाई सामाजिक आर्थिक संदर्भ पर अपने आर्टिकल अपने ब्लॉग पर लिखत हूं। यह राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पॉलिटिकल उद्देश्य से नहीं लिखे जाते बल्कि दक्षिण भारतीय आर्थिक परिस्थितियों के संदर्भों में लिखे गए हैं।)

30 दिस॰ 2022

10 करोड़ पंजाबी पाकिस्तानियों के लिए सिंध बलूचिस्तान पख्तून में लूट खसोट जारी है :नादिर बलोच



जहां एक और पाकिस्तान एक ऐसी सिचुएशन में आ खड़ा है, जहां के परिंदे भी दाने-दाने को मोहताज हैं, वे  अपना पेट नहीं भर सकते वहीं दूसरी ओर बलोच एक्टिविस्ट अब पूरी तैयारी से हैं कि वह आजाद सेक्युलर राष्ट्र की स्थापना करें। 
   बलोच आंदोलन अब वैचारिक धरातल से मजबूत होता नजर आ रहा है। स्पेस पर आयोजित वॉइस कॉन्फ्रेंस में एडमिन नादिर बलोच कहते हैं कि- सिर्फ 10 करोड़ उन लोगों को पढ़ने की जद्दोजहद में पूरा देश यानी पाकिस्तान लगा हुआ है । बलोच एक्टिविस्ट एक ऐसी सरकार की स्थापना करना चाहते हैं जो  राष्ट्रवाद आधारित हो परंतु पंथ-निरपेक्ष रहे।
   चीन पाकिस्तान कॉरिडोर ग्वादर के मसले का प्रारंभ से ही विरोध करने वाले बलूची नागरिक स्पेस पर मुखर थे। चीन के प्रति बलूचिस्तान के नागरिकों की अवधारणा विश्व के सभी लोगों की तरह ही है। वे जानते हैं कि चीन सीपैक के बहाने धीरे-धीरे पाकिस्तान पर अपना अधिकार जमा लेगा। 
     स्पेस में अधिकांश लोग पाकिस्तान में चीनी   हस्तक्षेप को गैरज़रूरी मानते हैं और वे चाहते हैं कि- यह परियोजना तुरंत समाप्त हो। उन्हें यह भय भी है कि कहीं ऐसा न हो कि -"कंगाल होता पाकिस्तान कहीं उनके अस्तित्व को चीन के अस्तित्व में तब्दील न कर दें।"
   इन दिनों खस्ताहाल बिकाऊ देश पाकिस्तान बलोच सिंध आंदोलन से परेशान है, इसी कारण से इन दोनों जगहों (सिंध/ब्लोचिस्तान) से राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर लोगों को गायब कर दिया जाता है, वहीं दूसरी ओर पाक द्वारा हटाए गए कश्मीर की आवाम को भी समझ में आ चुका है कि किस तरह से पाकिस्तान ने उनके साथ नाइंसाफी गैर बराबरी का वातावरण तैयार किया है। 
   मित्रों बलूचिस्तान अब आजादी के लगभग करीब है लेकिन विश्व बिरादरी पाकिस्तान पर ऐसा कोई जादुई मंत्र नहीं डाल पाई है जिससे मानव अधिकार की सुरक्षा और लोगों की जान माल की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके। Socio-economic परिस्थितियों पर विचार किया जाए तो पाकिस्तान एक ऐसा मुल्क बन गया है जो केवल  बात की पुष्टि करता है कि पाकिस्तान - "एक खास सूबे के लिए एक खास सूबे के द्वारा स्थापित व्यवस्था है।"
    यह खास सूबा है -पंजाब का पाकिस्तानी प्रांत।
   पूरी दुनिया जानती है कि ग्वादर परियोजना का असल मकसद पाकिस्तान की सबसे कीमती जमीन का उपयोग कर चीन की विस्तार वादी नीतियों को सफल बनाना। इस प्रक्रिया में पाकिस्तान के तमाम सियासी लोग बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। स्पेस में सभी लोगों का मानना था कि पाकिस्तान बलूच लोगों के प्रति द्वेष भाव रखता है और वह ब्लूज की सिंध की कमाई का अधिकतम प्रतिशत पंजाब सूबे पर खर्च करना चाहता है, और करता भी है। पाकिस्तान के 1971 के विखंडन को देखा जाए तो पाकिस्तान ने काली रंग वाली बंगाली जमात को कमजोर समझा था। जैसा कि हम सब जानते हैं कि किसी को सियासत में कमजोर नहीं समझना चाहिए, पाकिस्तान 1971 की जंग हार गया और मुजीब उर रहमान का सोनार बांग्ला स्वतंत्रता की सांस लेने लगा।
वर्तमान परिस्थितियों में अब पाकिस्तान के भीतर आवाम क्रांतिकारी हो चुकी है। केवल सिंध और बलोच ही नहीं वरन पाकिस्तान की कई हिस्सों जैसे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर, आदि।
   कुल मिलाकर पाकिस्तान अब अपने 75 साल पुराने पापों रिटर्न गिफ्ट प्राप्त करने की स्थिति में आ चुका है।
बलोच एक्टिविस्ट सेक्युलर राष्ट्र की स्थापना करना चाहते हैं। इस पर से पता चलता है कि वह पाकिस्तान की तरह धर्मांध शासन व्यवस्था पर सहमत नहीं है पुरातन पंथी रूढ़ीवादी सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था से सहमत नहीं है। वह पूरी तरह से वामपंथ को भी अस्वीकार करते हैं। स्पेस में उन्होंने अपनी मंशा जाहिर करते हुए कहा कि हम किसी डिक्टेटरशिप किसी तरह के धर्म आधारित राष्ट्र की कल्पना को लेकर संघर्षरत नहीं है बल्कि हम शुद्ध सेकुलर आजाद बलूचिस्तान की परिकल्पना कर रहे हैं।
बलूचिस्तान मुक्ति आंदोलन आधार नागरिक स्वतंत्रता एवं जन्मभूमि में उपलब्ध संसाधनों का स्थानीय नागरिकों के हक का आंदोलन भी है। बलूच नागरिक एक्टिविस्ट और अन्य संगठन चाहते हैं कि वह पाकिस्तान से जितना जल्द हो सके मुक्ति पा ली और इसके लिए वे अंतरराष्ट्रीय दबाव की पृष्ठभूमि तैयार करना चाहते हैं। परंतु विश्व का हर एक देश बड़ी समस्या पर बात नहीं करता है यह उनका दर्द है।
मानव अधिकारों पर अतिक्रमण करता पाकिस्तान ना तो बलूच जनता को स्वीकार है और ना ही सिंधु देश के एक्टिविस्ट इसे स्वीकारते हैं।
    

