नर्मदा परिक्रमा के रास्ते में आने वाले गांव के नाम

 हमारे जातीय बंधु भाई अवधेश कानूनगो जी के गांव में निवास करने वाले पैदल परिक्रमा पथ 
नर्मदा परिक्रमा के गांव के श्री जगदीश भाई ने 99 दिनों में पूर्ण की। जगदीश भाई ने श्री अवधेश जी को बताया कि वे जिस मार्ग से गुजरे उस को  दूरियों कितनी हैं । कृपया जो स्थान आपके अनुसार महत्वपूर्ण हो उन्हें इसमें जोड़ कर अपनी सुविधानुसार उपयोग कर सकते हैं। 

ओंकारेश्वर ६ किमी शिवकोठी, ६ किमी मोरटक्का, (खेड़ीघाट) दो रास्ते १.कटारआश्रम २. पेट्रोल पंप से माफी होते कटार आश्रम, ४ किमी टोंकसर (अन्न क्षेत्र) २ किमी पीतनगर, ४ किमी काँकरिया ६ किमी रावेरखेड़ी (बाजीराव समाधि) ४ किमी बकावाँ अन्न क्षेत्र, ३ किमी मरदाना, २ किमी नौगावाँ, ५ किमी तेली भट्याण (सियाराम बाबा), २ किमी रामकृष्ण हरि सेवा आश्रम अन्न क्षेत्र, ३ किमी ससावट, ३ किमी अमलाथ, ५ किमी लेपा, ६ माँकड़खेड़ा, ६ किमी कठोरा, ४ किमी बड़गाँव, २ किमी शालीवाहन, १ किमी नावड़ाटोड़ी अन्न क्षेत्र, ४ किमी ढालखेड़ा, ५ किमी बलगाँव, ५ खलघाट, १ किमी खलटाँका अन्न क्षेत्र, ५ किमी चिचली अन्न क्षेत्र, ५ किमी भोइन्दा, ३ किमी आभाली, ३ किमी केरवा, ३ किमी दवाना , ५ लखनगाँव अन्न क्षेत्र, १५ चकेरी, ४ किमी अंजड़, ६ किमी बोरलाय १० किमी बड़वानी  (जिला) ९ किमी बावनगजा (जैन तीर्थ) अन्न क्षेत्र, ७ किमी अंजराड़ा अन्न क्षेत्र, ९ किमी पाटी अन्न क्षेत्र, १९ किमी बोकराटा अन्न क्षेत्र, १० किमी अम्बापड़ाव(सदाव्रत), ७किमी बायगोर से पगडंडी रोड़ ४ किमी रानीपुरा, ४ किमी शिरडी, ३ किमी पिपरानी, २ किमी गौमुख (गरमपानी का कुंड) ३ किमी दरा, ४ किमी काकड़दा अन्न क्षेत्र, ६ किमी देवबारापाड़ा, ५ मांडवी, ३ किमी मांडवी बुजुर्ग, १० किमी धडगांव (राजू भाई टेलर व्यवस्था) ११ किमी मोजरा, ५ किमी खुटामोड़ी, ७ किमी काठी (गौतम पाडवी व्यवस्था) ७ किमी मुलगी, ५ किमी बिजरी गव्हाण अन्न क्षेत्र (छगन जी तड़वी,) जंगलमार्ग हेंडपंप के पास से ८ किमी पीपलखूटा, ४ किमी मोकास अन्न क्षेत्र, ८ किमी वड़फली अन्न क्षेत्र, ७ किमी कणजी, १० किमी माथासर अन्न क्षेत्र, १० किमी झरवाणी (गजानन आश्रम सेगांव अन्न क्षेत्र), १२ किमी गोरा (पुराना शूलपाणेश्वर मंदिर हरि धाम आश्रम) १३ किमी रामानन्द आश्रम मांगरोल, ५ किमी सेहराव, ३ किमी ओठलिया, ६ किमी रूड चौकड़ी, ( ३ किमी भीतर पोयचा नीलकंठ धाम स्वामिनारायण) १ किमी रूड गांव जलाराम आश्रम व्यवस्था, ८ शुकदेव व्यास पीठ, ५ किमी ओरी, २ किमी कोटेश्वर अन्न क्षेत्र, ४ किमी सिसोदरा, ४ किमी कार्तिक आश्रम कांदरोज, ३ किमी राजपरा, ३ किमी मिनवारा, ३ किमी वराछा, २ किमी असा (दगड़ू बाबा आश्रम), ३ किमी पाणेथा, ४ किमी वेलुगाम, २ किमी माताजी आश्रम अन्न क्षेत्र, ४ किमी गुप्त गोदावरी, २ किमी शुक्रेश्वर महादेव, ३ किमी मणिनागेश्वर, ३ किमी भालोद, ३ किमी प्राकड़, ७ किमी आविधा, ५ किमी लाडवा मंदिर अन्न क्षेत्र, ३ जगदीश मढ़ी, ८ किमी उचेड़िया, ५ किमी गुवाली, ३ किमी मांडवा, ३ किमी रोकड़िया हनुमान, १० किमी रामकुंड अंकलेश्वर, १० किमी बलबलाकुंड, ११ किमी हाँसोट सूर्य कुंड, १० किमी हनुमान टेकरी अन्न क्षेत्र, वमलेश्वर नाव द्वारा समुद्र पार (खुशाल भाई पटेल सरपंच) यहाँ दक्षिण तट समाप्त!
समुद्र से अमरकंटक की ओर उत्तर तट
मीठी तलाई ३ किमी अम्बेठा, १० किमी सुवा आश्रम, ५ किमी कोलियाद, ७ भेसली, ८ किमी नवेठा (अवधूत आश्रम), ४ किमी भाड़भूतेश्वर (केवट आश्रम), ३ टीवी ४ दसाण, ३ बरवाड़ा ४ कुकरवाड़ा ४ भरुच (नीलकंठ आश्रम) झाड़ेश्वर, १३ मांगरोल (शशि बेन आश्रम) २ दत्त मढ़ी, ४ अंगारेश्वर, २ धर्म शीला, ३ झणोर, ३ नांद कबीर आश्रम, ४ सोमज ढेलवाड़ा, ३ ओज, ६ मोटी कोरल ५ नारेश्वर (रंगअवधूत धाम) २ सायर, ३ कहोणा, १५ वालेश्वर, २ हरिओम आश्रम, २ सुराश्या माल, ५ शिनोर, ७ अनुसुइया आश्रम, ३ मोलेठा, ५ गुप्तेश्वर आश्रम, ४ चांदोद, ४ कुबेर भंडारी करनाळी, १४ तिलकवाड़ा, १२ गरूड़ेश्वर, ५ गभाणा ७ झरिया, (केवडिया सरदार सरोवर स्टेच्यू ऑफ यूनिटी) ९ छोटी अम्बाजी, १२ बोरीयाद, ४ वगाच, १० रेवड़िया आश्रम, १४ कवाँट, (म. प्र.) १४ छकतला, से ३३ किमी बेहड़ा हनुमान मंदिर (बीच में आने वाले गांव क्रमशः अजपाई, आमला, अक्कलतरा, कोसारिया, अट्ठा, पीपरी, बेहड़ा) ११ कुलवट, ककराना ४ कवड़ा हनुमान आश्रम, १३ डही, ४ अतरसुमा, ६ बड़वान्या, ४ पड़ियाल, ६ सुसारी से 3 भवरिया माताजी मन्दिर सदाव्रत ठहरने की व्यवस्था ,4निसरपुर  कोटेश्वर घाट, 5 कड़माल  सिद्धाश्रम 3 चिखलदा 6 नर्मदा नगर नर्मदा मन्दिर गणपुर , 10 सिंघाना या या ((कुक्षी बायपास होते ११ अम्बाड़ा, ४ धुलसर अन्नक्षेत्र, ३ लोहारी ७ सिंघाना शिव मंदिर, ))६ बोरूद, ४ देदला ६ मनावर बंकनाथ मंदिर, टोकी, भानपुरा, छनोरा, उमरबन (कुल दूरी २३)व्यवस्था, ९ सुराणी, १० नीलकंठेश्वर (माण्डव) ५ रेवा कुंड ७ किमी बगवान्या (नर्मदा आश्रम) १२ धामनोद, ९ खराड़ी, ५ महेश्वर घाट, (मण्डलेश्वर) १२ धरगाँव २२ बंजारी बड़दिया अन्नक्षेत्र, १० बड़वाह, ८ सुलगाँव, जंगलमार्ग ९ कुंडी, ३ वड़ेल, ३ मेहंदी खेड़ा, ६ तराण्या, ९ पीपरी वाल्मीकि आश्रम, ५ नामनपुर, ४ रतनपुर, ४ बावड़ीखेड़ा, ७ जयंतीमाता झरना, जंगलमार्ग में २३ पामाखेड़ी, १२ धर्मेश्वर आश्रम, ४ बाई जगवाड़ा, १० टिपरास, ४ मिरजापुर इमलीघाट, २ तमखाणा २ सिराल्या, ९ डावठा (जगदीश भाई अन्नक्षेत्र) ९ नेमावर दादूदयाल आश्रम, कुड़गांव, तुरनाल, तन्यागांव, तीतरी, करोड़, बीजलगांव नर्मदा मंदिर तक कुल दूरी १६ किमी, पीपलनेरिया, छीपानेर, रानीपुरा, चावस्या खेड़ी, सातदेव तक कुल दूरी १२ किमी, सीलकंठ, नीलकंठ, चनेठी, मंजली (व्यवस्था), खलगांव, बावरी, जोजवा, मट्ठागांव, ठप्पर, नेहलाई, रेवगांव तक कुल दूरी २९ किमी, ४ मरदानपुरा, ४ आवलीघाट, ९ तालपुरा, १० होलीपुरा, ३ सततुमड़ी, २ नीनोर, १२ पीली कटार, ५ बुधनी (आश्रम) ११ बान्दरा भान, १ जहाजपुर, ५ शाहगंज चीचली (आश्रम),५ बनेठा, ५ सुपाड़िया, २ हथनोर डोबी, ३ सरदार नगर, ३ जैत २ नारायण पुरा, ३ नांदनेर, ३ सुमनखेड़ा आश्रम, ६ भारकच्छ, २ गडरवास, ७ सनखेड़ा, १५ बगलखेड़ा (वानखेड़ी आश्रम) ४ सत्रावन ५ डूमर १० मांगरोल, ८ बरहा (सीताराम आश्रम) २ सुभाली, ४ केतुधान (शनि आश्रम) ३ मोहलखेड़ा, ९ बोरास (अन्नक्षेत्र) १३ अंघोरा स्वामी समर्थ आश्रम) ४ पतई़घाट, ३ शुक्लेश्वर, २ रिछावर, ७ टिमरावन, ६ हीरापुर, ६ करोंदी, ५ कतई, २ बेलथारी, ३ सीमरिया, २ झीरवी, ४ छतरपुर, २ खेड़ी खुर्द, १२ बरमान घाट आश्रम, २ मीढली, ५ हीरणपुर, ५ गुरसी, ५ रामपुरा आश्रम, ४ केरपाणी, ५ पथोरा, २ बारूखेडा, ४ मुरगाखेड़ा, ३ डोंगरगांव, १२ धुमखेड़ा आश्रम, ३ जोगीपुरा, ३ पावला, २ बरखेड़ी, ४ वरवठी, ५ खुणा, १४ सर्रा आश्रम, २ कुसली, ८ नीमखेड़ा, २ झांसीघाट, ८ शाहपरा, ४ शीतलपुर, २ जल्हेरीघाट, ४ सिद्धघाट, ४ पीपरिया रामघाट गोवत्स आश्रम, ८ भेड़ाघाट, ४ गोपालपुरा, २ लम्हेटा सरस्वती घाट, १२ ग्वारीघाट, २ कालीआश्रम, १० बरेला (आरबीएस पेट्रोल पंप पर व्यवस्था) ८ अमरकंटक फाटा ७ धनपुरी आश्रम, १० मनेरी माता आश्रम, २ गोरामबाबा चौसठ योगिनी मंदिर, १२ बंजारी माता, ३ हाथीतारा, २ गुदलई अन्नक्षेत्र, ४ भीखमपुर, ३ बिझौली, ३ विसौरा, ३ मानिकपुर आश्रम, ५ बिछिया, ३ कटंगी, ३ बजरंगकुटी, भदवाड़ा घाट शहपुरा (व्यवस्था), १ करोंदी, ६ शहपरा, ७ उत्कृष्ट काशी धर्मशाला वरगांव, ४ अमठेड़ा, ३ बरझड़, ४ अमेठा, ३ डोंगरिया (चौबे धर्मशाला) ७ आनाखेड़ा आश्रम, ५ विक्रमपुर, ९ गणेश पुरी(अजय साल) ५ शाहपुरा ९ जोगीटिकरिया, १२ रामघाट आश्रम, ४ रूसी माल, ५ दूधीघाट, ९ टेड़ी संगम चंदन घाट, ३ लालपुर, ३ बसंत पुर, ४ कंचनपुर आश्रम, २ शिवाला घाट, ५ ठाड़ पत्थर, ४ देवरी, ४ दमहेड़ी, ५ सलबारी, हेमसिंह मरावी सेवादार, ३ बिलासपुर, ५ पढरिया, ५ मोहदी (हरिशंकर पँवार घर सेवा), ७ हर्रईटोला, ५ खेड़ी सेमल, ५ दमगड़, ५ कपिलधारा, ५ रामकृष्ण कुटीर, ३ अमरकंटक (मृत्युंजय आश्रम) उत्तर तट समाप्त!

