Ad

कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

6 नव॰ 2011

श्रीमति मनोरमा तिवारी की कविता : रानी-बिटिया





श्रीमती मनोरमा तिवारी जबलपुर की वरिष्ठ कवयित्री हैं. आपने अपना सम्पूर्ण जीवन अध्यापन एवं साहित्य सृजन को समर्पित किया है. सेवानिवृत्ति के पश्चात भी आप साहित्यिक एवं सामाजिक सरोकारों से जुड़कर स्वयं को धन्य मानती हैं. आपकी लेखनी में काव्य में प्रांजलता का समावेश स्पष्ट देखा जा सकता है. आपकी रचनाओं में विविधता के साथ साथ सारगर्भिता भी दिखाई देती है.
"रानी बिटिया" उनकी कविता है.
डा० विजय तिवारी किसलय के सौजन्य से आभार सहित 

15 अग॰ 2011

लोकतंत्र को आलोक तंत्र बनाने की कवायद


लोकतंत्र को 
आलोक-तंत्र बनाने की कवायद करता.
भारत पैंसठ साल का  बुड्ढा..  हो गया..
अपनी पुरानी यादों में खो गया.......!!
दीवारों पर कांपते हाथों से लिख रहा था 
"आलोक-तंत्र"
लोग भी आये आगे 
बूढ़े का मज़ाक  उड़ा कर भागे..!!
                                                 कुछ खड़े रहे मूक दर्शक बन ..!
                                                 कुछ गा रहे थे बस हम ही हम..!! 

कोलाहल तेज़ हुआ फ़िर बेतहाशा 
हर ओर नज़र छाने लगी निराशा !
सबकी अलग थलग थी भाषा-
कांप रही थी बच्चों की जिग्यासा !!
कल क्या होगा.. सोच रहे थे बच्चे 
एक बूड़ा़ बोला :-"भागो किसी लंगड़े की पीठ पे लद के ही "
जान बचाओ.. छिप छिपाकर.. 
हमें नहीं चाहिये न्याय
क्या करेंगें स्विस का पैसा लेकर 
फ़हराने दो उनको तिरंगा ये
है उनका
संवैधानिक अधिकार...
रामदेव..अन्ना... सब कर रहे
शब्दों का व्यापार..
अरे छोड़ो न यार
फ़िज़ूल में मत करो वक्त बरबाद..
गूंगे फ़रियादीयो कैसे बोलोगे
बहरी व्यवस्था की भी तो कोई मज़बूरी है
वो कानों से देखेगी...!!
सदन में चीत्कारेंते हैं..
हमारे लिये हां..ये वही लोग हैं जो
सड़क पर दुत्कारतें हैं...
पूरे तो होने दो पांच साल
बदल देना
इस बरगद की छाल...
                                                 अभी चलो घर चलतें हैं..

  

24 फ़र॰ 2011

सच तुम जो भी हो आभासी नही

साभार : ब्लॉग "लाइफ" से
तुम्हारी प्यार भरी
भोली भाली बातें
सुन
बन जातीं हैं रातें लम्बी रातें
तुम कौन हो ? क्यों हो ?
इस आभासी दुनिया
के उस पार से
जहां एक तिनके की आड़ लेकर
देख रहीं हो कनखियों से
कह देतीं हो वो
जो
कलाकार गढ़तें है
वही जो गीतकार रचते हैं
फ़िर भी खुद से पूछता हूं
कल पूछूंगा उनसे तुम कौन हो ?
सच तुम जो भी हो आभासी नही
 प्रेम की मूर्ति
 हां वही हो जो
गढ़तें हैं लिखते हैं
कलाकार गीतकार