16 अक्तू॰ 2022

इक पैर का जलवा तुझको दिखाना होगा

 



घुप अंधेरा है कोई दीपक जलाना होगा ।

इन अंधेरों से अब आंख  मिलाना होगा।।

मेरे वज़ूद की वज़ह मैं ही हूं तू नहीं -

तेरा ऐलान हर दीवार से मिटाना होगा ।।

रश्क़ न कर,चल साथ मेरे कुछ दूर तलक

इक पैर का जलवा तुझको दिखाना होगा।।

बिन सिक्कों के तेरा जादू , जादू कहां ?

तेरी बाजीगरी पे अब सिक्के लुटाना होगा ।।

तू टपकती हुई छत है किसे मालूम नहीं?

अबके बरसात के पहले, चूने से भराना होगा ।।

जहां देखो वहां कांटों के सिवा कुछ भी नहीं-

जलेगी आग तो, इन्हें खाक में जाना होगा।।

                          गिरीश बिल्लोरे मुकुल


5 अक्तू॰ 2022

Quantum activities of life..!


   The universe is the most reliable source of energy.The entire energy available on earth is just a part of the energy of the universe.
Everyone knows that even the smallest particle of energy has energy.This is not a complicated science, rather understand it as "energy never ends".
   We cannot survive for a moment without energy, neither in inner nor outer environment.

