शांतनु के लिए

देश मेरे ओ देश मेरे , छोटी सी अभिलाषा है,
माटी जिसमें जन्मा ये तन - जीवन उसे सँवारे !!
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पूरब पच्छिम उत्तर दक्खन ,रंग कई बिखरेंगें !
तीन रंग की रंगत के बिन नहीं कोई उभरेंगे !
आओ! मिलकर हम सब साथी इसका भाल उजारें!!
माटी ................

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कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!