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7 अक्टू॰ 2009

ज्ञानरंजन क्या चाहतें हैं



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ज्ञानरंजन के नाम को मानद उपाधि के लिए राजभवन से स्वीकृति न मिल सकी पहल के संपादक ज्ञानरंजन जी इस बात से न तो भौंचक हैं ओर न ही उत्तेजित जितना स्नेही साहित्यकार.इस घटना को बेहद सहजता से लिया.रानी दुर्गावती विश्व विद्यालय की प्रस्तावित मानद उपाधि सूची का हू-ब-हू अनुमोदित होकर वापस न आना कम से कम ज्ञानजी के लिए अहमियत की बात नहीं है.   इस समाचार पर आज सुबह सवेरे ज्ञान जी से फोन पर संपर्क साधा तो समाचार को सहजता से लेने की बात कहते हुए ज्ञान जी ने कहा :-गिरीश अब तुम लोग ब्लागिंग की तरफ चले गए हो  बेशक ब्लागिंग एक बेहतरीन विधा है किन्तु तुम को पढ़ना सुनना कई दिनों से नहीं हुआ.
 हां दादा वास्तव में अखबारों के पास हम जैसों को छापने के लिए जगह नहीं है और मेरा मोहभंग  भी हो गया है.
"तो तुम लोगों को सुनु पडूँ कैसे कम से कम एक बार महीने में गोष्ठी तो हो "
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ज्ञान जी की इस पीढा  की वज़ह से सब लोग वाकिफ हैं .... साहित्यिक-संगोष्ठीयों का अवसान, अखबारों में  साहित्यकारों की [खासकर नए ] उपेक्षा ,वैकल्पिक साधनों जैसे ब्लागिंग का सर्व सुलभ न हो पाना आदि आदि
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ज्ञान जी की इस पीढा को परख कर जबलपुर के रचनाकार एकजुट तो हैं आप भी देखिए शायद आप के शहर का कोई बुजुर्ग बरगद अपनी छांह बांटने लालायित हो और आप ए.सी.की कृत्रिमता पर आसक्त हों संदेश साफ़ है ... मित्रों गोष्ठियां जारी रखिए  

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