  You must be wondering where does this energy come from?
The energy we get only from the universe, we have to use our brain to receive it.
  A friend of mine asked me - "How would our sages get the knowledge of astronomy without instruments?
  How did he get the knowledge of planets, constellations, nebula etc.
"I told them that by what process and technology they acquired this knowledge, neither I know nor understand.But I can definitely say that he felt the effect of energy and understood the position of the constellations.
Energy flows through every body in the universe.Just like when you dial a telephone number, the digital energy on another person's telephone gets converted into mechanical energy.
  The meaning of my statement is that energy flows from every planet or constellation, if you have the ability to receive it, then you will also be able to understand it.
  In fact the most important and useful organ for our body is the brain.The brain is the receiver, the brain is the coordinator, and if viewed seriously, the brain is also the main manager and administrator of our body.
The brain is activated while sleeping and going. The brain never sleeps. Even if the body is in such a deep sleep or even if it is unconscious.
The brain, as a receiver, guesses the source of the arrival of information and can analyze it to make an accurate estimate of the distance to that object.
Our sages received information in this way and had assessed their condition.The calculation of time, the motion of the earth, and the position of the Sun Moon Earth or Sun Earth Moon, when the position of the eclipse is formed in a line, is also accurately told in Indian astrology.
  To do such calculations, some software has not been developed in the West. NASA has also made such software, but such software was already present in the mind of the sages of India.In other words,  brain has been working like a super computer.
   Like sages  do we also get such messages?
  Yes, we keep getting such messages continuously. But the receiving capacity of our brain is very weak. For this reason we are neither able to store nor analyze messages.
Our brain is recognized as conscious and subconscious brain.The conscious state is the state of our physical awakening. The brain then works. And our subconscious mind is active even when we are in a dormant state
  Imagine that you want to do some work and it cannot be done by you, you think for that work.This thoughtfulness of yours comes to you in the dream by performing that task. To get such experiences, you should take the help of meditation yoga.The mind should not be distracted because thousands of thoughts come to the brain simultaneously or one after the other. Now in this sequence of thoughts, we have to decide which thought we have to stop and keep it in our mind.
Right now we keep those thoughts in our mind which are of immediate use to us.
   when we meet such a person in our dreams or if we remember something about him in the waking state, then we become eager to meet him. This is what our sages used to do.The sages would visualize the position of the planets and constellations in their mind and collect and assess the messages coming from them in the conscious or subconscious state and ascertain their position.
  You must be thinking - how is this possible?
  I will not comment on whether it is possible or not. But later investigations show that in fact there is no change in the position of the planets and constellations as fixed by our sages.Have you ever noticed a difference in the position and timings of a solar eclipse and a lunar eclipse for a moment?
  The position of the planets was determined accurately and by the sages.
  The only meaning of all the points as above is that - we expand the capacity of our brain and receive the cosmic energy and information that is received.
Are you wondering what does this have to do with quantum activity?
  Friends, we receive the arrival of energy and messages from the universe in wave and matter form.That is quantum physics.We have historical evidence. On the basis of these evidences in the context of astronomy, we can store energy and information in our brain. I told you that our brain is the receiver.We have brain analyzer also we can analyze the data received. Such analysis as our sages did.And on the basis of this analysis we can give our opinion.
We use our intelligence while evaluating situations and determine our programs.
*Importance of quantum activities in life*
We know that the universe is a renewable source of energy. The energy released from it is in constant motion.We must first make our brain receivable in order to store the cosmic.Then that energy and the information contained in it should be processed and used.This is what all our sages used to do. Today's scholars do the same thing.Due to this, our intelligence capacity increases wonderfully.This is a very necessary process for the development of mankind.In Indian philosophy it is called Yoga.
  All the information we receive is already available in the message universe. By using the receiver of our brain to receive them, we can easily become Scientist, musicians and writers, We can create such creations which no one has imagined.There is a lot of energy in the universe, we just have to prepare our receivers.

26 अग॰ 2022

Over 1500 Baloch civilians missing from floods, 33 million homeless

    On the one hand, there is an atmosphere in Pakistan against Balochistan, Sindhudesh, Ahmadiyya, Hindu, minorities.On the other hand, this rain wreaked havoc in Balochistan and Sindhudesh.
  The administration of Pakistan was only seen sitting on its hands in these circumstances.The citizens of Sindhudesh Balochistan did not tell on social media - "Flood relief The government has not made any significant contribution in the flood relief work.
   The Chief Minister of Balochistan has proved unsuccessful in protecting its citizens.
  A Balochistan citizen claims that at least 1500 women, children and men have been washed away in the floods.
Pakistan, which makes big claims, remains silent on this tragedy of Balochistan. On the other hand,
What does the government of Pakistan say?
नवजीवन से साभार
According to the National Disaster Management Authority, 937 people have died and 33 million have been displaced since mid-June due to the record rains. The government has officially declared a flood
 The world famous Coke studio has also been hit by the floods. Balochistan singer Bugti has become homeless.
a citizen of Sindhudesh told that- "We are the participant of 70% of the economy of Pakistan. Despite this, Punjab province is being provided maximum facilities.
Baloch citizens are now openly saying that- "Pakistan's administration, Army ISI, all are working on the behest of China...!"
  They believe that China is eyeing the mineral wealth through Gwadar.
    Children are picked up from families simply on suspicion of being involved in the Balochistan liberation movement. Human rights violations in Pakistan for Balochistan Sindh Ahmadiyya and Pashto castes and minorities It is hardly happening anywhere in the present century.
   In the space held on Twitter, a citizen became very emotional and even prayed to the Government of India and especially the Prime Minister of India for a repeat of 1971.
You question arises that what is Pakistan, which supports the Muslim Brotherhood, ie Ummah, dealing with Muslims in its own country.
   It appears that the incident of 1971 in Pakistan may be a repeat.

19 जून 2022

The Brahmin Emperor Pushyamitra Shunga was a superhero and not a villain.


