महान् समाज सेवक एवं सुधारक - वंचितों के मसीहा - पुनर्जागरण के महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले

यह आलेख आनंद राणा जबलपुर द्वारा फेसबुक वॉल पर प्रस्तुत किया है। उनकी अनुमति के साथ ब्लॉग पर प्रकाशित किया जा रहा है

अवतरण 11अप्रैल सन् 1827 पुणे, पिता : गोविंदराव फुले, 

माता : विमला बाई, पत्नी : सावित्रीबाई फुले 

 महात्मा ज्योतिबा फुले (ज्योतिराव गोविंदराव फुले) को 19वी. सदी का प्रमुख समाज सेवक एवं सुधारक थे, उन्होंने भारतीय समाज में फैली अनेक कुरीतियों को दूर करने के लिए सतत संघर्ष किया। अछूतोद्धार नारी-शिक्षा, विधवा विवाह और किसानो के हित के लिए ज्योतिबा ने उल्लेखनीय कार्य किया है। 

संक्षिप्त जीवन वृत्त - महात्मा ज्योतिबा जी का अवतरण 11 अप्रैल  1827  को सतारा महाराष्ट्र , में हुआ था. उनका परिवार बेहद गरीब था और जीवन-यापन के लिए बाग़-बगीचों में माली का काम करता था. ज्योतिबा जब मात्र  एक वर्ष के थे तभी उनकी माता का निधन हो गया था. ज्योतिबा का लालन – पालन सगुनाबाई नामक एक दाई ने किया. सगुनाबाई ने ही उन्हें माँ की ममता और दुलार दिया. 7 वर्ष की आयु में ज्योतिबा को गांव के स्कूल में पढ़ने भेजा गया.

 जातिगत भेद-भाव के कारण उन्हें विद्यालय छोड़ना पड़ा. स्कूल छोड़ने के बाद भी उनमें पढ़ने की ललक बनी रही. सगुनाबाई ने बालक ज्योतिबा को घर में ही पढ़ने में मदद की. घरेलू कार्यों के बाद जो समय बचता उसमे वह किताबें पढ़ते थे. ज्योतिबा  पास-पड़ोस के बुजुर्गो से विभिन्न विषयों में चर्चा करते थे. लोग उनकी सूक्ष्म और तर्क संगत बातों से बहुत प्रभावित होते थे। उन्‍होंने विधवाओं और महिलाओं के कल्याण के लिए काफी काम किया। उन्होंने इसके साथ ही किसानों की हालत सुधारने और उनके कल्याण के लिए भी काफी प्रयास किये। स्त्रियों की दशा सुधारने और उनकी शिक्षा के लिए ज्योतिबा ने 1848 में एक स्कूल खोला। यह इस काम के लिए देश में पहला विद्यालय था। लड़कियों को पढ़ाने के लिए अध्यापिका नहीं मिली तो उन्होंने कुछ दिन स्वयं यह काम करके अपनी पत्नी सावित्री को इस योग्य बना दिया। उच्च वर्ग के लोगों ने आरंभ से ही उनके काम में बाधा डालने की चेष्टा की, किंतु जब फुले आगे बढ़ते ही गए तो उनके पिता पर दबाब डालकर पति-पत्नी को घर से निकालवा दिया इससे कुछ समय के लिए उनका काम रुका अवश्य, पर शीघ्र ही उन्होंने एक के बाद एक बालिकाओं के तीन स्कूल खोल दिए।

उन्होंने वर्ण संस्था और जाति संस्था को शोषण की व्यवस्था बताया और जब तक इनका पूरी तरह से समापन नहीं होता तब तक एक सभ्य एवं सुसंस्कृत समाज का निर्माण असंभव है- ऐसी स्पष्ट भूमिका रखी. ऐसी भूमिका रखने वाले वो पहले भारतीय थे। उन्होंने सामाजिक परिवर्तन, ब्रम्ह्नोत्तर आंदोलन, बहुजन समाज को आत्मसम्मान देने की, किसानों के अधिकार की - ऐसी बहुत सी लड़ाईयों को प्रारंभ किया. सत्यशोधक समाज भारतीय सामाजिक क्रांति के लिये प्रयास करनेवाली अग्रणी संस्था बनी। महात्मा फुले ने लोकमान्य तिलक ,आगरकर, न्या. रानाडे, दयानंद सरस्वती के साथ देश की राजनीति और समाज को नवीन दिशा दी।

