आईना रूबरू आईने



आईना रूबरू आईने के हो ज़रा -
बात दोनों की चली जाये बहुत गहरे में ।
इजहार बिना इश्क नहीं हो सकता,
अपने अल्फाज़ मत क़ैद करो पहरों में॥



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!