तुम अनचेते चेतोगे कब समझ स्वयं की देखोगे कब

तुम अनचेते चेतोगे कब
समझ स्वयं की देखोगे कब
जागो उठो सवेरा समझो
देखो एक सलोनी छाजन बुनालो
बेल अंकुरित सेम की देखो
खोज रही हैं सहज सहारा .!
आज सोच लो सोचोगे कब
सुनो आज बस सुर इक गाना
वंदे मातरम गीत सुहाना
भारत में भारत ही होगा
मत विचार क़र्ज़ के लाओ

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!