25 जन॰ 2010

कौन हूँ मैं

हिन्दु हूँ
या
मुस्लिम हूँ
मत पूछो,
कहाँ से आया,
कौन हूँ मैं
इसे भी पढ़ें : बस! एक गलती
बस!
इतना जानूँ
मानवता
धर्म मेरा
है यही
कर्म मेरा
बहता दरिया,
चलती पौन हूँ
मत पूछो,
कहाँ से आया,
कौन हूँ मैं
इसे भी पढ़ें : एक संवाद, जो बदल देगा जिन्दगी
दुनिया
एक रंगमंच
तो कलाकार हूँ मैं
धर्म रहित
जात रहित
एक किरदार हूँ मैं
जात के नाम पर
अक्सर
होता मौन हूँ मैं
मत पूछो,
कहाँ से आया,
कौन हूँ मैं
इसे भी पढ़ें : फेसबुक एवं ऑर्कुट के शेयर बटन
जिन्दगी
है एक सफर
तो मुसाफिर हूँ मैं
जो छुपता नहीं
धर्म की आढ़ में
वो काफिर हूँ मैं
काट दूँ एकलव्य का अंगूठा
न कोई द्रोण हूँ मैं
मत पूछो,
कहाँ से आया,
कौन हूँ मैं
इसे भी पढ़ें : नेताजी जयंती "तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूंगा" नेताजी और जबलपुर शहर
पौन-पवन,

1 अक्टू॰ 2009

बाबूजी तुम हमें छोड़ कर…..!”

           पुनर्प्रकाशन के लिए क्षमा प्रार्थना सहित
मेरे सपने साथ ले गए
दुख के झंडे हाथ दे गए !
बाबूजी तुम हमें छोड़ कर
नाते-रिश्ते साथ ले गए...?
काका बाबा मामा ताऊ
सब दरबारी दूर हुए..!
बाद तुम्हारे मानस नाते
ख़ुद ही हमसे दूर हुए.

अब तो घर में मैं हूँ माँ हैं
और पड़ोस में विधवा काकी
रोज़ रात कटती है भय से
नींद अल्ल-सुबह ही आती.

क्यों तुम इतना खटते थे बाबा
क्यों दरबार लगाते थे
क्यों हर एक आने वाले को
अपना मीत बताते थे

सब के सब विदा कर तुमको
तेरहीं तक ही साथ रहे
अब हम दोनों माँ-बेटी के
संग केवल संताप रहे !

दुनिया दारी यही पिताश्री
सबके मतलब के अभिवादन
बाद आपके हम माँ-बेटी
कर लेगें छोटा अब आँगन !

11 अग॰ 2009

विश्व का वास्तविक संगीत

वो
दिव्य चक्षु
नर्मदा तट पर
जब
बिखेरता है
एकतारे की तान !!
स्तब्ध हो जातीं हैं
मन में प्रवाहित वेदनाएं
रुक जातीं थीं
पथचारी की बे परवाह कुंठाएं !!
लौटतीं हैं जब एक तारे की तान
भेडाघाट की संग-ए-मरमर टकरा कर
तब लगता है साक्षात अध्यात्म और सुकून कहीं और नहीं
"यहीं है हाँ यहीं है "

21 मई 2009

अपनी शक्ति के अनुप्रयोग से दूर

http://www.bel-india.com/BELWebsite/images/EVM.jpg
तुम जो सरकारें बनाते हो
तुम जो सरकारें सजाते हो
तुम जो जनतंत्र हो
कोई अपराधी नहीं
तो फिर क्यों
अपनी शक्ति के
अनुप्रयोग से दूर थे
तुम्हारा यही निठ्ल्ला-पन
तुमको एक बार फिर गुलाम
बना सकता है
जैसे अभी भी हो
आयातित विचारों के गुलाम
  • गिरीश बिल्लोरे"मुकुल"
आराम के इस दौर में कोई न दखल दे
नींद न तोडे भले सब कुछ वो मसल दे
{लिंक नोट पेड़ से साभार }

17 अप्रैल 2009

गुमशुदा मानसून

http://www.swpc.noaa.gov/primer/primer_graphics/Sun.png

कुछ पर्यावरण प्रेमियों के,
प्रकृति को बचाने की कोशिशें,
जिनके हाथ लगती है-
एक तपती हुई दोपहरी
और तड़पती देहों का मेला।।

मौसम विभाग की सलाह
अनदेखे ऊसरी दस्तावेज़,
मुँह चिढ़ाते,
धूप में खेतिहर मजूर-
साधना के वादे निभाते।।
उन्हें भी हासिल है,
तपती दोपहरी,
और तड़पती देह का मेला।।

मेधा से बहुगुणा तक अनशनरत तपस्वी,
रियो-डि-जेनरियो के दस्तावेज़।
उगाने को तत्पर-
नई प्रकृति - नए अनुदेश।
मिलेगी-हमें-
दरकती भू
तपती दोपहरियाँ
और तड़पती देहों का मेला।