महात्मा फुले ने अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले को पढ़ने के बाद 1848 में उन्होंने पुणे में लड़कियों के लिए भारत की पहली पाठशाला खोली | 24 सितंबर 1873 को उन्होंने सत्य शोधक समाज की स्थापना की | वह इस संस्था के पहले कार्यकारी व्यवस्थापक तथा कोषपाल भी थे |इस संस्था का मुख्य  उद्देश्य समाज में वंचितों और दलितों पर पर हो रहे शोषण तथा दुर्व्यवहार पर अंकुश लगाना था | महात्मा फुले अंग्रेजी राज के बारे में एक सकारात्मक दृष्टिकोण रखते थे क्योंकि अंग्रेजी राज की वजह से भारत में न्याय और सामाजिक समानता के नए बीज बोए जा रहे थे | महात्मा फुले ने अपने जीवन में हमेशा बड़ी ही प्रबलता तथा तीव्रता से विधवा विवाह की वकालत की | उन्होंने उच्च जाति की विधवाओं के लिए सन् 1854 में एक घर भी बनवाया था |  दूसरों के सामने आदर्श रखने के लिए उन्होंने अपने खुद के घर के दरवाजे सभी जाति तथा वर्गों के लोगो के लिए हमेशा खुले रखे। 

ज्योतिबा मैट्रिक पास थे और उनके घर वाले चाहते थे कि वो अच्छे वेतन पर सरकारी कर्मचारी बन जाए लेकिन ज्योतिबा ने अपना सारा जीवन दलितों की सेवा में बिताने का निश्चय किया था | उन दिनों में स्त्रियों की स्थिति बहुत खराब थी क्योंकि घर के कामों तक ही उनका दायरा था | बचपन में शादी हो जाने के कारण स्त्रियों के पढ़ने लिखने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था | दुर्भाग्य से अगर कोई बचपन में ही विधवा हो जाती थी तो उसके साथ बड़ा अन्याय होता था | तब उन्होंने सोचा कि यदि भावी पीढ़ी का निर्माण करने वाली माताएँ ही अंधकार में डूबी रहेगी तो देश का क्या होगा और उन्होंने माताओं के पढ़ने पर जोर दिया था |

उन्होंने विधवाओं और महिला कल्याण के लिए काफी काम किया था | उन्होंने किसानों की हालत सुधारने और उनके कल्याण के भी काफी प्रयास किये थे | स्त्रियों की दशा सुधारने और उनकी शिक्षा के लिए ज्योतिबा और उनकी पत्नी ने मिलकर 1848 में स्कूल खोला जो देश का पहला महिला विद्यालय था | उस दौर में लड़कियों को पढ़ाने के लिए अध्यापिका नहीं मिली तो उन्होंने अपनी पत्नी सावित्रीबाई को पढ़ाना शुरू कर दिया और उनको इतना योग्य बना दिया कि वो स्कूल में बच्चों को पढ़ा सके |

ज्योतिबा यह जानते थे कि देश व समाज की वास्तविक उन्नति तब तक नहीं हो सकती, जब तक देश का बच्चा-बच्चा जाति-पांति के बन्धनों से मुक्त नहीं हो पाता, साथ ही देश की नारियां समाज के प्रत्येक क्षेत्र में समानअधिकार नहीं पा लेतीं । उन्होंने तत्कालीन समय में भारतीय नवयुवकों का आवाहन किया कि वे देश, समाज, संस्कृति को सामाजिक बुराइयों तथा अशिक्षा से मुक्त करें और एक स्वस्थ, सुन्दर सुदृढ़ समाज का निर्माण करें । मनुष्य के लिए समाज सेवा से बढ़कर कोई धर्म नहीं है । इससे अच्छी ईश्वर सेवा कोई नहीं । महाराष्ट्र में सामाजिक सुधार के पिता समझे जाने वाले महात्मा फूले ने आजीवन सामाजिक सुधार हेतु कार्य किया । वे पढ़ने-लिखने को कुलीन लोगों की बपौती नहीं मानते थे । मानव-मानव के बीच का भेद उन्हें असहनीय लगता था । 

