विश्व दिव्यांग दिवस : सामाजिक साम्य का मूल्यांकन का अवसर

अंतरराष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस  पर विशेष आलेख
आज भी दिव्यांगों के लिए केवल संवेदन शीलता का भाव तो देखता हूँ परन्तु जब कभी प्रथम पंक्ति में खड़े होने की बात होती है अधिकांश नाक भौं सिकोड़ते  नजर आते हैं इसके मैंने कई उदाहरण देखें हैं भुक्तभोगी भी रहा हूं कुछ लोगों का शिकार भी बना हूं मैं जानता हूं कि यह कह कर मैं बहुत बड़ा खतरा मोल ले रहा हूं लेकिन यह भी सत्य है कि इसे बड़ी संख्या उन लोगों की है जो दिव्यांग ता को एक बाधा नहीं मानते .
मित्रों ने मुझे बहुत शक्ति दी है परिवार ने बहुत शक्ति दिए लेकिन समाज में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं कर पाते की मैं उनके बराबर खड़ा हो सकता आप भी देखें सोचें सशक्तिकरण का अर्थ क्या है कुछ लोग इतने नकारात्मक होते हैं वे हताशा के कुएं में ढकेलने  के के लिए पूरी तरह कोशिश किया करते हैं ।
 यद्यपि मैं यह बात इसलिए सामने नहीं रख रहा हूं यह हाथ से मेरे साथ हुए बल्कि यह इसलिए सामने रखा जा रहा है कि अगर एक ही व्यक्ति किसी दिव्यांग के प्रति ऐसा भाव रखता है तो वह वास्तव में दिव्यांग है ।
पिछले 2 महीनों में  मुझे  बहुत अच्छे अनुभव हुए हैं जिससे मैं अभिभूत हूं ।
पर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कुछ लोग ठीक उसी दौर में नकारात्मक वातावरण बनाने से ना
चूके जो कि सामान्यत है कोई भी व्यक्ति नहीं बनाता है ।  कुछ तो इस बात को स्वीकार ने के लिए भी तैयार नहीं कि वे मेरे मार्गदर्शन में भी काम करें ।
लेकिन अच्छे लोगों की कमी नहीं है अच्छे और बुरे लोगों के बीच एक रास्ता गुजरता है उस रास्ते का नाम है साहस का रास्ता साहस के रास्ते पर चलते हुए मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं हुआ कि मैं यहां सही हूं या वहां गलत था ।
सही और गलत के इस अनुक्रम में पहचाने गए बहुत से  वो लोग जिनकी कथनी और करनी के बीच एक बड़ी विचित्र सी दूरी है ।
 सूरदास प्रोफेसर हॉकिंस और भी कई इतना अधिक संघर्ष कर  दिलों में बस गए जो संघर्ष सामान्य आदमी नहीं कर पाता ।
 सच कहूं जब हमें कुछ करना होता है तो हम बेहद युक्तियों का सहारा लेते हैं हमें बहुत सारी व्यवस्थाएं उस काम तक पहुंचने के लिए करनी होती है उसके बाद काम आसान हो जाता है सामान्य के साथ में यह संभव नहीं है वे सामान्य परिस्थिति में ही काम कर सकते हैं सच मानिए दिव्यांग असामान्य परिस्थिति में कार्य करने के लिए अपने आप को तैयार कर लेते हैं ।
आप जानते हैं क्यों ऊंट की गर्दन लंबी क्यों होती है ?
 सच बताऊं कटीली झाड़ियां ऊंचाई पर होती थी और ऊंट ने परिस्थिति को अपने कंट्रोल में किया ना कि वह परिस्थिति से नियंत्रित रहा । अगर परिस्थिति से नियंत्रित होता तो कोई भी ऊंट जिंदा नहीं रह पाता एक समूची प्रजाति का अंत जाता लेकिन सदियों से विश्व में सी फॉर कैमल के नाम से पहचानी जा रही है बच्चे पढ़ रहे हैं ,  अगर आर्केटिक के भालूओं पोलर बियर  के बारे में सोचें  तो आप समझ जाएंगे की ऐसी जगहों पर जहां हम जा नहीं सकते वहां भी कोई प्रजाति इतराती इठलाती जीवित है ।
मित्रों असामान्य शारीरिक परिस्थितियों को कमतर नापना घोर मानवीय भूल है अष्टावक्र पर हँसना विद्वानों को मंहगा पड़ा जब उनने  समाज को एक अद्भुत ग्रंथ उपहार स्वरूप दिए ।  अष्टावक्र की तरह असामान्य से दिखने वाले ब्राम्हण चाणक्य ने क्या कर डाला आप खुद ही समझ सकते हैं ।  एक ओर कुछ लोग  मानवतावादी समानता को समाप्त करना चाहते हैं वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसा  हो जाता है कि समानता के सारे प्रयास निष्फल हो जाते हैं . परन्तु ऐसा नहीं कि सभी बुरे हैं । साथ में बहुत से छायादार अशोक वृक्ष भी हैं । 
जो गलत हैं उनको स्पष्ट रूप से सतर्क करना चाहता हूँ...