चित्र साभार : यहाँ से यानी गूगल बाबा की झोली से

18 मार्च 2009

सच तुम्हारी वज़ह से ही


तुम जो कल तक
आंकते थे कम
आज भी आंको
उतने ही नंबर दो मुझे जितने देते आए हो
मित्र ..?
मत मेरे यश को सराहो
मुझे याद है तुम्हारे
पीठ पीछे कहे विद्रूप स्वरों के शूल
जो चुभे थे
जी हाँ वे शूल जो विष बुझे थे
मित्र
अब सुबह हो चुकी है
तुम्हारी वज़ह से
सच तुम्हारी वज़ह से ही
मैंने बदला था पथ
जहां था ईश्वर
बांह पसारे मुझे सहारा दे रहा था
उसे ने ये ऊंचाई दी है मुझे
काश तुम होते मुझे
कम आंकने वाले
तो आज मैं यहाँ होता !!

26 फ़र॰ 2009

मेरे शहर की शिलाए कोमल

है मेरी माटी की भीनी खुशबू
मेरे शहर की शिलाए कोमल
जो इस को पाए वो इसको गाए
इधर का मंजर न होता ओझल
**************************
न भूल पाया हूँ तंग गलियाँ
जहां है चौड़े दिलों के आँगन
जहाँ सभी को सभी ने जाना
शहर जबलपुर विशाल दरपन
**************************
यहीं कबीरा सिखाने आया
यही कहीं से उठा था ओशो
इसे थी ताक़त नूर ने दी
जी हाँ सुभद्रा ! किरण थी वो तो
**************************
यहीं से ज्ञान रंजित पहल उठी थी
यहीं से पीतल का घोड़ा दौडा
यही से अमृत ने पूजी रेवा
यहीं मिलन का फलक था चौड़ा
**************************
यहीं मुकुल ने सपन सजाए
यहीं सुरों के सजा दूं मेले
सहर जबलपुर की तासीर देखो
न तुम अकेले न मैं अकेला
**************************

1 फ़र॰ 2009

सुनो !


"सच....?"
दुनियाँ और आप
एक दूसरे के लिए
"पहेली से हैं "
आप जो दुनियाँ को
अपना चाबुक मारें उसके पहले दुनियाँ
आपको चाबुक जड़ देगी
"झूठ .....!"
जी हाँ
सफ़ेद झूठ
की आप दुनियाँ को चला रहें हैं ...?
हाँ एक बात और
कुत्ता गाड़ी के नीचे रात भर चले
स्वामी भक्ति है
किंतु
बैल की बुराई न बताए कि
वो ही रात भर गाड़ी खींच रहा था ....!!

26 जन॰ 2009

पालने से पालकी तक

“पालने से पालकी तक बेटियों का सुदृढ़ जीवन सफल जीवन “

पालने और पालकी को

सजाने की

समझ जो है - "बेहतर है....!"

ज़िन्दगी बेटियों की

भी संवारी जाए तो अच्छा !!

पालने में दुलारो खूब

बिटिया को "बेहतर है....!"

ज्ञान-साहस से सजी बिटिया

बिदा की जाए तो अच्छा ..

28 दिस॰ 2008

ये नन्हें मज़दूर : ये रोटी की तलाश में मज़बूर


देख रहे हैं न आप ये चित्र ?
बोलती आंखों से बात बांचेगा कौन
क्यों हो मौन
गौर से देखो चित्र
मेरी...?
तुम्हारी....?
हम सब की
जिम्मेदारी है मित्र !!
(सभी फोटो भाई संतराम चौधरी )

7 दिस॰ 2008

तुम अनचेते चेतोगे कब समझ स्वयं की देखोगे कब

तुम अनचेते चेतोगे कब
समझ स्वयं की देखोगे कब
जागो उठो सवेरा समझो
देखो एक सलोनी छाजन बुनालो
बेल अंकुरित सेम की देखो
खोज रही हैं सहज सहारा .!
आज सोच लो सोचोगे कब
सुनो आज बस सुर इक गाना
वंदे मातरम गीत सुहाना
भारत में भारत ही होगा
मत विचार क़र्ज़ के लाओ