 दलितों और निर्बल वर्ग को न्याय दिलाने के लिए ज्योतिबा ने 'सत्यशोधक समाज' स्थापित किया। उनकी समाजसेवा देखकर 1888 ई. में मुंबई की एक विशाल सभा में उन्हें 'महात्मा' की उपाधि दी। ज्योतिबा ने ब्राह्मण-पुरोहित के बिना ही विवाह-संस्कार आरंभ कराया और इसे मुंबई हाईकोर्ट से भी मान्यता मिली। वे बाल-विवाह विरोधी और विधवा-विवाह के समर्थक थे। वे लोकमान्य के प्रशंसकों में थे।ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले के कोई संतान नहीं थी इसलिए उन्होंने एक विधवा के बच्चे को गोद लिया था | यह बच्चा बड़ा होकर एक चिकित्सक बना और इसने भी अपने माता पिता के समाज सेवा के कार्यों को आगे बढ़ाया | मानवता की भलाई के लिए किये गए ज्योतिबा के इन निस्वार्थ कार्यों के कारण मई 1888 में उस समय के एक और महान समाज सुधारक “राव बहादुर विट्ठलराव कृष्णाजी वान्देकर” ने उन्हें “महात्मा” की उपाधि प्रदान की | जुलाई 1988 में उन्हें लकवे लग गया | जिसकी वजह से उनका शरीर कमजोर होता गया लेकिन उनका जोश और मन कभी कमजोर नहीं हुआ। 

27 नवम्बर 1890 को उन्होंने अपने सभी प्रियजनों को बुलाया और कहा कि “अब मेरे जाने का समय आ गया है, मैंने जीवन में जिन जिन कार्यों को हाथ में लिया है उसे पूरा किया है, मेरी पत्नी सावित्री ने हरदम परछाईं की तरह मेरा साथ दिया है और मेरा पुत्र यशवंत अभी छोटा है और मैं इन दोनों को आपके हवाले करता हूँ |” इतना कहते ही उनकी आँखों से आँसू आ गये और उनकी पत्नी ने उन्हें सम्भाला | 28 नवम्बर 1890 को महात्मा ज्योतिबा फुले ने देह त्याग दी और एक महान् विभूति ने इस दुनिया से अपनी अनंत यात्रा के लिए विदाई ले ली।


किताबें मरती नहीं..!