अमरकंटक (दक्षिण तट प्रारंभ) २ किमी माई की बगिया (उद्गम स्थल) १ किमी सोनमूढ़ा १ रेवा कुंड, ५ कबीर चबूतरा ८ किमी जगतपुर, ८ करंजिया आश्रम, ४ राम नगर, ३ अमलडीहा, ५ रूसा, ८ गोरखपुर, ९ मोहतरा आश्रम, ६ गाढ़ा सराई, ३ सागरटोला, ५ बोंदरगांव, २ सुनिया महर ५ खर गहना, ४ कुंडा हनुमान मंदिर, ९ किमी डिंडोरी रामआश्रम, २८ किमी राई, ७ हर्रा, १३ चावी व्यवस्था, ४ डेडिया, १ खाले ठिठोरी, ८ मोहगांव, १५ देवगांव बूढ़ी नदी संगम, ५ बिलगांव हनुमान मंदिर, ११ रामनगर, ९ मधुपुरी, २ घुघरा (नहर मार्ग से सूर्य कुंड), २ महाराजपुर, सड़कमार्ग ४ किमी अग्रवाल क्रशर व्यवस्था, २० बख्शी, ३ मसूर थावरी, २ भिलाई, ५ मोहगांव, ८ पहाड़ी गांव, ७ धनसोर, ५ बालपुर, ४ मेहताराय, ३ दरोड़कला, ३ कहानी, ३ मलखेड़ा, ४ सहसना, ५ सिहोरा, २ बुधवानी, ७ लखनादौन (सौरभ तिवारी व्यवस्था) १३ हनुमान मंदिर पिपरिया, ६ परासिया बंजारी माता, ५ मोराबीबी, (फारेस्ट डीपो) ३ मूंगवानी, ५ देवनगर, ४ बकोरी, ७ बचई, १६ नरसिंहगढ़, १६ करेली, ४ गढ़ेसरा, २ बनेसू, ८ करपगांव, १० बरहासू, १६ गडरवाड़ा, ४ कामली शनि मंदिर, २१ मालनवाड़ा, १० बनखेड़ी, २ वाचावानी, १७ पिपरिया, ४ हनुमान मंदिर ६ शोभापुर, १० करनपुर आश्रम, ४ सोहागपुर, १६ गुराड़ी, ११ बाबई, २२ होशंगाबाद नागेश्वर मंदिर व्यवस्था, ५ डोंगरवाड़ा, 
५ रंडाल, ९ पोकसर, ३ खरखेड़ी घाट, १२ आवलीघाट, १७ बावरी, १२ भिलाड़िया घाट, ५ हमीरपुरा, १० गोरागांव, ५ तजपुरा, ३ हनुमान मंदिर, ३ करताना, ६ गोंदागांव, ४ सनखेड़ी, ९ हरदा, ९ मक्खनभोग, ४ मसनगांव, ३ काकरिया, ५ मादला, ३ मुहालकला, ७ पीपरवड़, ४ पोखरनी, ९ दगड़खेड़ी, ९ धारखेड़ी, १६ छनेरा, ६ चारूखेड़ा (२ किमी भीतर मनरंगगिरी समाधि), ५ साडला, ५ माडला, ३ करोली, ५ सोम गांव, ५ सिंगाजी, २ किमी भीतर सिंगाजी समाधि, ६ बीड़, ५ मूंदी, ६ भमोरी, ६ जलवा बुजुर्ग, ५ देवला खुटला, ९ अटूट खास, १० हाथियाबाबा आश्रम, नहर मार्ग से १७ किमी ओंकारेश्वर परिक्रमा पूर्ण! नर्मदे हर!
नोट दी गई जानकारी नर्मदा परिक्रमा करने वाले पद यात्रियों के लिए महत्वपूर्ण है। शायद यह सूची आपको किसी काम आए अवश्य देखिए

