कविता ताला विवेक चतुर्वेदी

*शब्द भाव एवम उनका संयोजन अगर चेतना में सरपट हो कर स्थापित हो जाए उसे कविता और कवि की सफलता कहने में कोई गुरेज़ नहीं । ताला विवेक भाई की ऐसी ही कविता है ।*

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आभार 
*गिरीश बिल्लोरे मुकुल*
https://youtu.be/QM7qufexmvk

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कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!