    हाल ही में पहल संपादक पूज्य ज्ञानरंजन जी ने डिक्लेअर किया कि वे अब अपनी पत्रिका नहीं छापेंगे...!
     कारण जो भी हो भक्तों को काफी दुख हुआ। कुछ भक्तों को यह तक कहने लगे कि इस तरह  पत्रिका का अवसान बेहद दुखद है !
    दुख तो मुझे भी हुआ परंतु में ज्ञान जी की परिस्थितियों को समझता हूं। बेहतरीन एडिटर हैं ।
    पिछले बार भी ऐसी ही कोई स्थिति उत्पन्न हुई थी एक पाठक के रूप में पत्रिका की गैरमौजूदगी दुख का विषय तो है। धर्मयुग साप्ताहिक हिंदुस्तान कादंबिनी आदि आदि कई सारी पत्रिकाओं का प्रकाशन किसी ना किसी कारण से या तो खत्म हो गया या बंद कर दिया गया ।
   यहां किसी किताब के नियमित प्रकाशन ना हो पाने को उस  किताब का अवसान होना पूर्णत: बाल बुद्धि का परिचय है। मित्र समझ लो किताबें कभी नहीं मरती।
   किताब जीती है किताबें जीवंत रहती है चाहे भी ताड़ पत्र पर लिखी हों या दीवारों पर अब इंटरनेट पर किताबें जिंदा हो जाती तब जब तुम उसे बांचते हो । मरते तो 24 लोग जो वर्दी पहनते हैं मरते तो जानवर हैं । किताबें जो आकाश से उतर आती हैं उनका क्या किताबें जो जंगलों में आरण्यक के रूप में लिखी जाती है किताबें जो उपनिषद होती हैं इन सब के बारे में आप क्या कहोगे..?
    निरर्थक भावुक मत बनो यह बाल बुद्धि है मुझे तो लगा कि:"मित्र तुम वैसे ही बच्चे हो जो चॉकलेट खाना चाह रहा था रोज की तरह और आज से तय हो गया कि तुम्हें चॉकलेट नहीं मिलेगी ।"
   एक  पत्रिका का नहीं आना कोई घटना नहीं कि आप शोक गीत लिखें।
इसे मोह कहा गया है । इतना पढ़ने के बाद भी मोह से तुम्हें छुटकारा नहीं है। कोई बात नहीं जब परिपक्वता आएगी तब सब समझ जाओगे ।
   व्हेन सांग फाह्यान बहुत कुछ लिख गए हैं। चाणक्य ने क्या कम लिखा है और फिर वह गीता जो गांधी जी हाथ में लेकर घूमते थे वह किताब नहीं है।
   दुनिया भर में जानकारियों की बौछार को समझिए। ये बौछारें तुम्हें समझ में नहीं आ सकती है कभी। हैमलेट और अभिज्ञान शाकुंतलम को बराबरी से रख कर पढ़ा है कभी ?
    उड़ना है तो पंख लगाओ और
उड़ो ऊंचे और ऊंचे आसमान अंतहीन है । आसमान में चक्रव्यूह नहीं है वैसे तुम अभिमन्यु नहीं हो अभी तो पहला ही द्वार पार नहीं कर पाए।
  निर्मोही बनो इतनी आसक्ति  भी बात की..!
   तिरलोक सिंह आंखों में ढेर सारा प्यार लेकर आते थे । तब तक आए जब तक आंखों ने साथ देना नहीं छोड़ा था। अरुण जी फिर मैं फिर मलय जी हम सबके बीच सकारात्मक संदेशों का ताना-बाना बुना करते थे । असंगघोष की किताब के बाद ओमप्रकाश वाल्मीकि जी की किताब आंखों को भिगो देती थी । तिरलोक सिंह ने पढ़ना सिखाया है कसम उस अवतार पुरुष की तुम ही मत रो जितना है उतना संभाल लो पढ़ लो समझ लो अक्षर बुनना तो सबको आता है। बुने हुए अक्षर शब्द बनते हैं । और इन्हीं की व्यवस्था किताबें हैं।
  किताबें तब मरती हैं जब तुम्हारी अलमारी के ताबूत में बंद रहा करतीं है । जैसे ही आंख के सामने आती जिंदा हो जाती है कसम से ।
   विमर्श करना हमारा दायित्व है और विरासत भी। नाराज मत हो बस समझा रहा हूं। पहल कभी नहीं मरती  जिंदा रहती है अनंत काल तक।

राम दुआरे तुम रखवारे : नमः शिवाय अरजरिया

राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।

यह हनुमान चालीसा की एकमात्र ऐसी चौपाई है जो द्वैतवाद का समर्थन करती प्रतीत होती है। रखवारे या द्वारपाल का तात्पर्य ही ऐसे व्यक्ति से लिया जाता है, जो दहलीज पर खड़ा हो! जिसका अंतःपुर एवम वर्हिनगर में निर्वाध आवागमन हो। वस्तुतः द्वारपाल होना ही दो जगतों वाह्य एवं आन्तरिक का बोध कराता है, बिल्कुल सांख्य दर्शन के प्रकृति एवं पुरुष की तरह। 

