लॉक डाउन By Nilesh Rawal

लाॅक डाउन - भाग - ९

आज लाॅक डाउन को काफी दिन हो गए है निश्चित तौर पर हमारी उम्र के लोगों ने ऐसी परिस्थितियां और ऐसे हालात जीवन में पहली बार देखें हैं तो जाहिर है कि हम इस तरह की परिस्थितियों और हालात का सामना करने के लिए ना तैयार है और ना ही आदि है!
शुरुआती दिनों में तो सब कुछ ठीक लगा परंतु जैसे-जैसे दिन बीतते गए हमारा धैर्य लगभग टूटने लगा है!
आज थोड़ी देर पहले मैं टीवी देख रहा था पूरी दुनिया में लगभग 17 लाख लोग संक्रमित हो चुके हैं और लगभग 1 लाख से अधिक लोगों की जान जा चुकी है भारत में भी यह आंकड़ा लगभग 7000 पर आ गया है और 200 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है यह आंकड़े भयावह दिखते हैं और शायद हम सबको डराऐ भी हैं ! कहीं ना कहीं जैसी हमारी उम्मीद थी बहुत जल्दी सब ठीक हो जाएगा बहुत जल्दी हम अपने काम ,नौकरी ,व्यापार ,व्यवसाय पर वापस आ जाएंगे यह उम्मीद कमजोर पड़ती सी दिखती है ! जब चीजें हमारे उम्मीद के अनुकूल नहीं होती तो कहीं ना कहीं धैर्य का दामन हमारे हाथ से छूटता चला जाता है !

आज आपको एक बहुत अच्छी कहानी सुनाता हूं शायद धैर्य का दामन  छोड़ते हुए इस काल में, इन परिस्थितियों में हमारा कुछ मनोबल बढ़ा सके !

टीचर ने क्लास के सभी बच्चों को एक खूबसूरत टॉफ़ी दी और फिर एक अजीब बात कही
सुनो, बच्चों! आप सभी ने दस मिनट तक अपनी टॉफ़ी नहीं खानी है और ये कहकर वो क्लास रूम से बाहर चले गए।
कुछ पल के लिए क्लास में सन्नाटा छाया था, हर बच्चा उसके सामने पड़ी टॉफ़ी को देख रहा था और हर गुज़रते पल के साथ खुद को रोकना मुश्किल होरहा था। दस मिनट पूरे हुए और टीचर क्लास रूम में आ गए। समीक्षा की। पूरे वर्ग में सात बच्चे थे, जिनकी टॉफ़ीयां जूं की तूं थी,जबकि बाकी के सभी बच्चे टॉफ़ी खाकर उसके रंग और स्वाद पर टिप्पणी कर रहे थे। टीचर ने चुपके से इन सात बच्चों के नाम को अपनी डायरी में दर्ज कर दिए और नोट करने के बाद पढाना शुरू किया।
इस शिक्षक का नाम प्रोफेसर वाल्टर मशाल था।
कुछ वर्षों के बाद प्रोफेसर वाल्टर ने अपनी वही डायरी खोली और सात बच्चों के नाम निकाल कर उनके बारे में शोध शुरू कर दिया। एक लंबे संघर्ष के बाद, उन्हें पता चला कि सातों बच्चों ने अपने जीवन में कई सफलताओं को हासिल किया है और अपनी अपनी फील्ड के लोगों की संख्या में सबसे सफल है। प्रोफेसर वाल्टर ने अपने बाकी वर्ग के छात्रों की भी समीक्षा की और यह पता चला कि उनमें से ज्यादातर एक आम जीवन जी रहे थे, जबकी कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें सख्त आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों का सामना करना पड रहा था।
इस सभी प्रयास और शोध का परिणाम प्रोफेसर वाल्टर ने एक वाक्य में निकाला और वह यह था।
"जो आदमी दस मिनट तक धैर्य नहीं रख सकता, वह जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ सकता”
इस शोध को दुनिया भर में शोहरत मिली और इसका नाम "मार्श मेलो थ्योरी" रखा गया था क्योंकि प्रोफेसर वाल्टर ने बच्चों को जो टॉफ़ी दी थी उसका नाम "मार्श मेलो" था। यह फोम की तरह नरम थी।
इस थ्योरी के अनुसार दुनिया के सबसे सफल लोगों में कई गुणों के साथ एक गुण 'धैर्य' पाया जाता है, क्योंकि यह ख़ूबी इंसान के बर्दाश्त की ताक़त को बढ़ाती है, जिसकी बदौलत आदमी कठिन परिस्थितियों में निराश नहीं होता और वह एक असाधारण व्यक्तित्व बन जाता है

उन बच्चों की तरह ही जो 10 मिनट का धैर्य नहीं रख सके शायद हमारी भी वही हालात है हम अपने इतने बड़े जीवन को बचाने के लिए महीने - 2 महीने का धैर्य नहीं रख सके तो आप यकीन मानिएगा  हम जीवन से असफल हो जाएंगे! और यदि थोड़ा सा धैर्य रख लेंगे तो इस लड़ाई को जीतेगी भी और अपने जीवन से सफल भी हो जाएंगे!
धैर्य रखिये, घर पर रहिये, लाॅक डाउन के समस्त नियमों का पालन किजिए! यदि हम जीवन को बचाने में सफल हो जायेंगे तो बाकी सारे कामों के लिए हमें बहुत समय मिल जायेगा!

निलेश रावल

1 टिप्पणी:

कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!