 मैं असामान्य नहीं पर मैं सामान्य भी नहीं मुझे सामान्य लोगों से स्पर्धा भी नहीं है पर अपेक्षा अवश्य है और वह है साम्य की अपेक्षा  वैसे आप चाहे तो दे चाहे तो ना दे हासिल तो हम कर ही लेंगे हमें किसी से भय नहीं है चलिए ठीक है उन मित्रों को मैं आज अपनी यह पोस्ट समर्पित  कर रहा हूं जिन्होंने मुझे बनाया है और उन मित्रों को भी चेक करने की कोशिश करूंगा जिनके दिल में कहीं ना कहीं एक काला चोर बसता है दिव्यांगों के सशक्तिकरण को लेकर वे तो स्वयं के अलावा किसी को श्रेष्ठ नहीं मानते दिव्यांगों में श्रेष्ठता साबित करने की लालसा नहीं होती लेकिन पूर्ण अंग के मानसिक दिव्यांग बेशक श्रेष्ठता की ओर बिना किसी कारण दौड़ते हैं ।
   कुछ नैगेटिव कुछ पॉज़िटिव मित्रों का आभार  जिन्होंने मुझे यह लेख लिखने के लिए बाध्य किया । अक्सर मैं कहा करता हूं कि किन्नर नारी और दिव्यांग से द्वेष रखने वाले,  रंगभेद जाति भेद वर्ग भेद किसी  को भी महान नहीं बना सकता । दिव्यांग रूज़वेल्ट जब यू एस के व्हाइट हाउस में पहली बार गए होंगे तो तय है कि वे अमेरिका की जनता के लिए कितना आदर रखते होंगे । आज मैं उनका और यूएस की जनता को बहुत सम्मान देना चाहता हूँ . वह जनता कितनी महान होगी जो श्रेष्ठ को ही श्रेष्ठ मानती है । रूज़वेल्ट दिव्यांगता के कारण व्हाइट हाउस में नहीं गए वे श्रेष्ठ थे केवल इस वजह से अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए ।   
भारत जैसे प्रजातांत्रिक देश में दिव्यांग सोच भी नहीं सकता कि वह सक्रिय रूप से नीति निर्माता हो । दिव्यांग आयोगों में आयुक्तों की नियुक्तियों में तक दिव्यांग व्यक्ति की गैरमौजूदगी शर्मनाक है । 
मैं फिर  कहता हूं कि- किन्नर नारी और दिव्यांग से द्वेष रखने वाले,  रंगभेद जाति भेद वर्ग भेद किसी  को भी महान नहीं बना सकता । 
अगर जरा सी भी स्थिति ऐसी नजर आती है तो समझ लीजिए कि इस राष्ट्र का विकास कदापि संभव नहीं है । 
मेरे इस सम्पूर्ण नैरेटिव पर डॉ सलिल समाधिया 
गिरीश जी , भारत की औपनिषदिक परम्परा और योग - दर्शन  ने  मानवीय चेतना के  5 तल  बताए हैं ! 
हमारे 5 शरीर होते  हैं ! 
अन्नमय  (Gross body )
प्राणमय (Energy body)
मनोमय (mental - emotional body )
विज्ञान मय ..(Intellect body )
और 
आनन्द मय कोश (Bliss body )
....दिव्यांग जन  सिर्फ़  physical body से  ही  किसी  पंचेन्द्रिय या  .कर्मेन्द्रिय  से  वंचित  होते  हैं ! 
लेकिन  हममें से अधिकतकर  लोग  तॊ  मन और भावना से ही अपंग हैं , 
विशेषकर वे  जो  दिव्यांगजनों के प्रति ऊंच - नीच का  भाव रखते  हैं ! 
....आपके इस   सारगर्भित , गहन ,  प्रेरक  लेख  की तथा आपके  प्रेरणास्पद जीवन की   जितनी प्रशंसा की जाए , कम  है ! 
आपको ..अनन्त अपार  प्रेम और  आदर अर्पित करता हूं !
तो भाई मनीष शर्मा ने ये कहा -
गिरीश जी आपको हम लोग आपकी कार्यशैली के कारण सामान्य से भी बेहतर की श्रेणी में रखते है.... दिव्यांग दिवस पर आपका लेख बहुत से लोगों को अपनी सोच बदलने का ज़रिया बनेगा ... साधूवाद
डॉ शिप्रा सुल्लेरे भाई सुधीर पांडे जी श्री महेंद्र शुक्ला जी सहित बहुत सारे मित्रों ने बताया खुलकर लिखा अच्छा 
विश्व दिव्यांग दिवस की हार्दिक  शुभकामनाएं

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आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
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दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!