हनुमान चालीसा कि इस चौपाई का शाब्दिक अर्थ है कि, आप राम द्वार के द्वारपाल हैं। आप राम द्वार की रक्षा करते हैं। आपकी आज्ञा के बिना कोई रामद्वार से अंदर प्रवेश नहीं पा सकता। इसका सामान्य अर्थ यह भी है कि आपकी कृपा के बगैर कोई राम की अनुकंपा हासिल नहीं कर सकता। परंतु इस चौपाई का विशिष्ट एवं श्लेषात्मक अर्थ क्या है? आज देवदत्त पटनायक द्वारा प्रणीत मेरी हनुमान चालीसा में जब इस चौपाई का अर्थ अन्वेषण किया तो पाया कि पाश्चात्य विचारकों की तरह पटनायक जी भी इस चौपाई की जड़ें भारतीय जाति व्यवस्था में खोजते हैं। उनका मानना है कि उच्च भारतीय जातियां अपनी पवित्रता, कुलीनता तथा जाति विषयक व्यावसायिक विशिष्टता को बनाए रखने के लिए अपने घर, महल या निवास के बाहर द्वारपाल रखती थी, जो निम्न जातियों को कुलीन लोगों से मिलने से रोकता था या नियंत्रित करता था। परन्तु आम जन से कुलीन शासक का कटाव ना हो इसीलिए ऐसे शासक वर्ष में एक या दो बार रथों पर सवार होकर आम जनों के बीच जाते थे, श्री पटनायक रथयात्रा को इसी का अवशेष बताते हैं। श्री देवदत्त पटनायक द्वारा प्रतिपादित इस तथ्य का जब वाल्मीकि रामायण एवं तुलसीकृत रामचरितमानस के आलोक में परीक्षण किया तो उक्त दोनों ग्रंथों में ऐसा कोई भी उदाहरण देखने को नहीं मिला जिसमें राघवेंद्र किसी निम्न जाति या वर्ण के व्यक्ति से मेल मिलाप में भेद करते हो। प्रभु श्री राम का जीवन तो ऐसे उदात्त उदाहरणों से भरा पड़ा है जिनका आलंबन करने से वर्तमान समाज में पाई जाने वाली जातीय या जनजातीय समस्याओं को समूल नष्ट किया जा सकता है। अहिल्या उद्धार, राम-केवट संवाद, वानर जाति से मित्रता, माता शबरी प्रसंग आदि ऐसे अनेकों कथानक हैं जो प्रतिपादित करते हैं कि भक्तों एवं श्री राम के बीच किसी भी जातीय भेद की बात अनर्गल वितंडवाद से इतर कुछ नही है। यद्यपि कुछ लोग शंबूक वध को लेकर मिथ्यारोपण करते हैं। इस संबंध में मेरा यही अन्वेषण है की मूल रामायण या रामचरितमानस में इसका उल्लेख नहीं है यह आख्यान परिवर्ती साहित्यकारों ने राम के उदार एवं उदात्त चरित्र को लघुतर करने के उद्देश्य से जोड़े हैं।

विशिष्ट एवं श्लेषात्मक अर्थ की खोज श्री पटनायक से इतर यूट्यूब पर कई वीडियो तक जारी रही, अंतर्मन से यही प्रश्न बार-बार प्रकट हो रहे थे कि, 
1-रामद्वार क्या है ?
2-द्वारपाल कौन है? उसमें कौन-कौन से गुण होना चाहिए?
3-पैसारे का क्या तात्पर्य है?

जहां तक मेरा मानना है कि राम द्वार से तात्पर्य ऐसे किसी महल या कुटिया से नहीं है ना ही साकेत स्थित कनक भवन से है जिसके दरवाजे पर द्वारपाल के रूप में दनुजवन कृशानु दशग्रीव का दर्प दमन करने वाले बजरंगबली विराजमान हो। वास्तव में इन सभी आख्यानों के प्रतीकात्मक अर्थ अधिक महत्वपूर्ण हैं- जैसे राम द्वार से तात्पर्य है - सत चित आनंद में प्रवेश का दरवाजा अर्थात राम के गुणों का समूह। यह दशा या लक्षण किसी भी मानव मात्र में उत्पन्न हो सकते हैं। परंतु प्रकृति का स्वभाव ऐसा है कि यहां अगर हृदय रूपी प्रवेश द्वार पर एक और गणनीय सद्गुण प्रवेश हेतु आते हैं तो दूसरी ओर ह्रदय देश में प्रवेश हेतु दुर्गुणों की अगणित भीड़ एकत्रित है। हम ह्रदय देश के द्वार पर खड़े द्वारपाल पर निर्भर हैं कि वह अंतस्थ में सद्गुणों को प्रवेश की इजाजत दे या दुर्गुणों को। वस्तुतः हनुमान जी महाराज द्वारपाल के रूप में सदगुरुदेव की ही भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। गुरु ही है जो साधक के दुर्गुणों को कुम्हार की तरह ठोक ठोक कर दूर करता है तथा उसका साक्षात्कार परम तत्व से कराता है। यही कारण है कि आचार्य शंकर से लेकर कबीरदास जी तक सभी प्रज्ञा वान व्यक्ति गुरु के महत्व को अपने-अपने ढंग से निरूपित या प्रतिपादित करते हैं। कबीर दास जी तो यहां तक कहते है- 

