बाबूजी का भाषण : कृष्ण अपने धराधाम पर आने की प्रासंगिकता बताते हुए कहते हैं-‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानम् अधर्मस्य तदात्मानम् सृजाम्यहम्। परित्राणाय साधुनां विनाशाय च दुष्कृताम्. धर्म संस्थापनार्थाय संभावामि युगे-युगे।’


प्रियजन
              .हम  असीम उत्साह से हैं.. क्यों है हममें उत्साह आप समझ सकते हैं  कृष्ण का पाज़ीटिविटी से भरा व्यक्तित्व किसे मोह न नहीं पाया कौन उस से अछूता है.. शायद कभी भी कृष्ण से कोई अलग न रह सकेगा.
      कृष्ण एक अवतार हैं इस सवाल को लेकर तर्कवादी कुछ भी कहें मेरी आपकी और उन सभी की नज़र में अवश्य अवतार हैं जो पाज़िटिव सोच के साथ जी रहे हैं...
         यश,धन,सामर्थ्य,की लालसा कृष्ण से दूर करती है यही सच है.. जिनके मन में इस की लिप्सा नहीं वो कृष्ण के बहुत नज़दीक हैं. सब जानतें हैं मीरा को और सब पहचानतें हैं रसखान को ..दौनों का चिंतन इतना सहज-समर्पित था कि एक ने यशोदा की नज़र कान्हा का बचपन देखा और गा उठे रसखान
“वा छवि को रसखान विलोकत
वारत काम कलानिधि कोटि..!!”
    मीरा ने तो प्रभू के चिंतन का पथ पाने राजसी ऎश्वर्य ठुकरा दिया.
    कृष्ण को सब जानते हैं किंतु कम ही लोग पहचान रहे हैं. जिसका मूल कारण है  हम केवल उससे परिचित होना चाहते हैं जो भौतिक रूप से नज़र आता है. वह  जो हमारे लिये लाभकारी हो वो ही हमारा भगवान है. जो हमारे लिये अनुपयोगी है  हम उसकी निंदा करेंगे. जो अकारण किसी की भी निंदा करता है वह ईर्ष्या और अशांति को जन्म देता है..
                आपने सोचा कभी कि कुरुक्षेत्र के युद्ध के कारणों में द्रोपदी के मुख से निकला वाक्य “अंधे का पुत्र अंधा” युद्ध का प्रमुख कारण था.सबसे बड़ा उदाहरण है यह पारिवारिक विद्वेश का..
                   आप समझ गये हैं न कि अकारण किसी  निंदा कितनी विष्फ़ोटक होती है. लोग जो हमेशा छिद्रांवेषण में लगे होते हैं उनका ह्रदय कुरुक्षेत्र बन जाता है. फ़िर उनका घर फ़िर उनका समाज यानी महाभारत सदा जारी रखने वाले ये लोग अब समझें कि किसी का उपहास न करेंगें . माएं अपने बच्चों से किसी की निंदा न करेंगी मुझे विश्वास है. घर में सभी का सम्मान हो सबकी बातों के मूल्य को समझा जाए . बच्चे की भावना , पत्नि की अभिव्यक्ति, यानी सबके विचार को सुनना और समझना बहुत ज़रूरी है. सभी महत्वपूर्ण हैं एक परिवार के लिये जब आप उनको समझोगे तभी उनसे आपका एक  विश्वासी रिश्ता कायम होगा. और पाजिटिव सोच को रास्ता मिलेगा. बच्चे भी समाज के साथ  विश्वासी रिश्ता कायम करने के लिये सदा तत्पर होंगे और बन सकेगा एक प्रगतिशील समाज.

1 टिप्पणी:

कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!