माँ

माँ
छाँह नीम की तेरा आँचल,
वाणी तेरी वेद ऋचाएँ।
सव्यसाची कैसे हम तुम बिन,
जीवन पथ को सहज बनाएँ।।
कोख में अपनी हमें बसाके,तापस-सा सम्मान दिया।।

पीड़ा सह के जनम दिया- माँ,साँसों का वरदान दिया।।
प्रसव-वेदना सहने वाली, कैसे तेरा कर्ज़ चुकाएँ।।
ममतामयी, त्याग की प्रतिमा-ओ निर्माणी जीवन की।

तुम बिन किससे कहूँ व्यथा मैं-अपने इस बेसुध मन की।।
माँ बिन कोई नहीं,सक्षम है करुणा रस का ज्ञान कराएँ।

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कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!