गुरु गोविंद दोऊ खड़े,काके लागुं पांय।
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए ।।

अर्थात साधक के समक्ष अगर भगवान प्रकट हो भी जाएं तो साधक पहचान नहीं पाएगा, पहचान के लिए गुरु एक कसौटी की तरह कार्य करता है। तुलसीदास जी के जीवन में तो इसका प्रत्यक्ष अनुभव रहा है, हनुमान जी सदैव तुलसीदास जी के लिए एक प्रेरक गुरु के रूप में रहे हैं यद्यपि तुलसीदास जी के हृदय में श्री राम को पाने की उत्कट अभिलाषा थी। वह प्रभु दर्शन के लिए बहुत विकल भी रहते थे, लेकिन सम्मुख आने पर भी अपने आराध्य श्री राम को वह पहचान ना पाए। ऐसी दशा में सद्गुरु हनुमान जी ने इशारा कर तुलसीदास जी को अपने आराध्य प्रभु श्रीराम से परिचय कराया।

 चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीर।
 तुलसीदास चंदन घिसे तिलक करे रघुवीर।।

वस्तुतः हनुमान जी महाराज ज्ञान एवं गुणों के सागर हैं, आप अमित बल के स्वामी हैं, अत्यंत चतुर एवं विद्यावान है, तपस्वी हैं और इन सबसे ऊपर समर्पण एवं विनम्रता में वरेण्य हैं। सामान्यतः द्वारपाल में चार गुण होना चाहिए-

-द्वारपाल को प्रथमतः सजग होना चाहिए जिससे कोई अनधिकृत व्यक्ति अंतस्थ में प्रवेश ना पा सके।
-द्वारपाल को बलवान होना चाहिए क्योंकि यदि कोई अनधिकृत प्रवेश की बलपूर्वक चेष्टा करें तो उसे उसी की भाषा में जवाब दिया जा सके।
-द्वारपाल का तीसरा लक्षण विवेकवान होना है
-द्वारपाल का चौथा लक्षण है कि उसे आग्रही होना चाहिए क्योंकि सद्गुण अत्यंत स्वाभिमानी होते हैं बार-बार आग्रह पर ही आमंत्रण स्वीकारते हैं एवं ह्रदयंगम होते हैं। सद्गुरु के रूप में हनुमान जी इन गुणों में सिद्धहस्त हैं। हनुमान जी इतने सजग हैं कि जितने में नाग माता सुरसा अपना मुख वापस पूर्व स्थिति में लाती है तत्समय में वह सुरसा के उदर से वापस भी आ जाते हैं। वह अतुलितबलधामं है उनके हृदय में स्वयं अतुलित बल के स्वामी एवं अतुलित बल की प्रभुताई धारण करने वाले श्री राम सदैव धनुष बाण लेकर निवास करते हैं। मारुतिनंदन के व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषता उनका विवेक ही है। विवेक मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं तन विवेक, मन विवेक, नयन विवेक एवं वाणी विवेक। किसी वृतांत के वर्णन में या आत्मपरिचय के समय हम सम्मुख उपस्थित व्यक्ति या समूह के समक्ष कैसे उठते या बैठते हैं कैसे हाव-भाव बनाते हैं यह तन विवेक है। हमारा परिधान कैसा हो यह भी तन विवेक की परिभाषा में आता है। मन विवेक दूसरे के कल्याण से संबंधित है। नयन विवेक दर्शन एवं आत्मा अवलोकन से संबंधित है। वही वाणी विवेक हमारे प्रभाव को दूसरे पर प्रकट करने में मदद करता है। किस व्यक्ति से किस समय हमें किस भाषा में क्या बोलना है यह वाणी विवेक का विषय है। यदि हमारी माता या पड़ोसी अनपढ़ हैं और हम उनसे आंग्ल भाषा में बातचीत करें तो यह वाणी विवेक के प्रतिकूल है। वस्तुतः प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की सफलता असफलता सामाजिक संबंध वृतांत विवेक पर ही निर्भर है। जब हम मारुतसुत के चरित्र पर विचार करते हैं तो पाते हैं उन्होंने श्री राम से प्रथम परिचय के दौरान ही उन्हें इतना अधिक प्रभावित किया कि, श्रीराम पहले उन्हें मंत्रमुग्ध होकर सुनते ही रहे एवं उनकी वाणी तथा हाव भाव से प्रसन्न होकर उन्हें अपना सचिव बना लिया। श्री राम लक्ष्मण से कहते हैं की- हनुमान ने आत्मपरिचय में भाषा व्याकरण आदि की कोई त्रुटि नहीं की है। कोई भी आदमी जिसने ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद को ठीक ठीक ढंग से ना सीखा पड़ा हो वह कभी ऐसे अच्छे ढंग से बात नहीं कर सकता। यह पक्का मानो कि इन्होंने संपूर्ण व्याकरण का अभ्यास किया है क्योंकि इतनी बातें कहने पर भी इनके मुंह से ऐसी बात नहीं निकली जिस पर टोका जा सके। इतनी देर में इनके मुख, आंख, मष्तिष्क या भौंह से बने हाव-भाव में कोई खोट दिखाई नहीं पड़ी। वह ना रुके, ना हकलाये ना नेत्र चलाएं ना माथे पर सिकुड़न पड़ने दी ना भौंहें तिरछी या बाकी होने दी। इनका स्वर ना बहुत मंद था एवं ना ही बहुत तीव्र। ह्रदय, कण्ठ एवं दिमाग से निकलने वाली इनकी बोली इतनी प्यारी है कि सुनकर प्रत्येक व्यक्ति का हृदय खिल सकता है। ऐसी बातें सुनकर मारने के लिए तलवार उठाए दुश्मन का निर्णय भी परिवर्तित हो जाएगा। हे लक्ष्मण बताओ जिस राजा के पास ऐसा अच्छा कार्य कुशल बुद्धिमान सेवक हो क्या उसका कोई कार्य सधने से रुक सकता है। हनुमानजी इसीलिए सदैव 'सत- चित- आनंद' रूपी परमात्मा श्रीराम के द्वार हृदयस्थल पर विराजमान है।