तुम अनचेते चेतोगे कब समझ स्वयं की देखोगे कब

तुम अनचेते चेतोगे कब
समझ स्वयं की देखोगे कब
जागो उठो सवेरा समझो
देखो एक सलोनी छाजन बुनालो
बेल अंकुरित सेम की देखो
खोज रही हैं सहज सहारा .!
आज सोच लो सोचोगे कब
सुनो आज बस सुर इक गाना
वंदे मातरम गीत सुहाना
भारत में भारत ही होगा
मत विचार क़र्ज़ के लाओ

13 सित॰ 2008

उड़ानों में व्यस्त हैं।

मन का पंछी
मन का पंछी खोजता ऊँचाइयाँ,
और ऊँची और ऊँची
उड़ानों में व्यस्त हैं।
चेतना संवेदना, आवेश के संत्रास में,
गुमशुदा हैं- चीखों में अनुनाद में।
फ़लसफ़ों का ,
दृढ़ किला भी ध्वस्त है।
मन का पंछी. . .
कब झुका कैसे झुका अज्ञात है,
हृदय केवल प्रीत का निष्णात है।
सुफ़ीयाना, इश्क में अल मस्त है-
मन का पंछी. . .
बाँध सकते हो तो बाँधो,
रोकना चाहो तो रोको,
बँधा पंछी रुका पानी,
मृत मिलेगा मीत सोचा,
उसका साहस और जीवन
इस तरह ही व्यक्त है।।
मन का पंछी. . .

2 सित॰ 2008

जो जिया वो प्रीत थी ,


जो जिया वो प्रीत थी ,अनजिया वो रीत है
शब्द भरम को तोड़ दे ,वोही तो मेरा गीत है
######################
प्रीत के प्रतीक पुष्प -माल मन है गूंथता
भ्रमर बागवान से -"कहाँ है पुष्प ?" पूछता !
तितलियाँ थीं खोजतीं पराग कण
पुष्प वेणी पे सजा उसी ही क्षण ,!
कहो ये क्या प्रीत है या तितलियों पे जीत है…….?
शब्द भरम को तोड़ दे ,वोही तो मेरा गीत है !
######################
सुबह,-"सुबह" उदास सी,उठी विकल पलाश सी
चुभ रही थी वो सुबह,ओस हीन घास सी
हाँ उस सुबह की रात का पथ भ्रमित सा मीत है
शब्द भरम को तोड़ दे ,वोही तो मेरा गीत है !
######################
तभी तो हम हैं हम ज़बाँ को रात में तलाशते
मिल गए तो खुश हुए,मिले न तो उदास से
यही तो जग की रीत है हारने में जीत है
शब्द भरम को तोड़ दे ,वोही तो मेरा गीत है !
######################

25 अग॰ 2008

मैं तुम्हारा आख़िरी ख़त

एक
मैं तुम्हारा आख़िरी ख़त जाने किसके हाथ आऊं
तुम पढो इक बार मुझको इक नया संचार पाऊं !
सौंपना चाहो मुझको सौंप दो पीडा का सागर
मैं उसे मथ भेज दूंगा काढ़ के अमिय-गागर...!!
दो

स्वप्न प्रिया
मैंने भी देखे हैं सपने
चांदनी से सपने…..
क्या पूरे होंगे कभी?
मुझे नहीं मालूम
फिर भी मेरा हक है
सपने देखने का
वो सपना जो तुमको
मुझसे मिलाता है
पूरा ही तो है
कौन कहता है स्वप्न पूरे नहीं होते
*गिरीश बिल्लोरे मुकुल

29 जुल॰ 2008

तुम जो आईने को ...!!

तुम
जो आईने को अल्ल-सुबह मुँह चिढाती
फिर तोते को पढाती ....!
तुम
जो अलसाई आँखें धोकर
सूरज को अरग देतीं....!
मुझे वही तुम
नज़र आतीं रहीं दिनभर
घर लौटा जो ...
तुमको न पाकर लगा
हाँ ....!
तुम जो मेरी स्वप्न प्रिया हो
शायद मिलोगी मुझे आज
रात के सपने में ...!
उसी तरह जैसा मेरे मन ने
देखा था
"मुँह अंधेरे आए सपने में "
तुम
जो आईने को अल्ल-सुबह मुँह चिढाती
फिर तोते को पढाती ....!
तुम
जो अलसाई आँखें धोकर
सूरज को अरग देतीं....!
*गिरीश बिल्लोरे "मुकुल

कितना असरदार

Free Page Rank Tool

यह ब्लॉग खोजें