श्री जगदीश जटिया जी को जन्म-दिवस की शुभमनाएं


  जब कभी भी मुड़ मुड़ कर देखा
पाया तुमको उस जगह पे
जहां से सम्पर्क सरिता नृत्य करती आ रही है..
आज़ साथी फ़िर तुम्हारी याद मुझको आ रही है..
वो सुबकती आंख जिसने तुमको याद है क्या..
बोझ पुस्तक का लिये एक  बूढ़ा देवता याद तो आता ही होगा..?
 हां वही जो सरो-पा था देवता
लोग कहते हैं ..
अच्छा वो जो किताबें बेचता ?
हां वही सेतु हमारे बीच का
जो हमारी कुशलता का दीप था
उसी को मै याद करके खूब रोया
नम-नयन हैं पर खबर ये है कि
आज जन्म-दिन तुम मनाने जा रहे हो
उस महा योगी के संग याद मुझको आ रहे हो !!
"जन्म-दिन की अशेष शुभकामनाओं के साथ "

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कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!