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भारत के प्रथम बलिदानी राजा शंकर शाह एवं रघुनाथ शाह : आलेख श्री आनंद राणा



भारत के हृदय स्थल में स्थित त्रिपुरी (जबलपुर) के महान कलचुरी वंश का तेरहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में अवसान हो गया था। फलस्वरूप सीमावर्ती शक्तियाँ इस क्षेत्र को अपने अधीन करने के लिए लालायित हो रही थी। अंतत: इस संक्रांति काल में एक वीर योद्धा जादों राय (यदु राय) ने गढ़ा- कटंगा क्षेत्र जबलपुर में गोंड वंश की नींव रखी। कालांतर में यह साम्राज्य गोंडवाना साम्राज्य के नाम से जाना गया।

गोंडवाना साम्राज्य का स्वर्ण युग रानी दुर्गावती का समय था। एक समय अंतराल के बाद उत्तर भारत में राजनीतिक परिवर्तन हुए। मुगलों ने अकबर के नेतृत्व में मुगल साम्राज्य की उत्तर भारत में पुनर्स्थापना की। गोंडवाना साम्राज्य का वैभव और संपन्नता को देखकर अकबर ने गोंडवाना साम्राज्य को मुगल साम्राज्य में मिलाने के लिए सेनापति आसफ खान को भेजा। सेनापति आसफ खान के साथ रानी दुर्गावती के 6 युद्ध हुए जिनमें 5 युद्धों में रानी दुर्गावती विजयी रही। छठें युद्ध में आसफ खान के पास तोपखाना आ जाने और रानी दुर्गावती के एक सामंत बदन सिंह के विश्वासघात के कारण युद्ध के परिणाम विपरीत होने लगे तब रानी दुर्गावती ने 24 जून 1564 को अपने महावत के हाथों से कटार लेकर अपना प्राणोत्सर्ग किया। इसके बाद दलपति शाह के छोटे भाई राजा चंद्र शाह गोंडवाना साम्राज्य के राजा बने और यह साम्राज्य मुगलों के अधीन आ गया। राजा चंद्र शाह की 11 वीं पीढ़ी में राजा शंकर शाह का जन्म मंडला के किले में हुआ। इनके पिता का नाम सुमेर शाह और दादा का नाम निजाम शाह था।



18वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में भारत की राजनीतिक परिस्थितियों में आमूलचूल परिवर्तन आया और मराठों ने पेशवा के नेतृत्व में मुगलों से गोंडवाना साम्राज्य हस्तगत कर लिया। इसके साथ ही सुमेर शाह को मराठों के प्रतिनिधि के रूप में मंडला में राज्य संभालने थे। सन् 1804 में सुमेर शाह की मृत्यु हो गई।

सन् 1818 में गोंडवाना साम्राज्य मराठाओं के हाथ से निकल गया, अंग्रेजों ने मंडला को अपने अधीन कर लिया और मध्य प्रांत में मिला लिया। इसके बाद राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह को जबलपुर में गढ़ा पुरवा के पास के 3 गाँव की जागीर देकर पेंशन दे दी गई। राजा शंकर शाह अंग्रेजों के इस दुर्व्यवहार के विरुद्ध थे और अंग्रेजों से स्वतंत्रता चाहते थे। आगे चलकर महारथी शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह ने सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में तोप के मुंह से उड़कर (Blowing from a gun) संपूर्ण भारत में किसी भी रजवाड़े परिवार की ओर से प्रथम बलिदान दिया। 19वीं शताब्दी मध्यान्ह तक अंग्रेजों के अत्याचार और अनाचार चरम सीमा पार कर गए थे। डलहौजी की हड़प नीति के बाद भारत में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी जिसकी जानकारी राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह को भी लग गई थी। जबलपुर स्थित गढ़ा पुरवा में मंडला, सिवनी, नरसिंहपुर, सागर, दमोह सहित मध्य प्रांत के के लगभग सभी रजवाड़े परिवार, जमींदार, मालगुजार के साथ 52 गढ़ों से सेनानी भी मिलने आने लगे थे।

जबलपुर कैंटोनमेंट क्षेत्र से 52वीं नेटिव इन्फेंट्री के सूबेदार बलदेव तिवारी के साथ कई सैनिक राजा शंकरशाह और कुंवर रघुनाथ शाह से मिलने आते थे। राजा शंकर शाह एवं कुंवर रघुनाथ शाह ने अंग्रेजों के विरुद्ध शक्तिशाली संगठन तैयार कर लिया था। राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह ने मध्य प्रांत के रजवाड़े परिवार जमींदारों और मालगुजारों को एकत्रित करने के लिए रोटी और कमल की जगह दो काली चूड़ियों की पुड़िया जिसमें संदेश लिखा होता था कि "अंग्रेजों से संघर्ष के लिए तैयार रहो या चूड़ियाँ पहन कर घर बैठो"। जो रजवाड़े परिवार, जमींदार और मालगुजार इस पुड़िया को स्वीकार कर लेते थे तो इसका आशय होता था कि वे अंग्रेजों के विरुद्ध संग्राम में शामिल हैं और जो स्वीकार नहीं करते थे तो यह मान लिया जाता था कि वे साथ नहीं है। इस तरह से मध्य प्रांत में राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध एक मोर्चा तैयार हो गया था। उनका झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे तथा कुंवर साहब से भी संपर्क था।

