चित्र पर कविता: उल्लास

चित्र पर कविता:
उल्लास  

इस स्तम्भ की अभूतपूर्व सफलता के लिये आप सबको बहुत-बहुत बधाई. एक से बढ़कर एक रचनाएँ अब तक प्रकाशित चित्रों में अन्तर्निहित भाव सौन्दर्य के विविध आयामों को हम तक तक पहुँचाने में सफल रहीं हैं. संभवतः हममें से कोई भी किसी चित्र के उतने पहलुओं पर नहीं लिख पाता जितने पहलुओं पर हमने रचनाएँ पढ़ीं. 

चित्र और कविता की कड़ी में संवाद, स्वल्पाहार,
दिल-दौलत, प्रकृति, ममता,  पद-चिन्ह, जागरण,  परिश्रम, स्मरण, उमंग, सद्भाव, रसपान, विश्राम, निशाना  आदि के पश्चात् प्रस्तुत है नया चित्र  उल्लास . ध्यान से देखिये यह नया चित्र और रच दीजिये एक अनमोल कविता.


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कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!