खेल को खेल रहनो दो भई



भारत की जीत की रात जगह जगह जोश में होश खो बैठे लोग सड़कों पर उतर आए . खुश तो हम भी थे आप भी होना भी चाहिये गौरव के पल थी पर ये क्या बकौल श्याम नारायण रंगा  "हम चाहते हैं कि वे लड़े और हमें मजा आए और अगर अगर हमारा सांड या मुर्गा हार गया तो हम उसको लानते मारते हैं और जलील करते हैं और जीत गया तो उसकी पूजा करते हैं और सम्मान देते हैं।" सच्चा सवाल उठाया  रंगा जी ने उस रात मैने भी सड़कों पर देखा आमतौर पर लोग खुशियां कम श्रीलंकाई टीम की पराजय और पाकिस्तान के प्रति ससंदीय संबोधन किये जा रहे थे... सड़कों पर शराब की बाटले बीयर की बाटलें तेज़ वाहन पर "जै श्री राम" के नारे लगाती युवा टोलियां. शराब के नशे में चूर अति उत्साही लोग ... जिनकी वक्र-रेखित चाल उफ़्फ़ क्या सम्मान-जनक जीत के लिये इतना अनुशासन ही माहौल. राम को सड़क उत्तेजना का साधन बनाते युवा राम का मान कर रहे थे या बस..!
    श्रीलंका से जीत जैसे रावण के राज्य को ध्वस्त कर दिया हो. पौराणिक कथाऒं के पात्र रावण का नाम ले ले के कुछ युवा चीख रहे थे "चारों तरफ़ मचा है शोर : हारे सीता मैया के चोर" या और भी कई नारे जो किसी पंथ धर्म संस्कृति का अपमान कर सकने में सहायक है गूंज रहे थे . ये क्यों क्या यही विजेता का व्यक्तित्व है. न ये कुण्ठा है, यह मनो-रोग है यह लिप्सा है . 
उधर पाकिस्तान  में भारत के प्रति नफ़रत क्रिकेट के ज़रिये फ़ैलाई जाती है. तो भारत में भी कतिपय लोग (सभी नही) पाकिस्तान की विजय को "उत्तेजक हर्ष में बदलते हैं " कोई किसी से कम नहीं. हर तरफ़  उन्मादी ही उन्मादी  नज़र आते हैं . गौर से देखिये इनमें देश भक्त शायद कोई एकाध मिलेगा, ज़रा एक बार इनसे पूछिये कितनी बार रक्त दान किया कितनी बार भूखों को भोजन दिया कितनी बार पेड़ लगाये, कितनी बार घूस लेने देने का विरोध किया, कितनी बार याता यात नियमों का पालन किया यदी यह न किया हो तो ऐसे लोग सच "देश द्रोही नहीं तो क्या भगत सिंह शिवाजी, या स्वयम मर्यादा-पुरुषोत्तम राम हैं. " 
     भारत क्या जीता मुन्नी की बदनामीं पर अश्लील तरीके से कूल्हे मटकाए लड़कों ने. सड़कों पर शीला की जवानी का सम्मान किया अनावृत होकर नाचते हुए वाह रे युवाओ    

    रंगा जी के इस कथन पर गौर कीजिये :-"भारत ने विश्वकप क्रिकेट का फाइनल मुकाबला जीत लिया है, इस बात की हमें बहुत खु्शी है कि भारत ने आखिर एक खेल में तो अपना परचम फहराया और विश्व में सर्वश्रेष्ठ होने की बात साबित की। मगर मैं अभी जो बात करना चाहता हूं वो इस माहौल से थोड़ी हट कर है। हमारे देश में क्रिकेट का बुखार इस कदर हावी है कि जो व्यक्ति क्रिकेट का मैच देखता है उसे बड़े सम्मान की नजर से देखा जाता है और अगर किसी भी कारण या खेल भावना से प्रेरित होकर कोई व्यक्ति भारत के किसी खिलाड़ी के बॉलिंग करने के तरीके या बैटिंग करने के तरीके पर नकारात्मक टिप्पणी कर दे तो उसे बड़े संदेह की नजर से देख कर देशद्रोही तक कह दिया जाता है। हमारे देश में वर्तमान में क्रिकेट प्रेमी को ही देशप्रेमी माना जाता है, अगर आप क्रिकेट से प्रेम नहीं करते तो लोग आपको बड़ी उपेक्षा की नजर से देखते हैं। भारत पाकिस्तान के बीच मैच के कारण भारत और पाकिस्तान के लोगों के मन में जो ज़हर था वो निकल गया। वास्तव में अगर मैं कहूं तो हम हिंसा और युद्ध के प्रेमी ही रहे हैं और हार व जीत में ही आनंद मिलता है। हमारे ऐतिहासिक नायक राम, कृष्ण, अर्जुन, भगतसिंह हमें लड़ते हुए ही अच्छे लगे हैं। ये लोग लड़ते रहे और हम इनको पूजते रहे और इनकी प्रतिमाएं और तस्वीरों का बाजार खड़ा कर दिया ताकि लोग इनसे प्रेरणा लेते रहे।" 

जी कितना नकारात्मक वातावरण है दिलों में जो 
अब देखा ही होगा आपने कि हम पाकिस्तान को हराने के लिए कितना आमदा थे और चाहते थे कि हर हाल में हमारे षेर जीते। पाकिस्तान से जिस दिन भारत का मैच था उस दिन तो जूनून देखने लायक था और ऐसा लग रहा था जैसे पूरा देशही युद्ध का मैदान बन गया हो और हर व्यक्ति इसमें योद्धा बनकर अपनी भूमिका निभा रहा हो। उस दिन सबके मुंह से यही सुना जा रहा था कि चाहे विश्व कप न जीत पाए लेकिन पाक को हराना जरूरी है। हम पाकिस्तान को हराने में शौर्य महसूस करते हैं लेकिन उनको हराने में नहीं जिनके हम दो सौ साल तक गुलाम रहे और जिन्होंने हमे जोंक की तरह चूसा और हमारे अस्तित्व को मिटाने का भरसक प्रयास किया। हम यह भूल जाते हैं कि पाकिस्तान भी उनकी ही देन है और पाकिस्तान से दुश्मनी भी उनकी ही देन है। मेरी इस बात पर सैंकड़ो तर्क आ जा सकते हैं लेकिन कोई यह मानने को तैयार नहीं होगा क्योंकि हमें सिर्फ जीत चाहिए थी अगर हार जाते तो इल्जाम लगाते, भला बुरा कहते। हमारी मानसिकता है यह कि हम अपने ही भाई को अपना सबसे बड़ा दोस्त और सबसे बड़ा शत्रु मानते हैं और जब कभी भी मौका पड़ता है तो अपने  ही व्यक्ति को नीचा दिखाने की कोशिश  करते हैं। 


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कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!