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2 फ़र॰ 2009

"................सज्‍जनों की अनुपस्थिति से दुर्जनों को बल मिलता है।"




*यदि आपका सही ((संदेश एक ग़लत स्थान पर जाने से संदेशा अच्छा युक्ति संगत होने के बावजूद ग़लत ही होता है. विशेषकर आभासी विश्व में ज़रूरी है कि वास्तविकता के धरातल पर पहुँच कर ही कुछ कहा जाए .

*जो भी इंसान कुंठाएं पाल लेता है उसका जीवन उस रसीली बेर या नागफनी सा हो जाता है जिसकी स्वाद-रस-रंग-सुन्दरता पर तो सब मोहित हो जाते हैं किंतु सबके मन में एकबार विचार ज़रूर आता है कि काश इसके साथ कांटे न होते !
* मेरे मित्र राजू उर्फ़ आर डी मालवा की एक लोकोक्ति अक्सर सुनाकर सब को चौंका देतें है -"ऊंट पर बैठकर बकरी चराना सम्भव होता है"- ब्लागिंग भी एक जिम्मेदारी भरा काम है उसके लिए राजू का कहना है :-"पोर्या पटेली नारिया खेती नहीं होती" यानि जिम्मेदारी वाले कामों में से बचपना नहीं चलता ।
(संदेश:- आदरणीय विष्णु बैरागी जी की उक्ति इस ब्लॉग पर सादर अंकित किया )

कितना असरदार

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