सूत कट न सके भोंथरी धार से,



सूत कट न सके भोंथरी धार से,
सो गले गस दिए फूलों के हार से।

बोलिए किससे जाके शिकायत करें-

घूस लेने लगे फूल कचनार के।

आँख सावन-सी झरती इसी बात में।

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कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!