पैसारे

आचार्य तुलसी पर समकालीन भाषाओं का अत्यंत प्रभाव था। उन्होंने अपने ग्रंथों में ब्रज भाषा, उर्दू भाषा, अवधी भाषा एवं पंजाबी का बहुतायत में प्रयोग किया। इस चौपाई के अंत में वर्णित शब्द पैसारे पंजाबी भाषा से ही लिया गया है। गुरुवाणी में पसर जाने का प्रयोग समर्पण के संदर्भ में किया गया है। गुरु वाणी में लिखा है-

हम कूकर तेरे दरबार ।
भोंकन आगे बदन पसार।।

अर्थात हम तेरे दरबार के कुत्ते हैं जो दीन हीन होकर तेरे आगे भौंकते रहते हैं। इस प्रकार पसर जाना एक ऐसी दशा या अवस्था है जब व्यक्ति संपूर्ण आलंबनों को छोड़कर एकमात्र परम सत्ता के भरोसे स्वयं को छोड़ देता है तभी 'सत- चित- आनंद' रूपी परमात्मा ह्रदय देश में प्रकट होते हैं। इस दशा में साधक मान-सम्मान, यश- अपयश, हानि- लाभ से परे होकर द्रौपदी, प्रहलाद या गजेंद्र की तरह आर्त स्वर में दीन हीन बनकर एकमात्र ईश्वर का आलंबन ग्रहण करता है। इसी दशा में मानव मात्र का राम द्वार से सत चित आनंद रूपी परमात्मा में प्रवेश होता है। क्योंकि इस दरवाजे पर सद्गुरु रूपी रखवाले होना आवश्यक है। हनुमान जी महाराज सदैव ऐसे द्वार की रक्षा के लिए तत्पर हैं। वीर बजरंगबली से मेरी प्रार्थना है की आत्मा के मार्ग के प्रतीकों के लिए सत चित आनंद रूप राम द्वार के दरवाजे आग्रह पूर्वक खुले रखें।
लेखक नमः शिवाय अरजरिया मध्यप्रदेश शासन में संयुक्त कलेक्टर के पद पर पदस्थ हैं