महारथी मंगल पांडे ने 29 मार्च सन् 1857 में बैरकपुर छावनी में 34 वीं नेटिव इन्फेंट्री की ओर से प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का शंखनाद कर दिया। कानपुर, लखनऊ और दिल्ली से होने वाली भयंकर घटनाओं के समाचार भी राजा शंकरशाह और रघुनाथशाह तक पहुँचे। उत्तेजित हुए राजा शंकर शाह ने भी 10 सितंबर 1857 को जबलपुर में गढ़ा पुरवा में बैठक बुलाई और मध्य प्रांत में स्वतंत्रता संग्राम का श्रीगणेश करने की योजना भी बना ली, जिसमें मध्य प्रांत के अधिकांश रजवाड़े, जमींदार एवं मालगुजार एकत्रित हुए थे। ब्रिटिश सैन्य छावनी जबलपुर पर आक्रमण की योजना मोहर्रम के अवसर पर थी परंतु कुछ जमींदारों और मालगुजारों के अनुपस्थित होने और उचित समन्वय न होने के कारण योजना स्थगित कर दी गई। विजयादशमी को आक्रमण करने की योजना बनायी गई। जबलपुर कैंटोनमेंट छावनी से सैनिकों का राजा शंकर शाह और रघुनाथशाह के यहाँ आना-जाना था, इस बात की जानकारी जबलपुर के डिप्टी कमिश्नर क्लार्क को लग गई थी। इसलिए उसने गुप्तचरों को साधुओं के वेश में रहस्य जानने के लिए भेजा। राजा शंकर शाह को लगा कि यह हमारे ही सहयोगी हैं, इसलिए उन्होंने सारी योजना सविस्तार गुप्तचरों को बता दी। गुप्तचरों ने सारा वृतांत 14 सितंबर 1857 को डिप्टी कमिश्नर क्लार्क को सुनाया फलस्वरूप जबलपुर कमिश्नर इरेस्किन से अनुमति लेकर लेफ्टिनेंट क्लार्क ने 20 घुड़सवार सैनिक तथा 60 पैदल सैनिकों के साथ गढ़ा पुरवा में धावा बोला तथा राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके साथ ही दोनों की स्वरचित कविताएँ और लाल रंग का रेशमी थैला, जिसमें दस्तावेज और पत्र भरे थे, बरामद कर लिये गये। गिरफ्तारी करने के उपरांत उनको मिलिट्री केंटोनमेंट में रखा गया परंतु उसी रात को उन्हें छुड़ाने के लिए सूबेदार बलदेव तिवारी ने अपनी 52वीं नेटिव इन्फेन्ट्री के साथ बलवा किया, इसलिए राजा शंकर शाह-रघुनाथ शाह को कैंटोनमेंट से हटाकर रेसीडेंसी (रेजीडेंसी) में रखा गया। यहाँ डिप्टी कमिश्नर और दो अंग्रेज अधिकारी का न्याय आयोग बनाया गया। तीन दिन तक राजद्रोह का आपराधिक मामला चलाया गया और उनकी स्वरचित कविताएँ, जिसमें उन्होंने अंग्रेजी साम्राज्य के सर्वनाश की कामना माँ कालिका से की थी। उस पर गंभीर आपत्ति उठाई गई। साथ ही लाल रंग की रेशमी थैली में जो देसी रजवाड़ों, जमींदारों और मालगुजारों से पत्र व्यवहार किए थे उनको पढ़ा गया, जिसमें मध्य प्रांत में अंग्रेजों की सत्ता उखाड़ फेंकने की अपील की गई थी। राजा शंकर शाह और कुँवर रघुनाथ शाह ने सारे आरोप स्वीकार कर लिए, तब न्याय आयोग ने संधि प्रस्ताव प्रस्तुत किया। संधि की शर्तें थीं -राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह ईसाई धर्म स्वीकार स्वीकार करें, उन्हें अच्छी पेंशन दी जाएगी और वह विद्रोहियों का पता बता दें। इन शर्तों के मानने के बाद दोनों पिता-पुत्र को माफ कर दिया जाएगा। राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह ने यह स्वीकार नहीं किया। तब न्याय आयोग ने उन्हें फाँसी की सजा सुनाने का निर्णय लिया। राजा शंकर शाह-रघुनाथ शाह ने कहा कि - हम ठग, पिंडारी, चोर, लुटेरे, डाकू हत्यारे नहीं है, जो हमें फाँसी दी जाए, हम गोंडवाना के राजा हैं, इसलिए हमें तोप के मुँह से बांधकर उड़ाया जाए। न्याय आयोग ने भी विचार किया कि तोप के मुँह में बांध के उड़ाने से जनता में दहशत फैलेगी। इसलिए अच्छा है कि तोप के मुँह से बांधकर ही उड़ाया जाए। उधर राजा शंकर शाह बुद्धिजीवी थे और वह चाहते थे कि जब सार्वजनिक रूप से उन्हें तोप के गोले से उड़ाया जाएगा तो जन आक्रोश फैलेगा और मध्य प्रांत में भयानक संग्राम होगा।

