भोजपुरी दोहे: आचार्य संजीव 'सलिल'

भोजपुरी दोहे:

आचार्य संजीव 'सलिल'

कइसन होखो कहानी, नहीं साँच को आँच.
कनके संकर सम पूजहिं, ठोकर खाइल कांच..

कतने घाटल के पियल, पानी- बुझल न प्यास.
नेह नरमदा घाट चल, रहल न बाकी आस..

गुन अवगुन कम- अधिक बा, ऊँच न कोइ नीच.
मिहनत श्रम शतदल कमल, मोह-वासना कीच..

नेह-प्रेम पैदा कइल, सहज-सरल बेवहार.
साँझा सुख-दुःख बँट गइल, हर दिन बा तिवहार..

खूबी-खामी से बनल, जिनगी के पिहचान.
धुप-छाँव सम छनिक बा, मन अउर अपमान..

सहारण में जिनगी भयल, कुंठा-दुःख-संत्रास.
केई से मत कहब दुःख, सुन करिहैं उपहास..

फुनवा के आगे पडल, चीठी के रंग फीक.
सायर सिंह सपूत तो, चलल तोड़ हर लीक..

बेर-बेर छटनी क द स, हरदम लूट-खसोट.
दुर्गत भयल मजूर के, लगल चोट पर चोट..

दम नइखे दम के भरम, बिटवा भयल जवान.
एक कम दू खर्च के, ऊँची भरल उडान..

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3 टिप्‍पणियां:

  1. भाई भोज पुरी तो समझ मै नही आती लेकिन जहां तक पढे अच्छे लगे

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  2. Saandar
    Badhaiya
    सहारण में जिनगी भयल, कुंठा-दुःख-संत्रास.
    केई से मत कहब दुःख, सुन करिहैं उपहास.

    उत्तर देंहटाएं

कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!