                

 Pushya Mitra Shunga (Founder of Shunga dynasty)

Birth - 185 BC Death - 149 BC in Patna now in Bihar

Successor - Aganimitra

Shunga-dynasty

Pushyamitra Shunga (185 - 149 BC)

Agnimitra (149 - 141 BC)

Vasujyeshtha (141 - 131 BC)

Vasumitra (131 - 124 BC)

Andhraka (124 - 122 BC)

Pulindak (122 - 119 BC)

Ghosh Shungavajrammitra Bhagabhadra Devabhuti (83 - 73 BC)

              185 BC, due to the administrative and weak system of the Maurya dynasty ruler Brihadutta, due to the excessive attachment to the Buddhist retirement path and the desire not to stop the conspiracy of the Greek king Demotrius, the general, Pushyamitra Shunga, killed Brahadatta in public and not by deceit. Facts Dr HC Raychaudhuri has written a clear account of the Shunga dynasty. Rahul Sankrityayan imagined that Pushyamitra Shunga might have been equated with Rama.

Due to this, a scholar, Vaman Meshram, president of BAMCEF, immediately in his expression called Pushyamitra Shunga as the king of Ayodhya. And they presented it in the public in a wrong way. This fact is clear in the video uploaded on YouTube on 5th March 2019 without study Vaman Meshram ji is presenting wrong facts.

It is very important to reconsider whatever has been shown in history against Pushyamitra Shunga, otherwise the neo-Buddhists and so-called Dalit thinkers will be paramount in disintegrating the Indian social structure at the present time.

At present you will find some such videos of Vaman Meshram in which he is heard saying that Pushyamitra Shunga was a cruel ruler who ended the low caste Maurya dynasty to establish Brahmin rule and Pushyamitra Shunga shifted his capital from Pataliputra to Ayodhya. and compared him with Maryada Purushottam Ram. This is completely fictional and a hypothesis of the author Rahul Sankrityayan from the Volga to the Ganges which he described in this way in the Prabha Kathayan of his work. (See Prabha Story 11 Time Period 50 AD Paperback Edition From the Volga to the Ganges, page number 161 paragraph two)

    “There is no doubt that in Ashvaghosha he relished the melodious poetry of Valmiki. It is no wonder that if Valmiki had been a dependent poet of the Sunga dynasty, such as Kalidasa of Chandragupta Vikramaditya and to increase the glory of the capital of the Sunga dynasty, he changed the capital of Dasaratha from Varanasi to Saket or Ayodhya and the emperor Pushyamitra or Agnimitra as Rama. Praised - in the same way as Kalidasa in Raghuvansh named Raghu and Kumarasambhava's father, son Chandragupta Vikramaditya and Kumaragupta.

A responsible writer who has wandered from street to street and has collected information that what this pen is writing is beyond comprehension. Although this is just a speculation, but one thing becomes clear from this statement that - "India's litterateur Rahul Sankrityayan has neither been honest with Indian history nor has been honest with literature and he has issued such a statement. You can confirm this on the video uploaded on YouTube on March 5, 2019, which started being misused by a study-less clumsy person like Vaman Meshram.

How can it be so that every ancient writing is true? Vaman Meshram has made a flawed statement with the aim of polarizing castes without any confirmation. It is not that this statement has been given only once. to get into.

Brihadatta was such an indolent ruler who has failed to protect the borders. General Pushyamitra Shunga had then received an information that - "Yavan soldiers are residing in Buddhist monasteries in the form of bhikkhus. And their aim is to establish Greek rule in India only and only. When Pushyamitra in this context from King When he discussed, the king's statement was that - "We will see when the time comes..!"

Nevertheless, Pushyamitra started the investigation of Buddhist monasteries. They found about 300 Yavana soldiers with weapons present in the monasteries. The Buddhist monk admitted that when he had assured him to become a Buddhist. Enraged by this, Pushyamitra Shunga beheaded the entire 300 young soldiers and arrested the Buddha sadhus. Even on this matter, King Brihadatta, also known as Vrahadratha, got angry and asked Pushyamitra to leave the palace. Pushyamitra had to bear this humiliation to protect the nation.

One day there was a meeting between the commander Pushyamitra and the king somewhere outside the Raj Bhavan and there was a scuffle in this meeting. Historians say that Pushyamitra ripped the king in front of everyone with a sword. Declaring himself as the heir of the state, Pushyamitra proclaimed his right to power. Historians say that the Greek warrior Dometrien wanted to attack India with his large army. Pushyamitra Shunga attacked Domitrian and his army which was now more enthusiastically prepared on the banks of the river Indus and drove them back.

Then Pushyamitra established his capital at Vidisha in present-day Madhya Pradesh, which is known as a similar period Bhelsa city.

Pushyamitra Shunga organized two Ashwamedha Yagyas, which were performed by Panini's disciple Maharishi Patanjali. And during the yajna, the Indo-Greek king Milander or Milander, who ruled the Punjab in a war, also ended.

In order to preserve the existence of Indian culture and Sanatan Dharma, Pushyamitra did the same period.