अंततः 18 सितंबर 1857 को प्रातः 11 बजे 33वीं मद्रास नेटिव इन्फेंट्री सहित पाँच हजार सैनिकों के घेरे में रेसीडेंसी के सामने राजा शंकर शाह-रघुनाथ शाह को तोप के मुँह पर बांधा गया। चारों और अपार जनसमूह उमड़ आया था। पिता और पुत्र शांत चित्त होकर खड़े थे। उनके चेहरों में किसी भी प्रकार के भय के लक्षण नहीं थे। लेफ्टिनेंट क्लार्क के तोप के गोले से उड़ाने के आदेश के पूर्व राजा शंकर शाह ने उस स्वरचित कविता का प्रथम छंद गाया, जिसमें अंग्रेजों के सर्वनाश की प्रार्थना की गई थी और जिसे अंग्रेजों ने अपराध का एक आधार बनाया था। कविता का अंग्रेजी अनुवाद जबलपुर के कमिश्नर इरेस्किन ने किया था। कविता का प्रथम छंद राजा शंकरशाह ने इस प्रकार गाया "मूंद मुख डंडिन को चुगलों को चबाई खाई, खूंद डार दुष्टन को शत्रु संघारिका,

मार अंगरेज रेज पर देई मात चंडी,

बचे नहीं बेरी बाल बच्चे संहारिका,

संकर की रक्षा कर दास प्रतिपाल कर,

दीन की पुकार सुन जाय मात हालिका,

खाय ले म्लेच्छन को झेल नहीं करो मात,

भच्छन कर तत्छन ही बैरिन को घौर मात कालिका। "

दूसरा छंद पुत्र रघुनाथशाह ने और भी उच्च स्वर में सुनाया" कालिका भवानी माय अरज हमारी सुन,

डार मुण्डमाल गरे खड्ग कर धर ले,

सत्य के प्रकाशन औ असुर बिनाशन कौ, भारत समर माँहि चण्डिके संवर ले,

झुंड-झुंड बैरिन के रुण्ड मुण्ड झारि-झारि,

सोनित की धारन ते खप्पर तू भर ले,

कहै रघुनाथशाह माँ फिरंगिन को काटि-काटि, किलकि-किलकि माँ कलेऊ खूब कर ले"।... इसके बाद लेफ्टिनेंट क्लार्क ने तोप चलाने का आदेश दिया था और भयंकर गर्जना के साथ चारों तरफ धुआँ भर गया, राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह के हाथ-पाँव तोप से बंधे रह गए। शेष शरीर के मांस के लोथड़े और हड्डियाँ 50-50 गज दूर जाकर गिरीं, जिन्हें उनकी वीरांगना पत्नियों क्रमशः फूलकुंवर और मन कुंवर ने एकत्रित किया तथा कुंवर रघुनाथ शाह के पुत्र लक्ष्मण शाह ने अंतिम संस्कार किया।

इस तरह से प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भारत के रजवाड़ों में प्रथम बलिदानी, जिन्हें तोप के मुँह से बांधकर उड़ाया गया,वो राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह ही थे। चार्ल्स बाल ने द हिस्ट्री ऑफ इंडियन म्यूटिनी में लिखा है कि "राजा शंकर शाह-रघुनाथ शाह को जब तोप के मुँह से बांधा गया था तब भी उनकी आँखों में दया या याचना का भाव तक नहीं था"। एक चश्मदीद अंग्रेज अफसर के हवाले से द हिस्ट्री ऑफ इंडियन म्यूटिनी में कहा गया है कि" उनके पैर-हाथ जो बांध दिए गए थे, तोप के मुँह के पास पड़े थे और सिर तथा शरीर का ऊपरी भाग सामने की ओर लगभग पचास गज की दूरी पर जा गिरे थे। उनके चेहरों को जरा भी क्षति नहीं पहुँची थी और वे बिल्कुल शांत थे।" बात यहीं खत्म नहीं हुई क्योंकि राजा शंकर शाह की सहधर्मचारिणी रानी फूलकुंवर ने मंडला में अंग्रेजों से लड़ते हुए स्वयं अपना आत्मोत्सर्ग किया।

राजा शंकर शाह और कुँवर रघुनाथ शाह के विचार फलीभूत हुए कि "हमारे इस बलिदान के बाद सारे मध्य प्रांत में अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम छिड़ जाएगा" और वैसा ही हुआ। संपूर्ण मध्य प्रांत के अधिकांश रजवाड़े परिवार एवं जमींदार और मालगुजारों ने अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल बजा दिया।

राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह के बलिदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता है। आज भी उनकी बलिदान गाथा पर गीत और लोक गीत गाए जाते हैं। सन् 1946 में जब जबलपुर में सिग्नल कोर के 1700 सिपाहियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया तथा वो तिलक भूमि तलैया पहुँचे तब उन्होंने राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह को ही अपना नायक घोषित किया था। राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह की अमर बलिदान गाथा भारतीय इतिहास का वह पड़ाव है, जो चिरकाल तक भारतीयों को गर्व, गौरव और स्वाभिमान की अनुभूति कराता रहेगा। साथ ही वर्तमान और भावी पीढ़ी को स्वतंत्रता के लिए चुकाई गई कीमत का एहसास कराएगा, जिससे राष्ट्रवाद और देश भक्ति की भावना प्रबल होती रहेगी तथा यही भाव जागृत होंगे कि मैं रहूँ या ना रहूँ, मेरा यह भारत देश रहना चाहिए।...........



(लेखक : विभागाध्यक्ष - इतिहास, श्री जानकी रमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय, जबलपुर और उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकोशल प्रांत हैं)

स्रोत :- मध्यप्रदेश सरकार सूचना प्रकाशन एवं जनसम्पर्क भोपाल की आधिकारिक वेबसाइट 

नार्मदीय ब्राह्मण समाज के श्री जयदीप गोविंद ( IAS ) बने वाणिज्यिक कर अपील बोर्ड के अध्यक्ष

         श्री जयदीप गोविंद
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श्री जयदीप गोविन्द मध्यप्रदेश कैडर के 1984 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा से संबंध हैं। इन्होंने 14.01.2019 को राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के महासचिव के रूप में प्रभार ग्रहण किया। इनकी नियुक्ति ग्रामीण विकास, पंचायती राज, पेयजल एवं स्वच्छता तथा भू-संसाधन विभाग के मंत्रालयों में विशेष सचिव एवं वित्तीय परामर्शदाता के रूप में की गई थी जिनमें शामिल हैं फ्लैगशिप योजनाएं जैसे मनरेगा, प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान, एन.आर.डी.डब्ल्यू.पी., स्वच्छ भारत मिशन, डिजिटल इंडिया, लैण्ड रिकॉर्ड मौर्डनाइजेशन प्रोग्राम आदि। वे भारत सरकार में विभिन्न महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे जैसे गृह मंत्रालय में अपर सचिव तथा इन्होंने अनेक जटिल क्षेत्रों पर कार्य किया जैसे वामपंथी उग्रवाद तथा पुलिस आधुनिकीकरण एवं सी.ए.पी.एफ. के लिए प्राप्ति आदि। श्री गोविन्द ने गृह मंत्रालय में केन्द्र-राज्य अनुभाग तथा मानव अधिकार अनुभाग का कार्य देखा। इन्होंने मानव तस्करी पर न्यूयार्क में यू. एन. फॉरम को संबोधित किया तथा बैंकॉक में महिलाओं एवं बच्चों की तस्करी की महत्त्वपूर्ण बैठक में भाग लिया। इन्होंने भारत सरकार में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय, जे एण्ड के अफेयर्स विभाग, जनजाति मंत्रालय में भी अपनी सेवाएं दी। इन्होंने मध्य प्रदेश में उज्जैन में तीन वर्ष तक मंडल आयुक्त के रूप में, आयुक्त (जनजाति) मध्य प्रदेश तथा तकनीकी एवं उच्च शिक्षा में प्रमुख सचिव के रूप में कार्य किया। मुख्य निर्वाचन अधिकारी, मध्यप्रदेश के रूप में इन्होंने 2014 में लोकसभा चुनाव कराने के लिए देश में सर्वोत्तम सी.ई.ओ. का विशेष पुरस्कार जीता तथा विधानसभा चुनाव कराने के लिए वर्ष 2013 में सर्वोत्तम राज्य पुरस्कार भी प्राप्त किया। इन्होंने मध्यप्रदेश में जनजातीय आयुक्त रहते हुए वन अधिकार अधिनियम के प्रभावी कार्यान्वयन हेतु टीम के रूप में वर्ष 2010 में प्रधानमंत्री से सिविल सेवकों के लिए उत्कृष्टता पुरस्कार प्राप्त किया।