"भेडाघाट के बच्चे"

संगमरमर की चट्टानों, को शिल्पी मूर्ती में बदल देता , सोचता शायद यही बदलाव उसकी जिन्दगी में बदलाव लाएगा. किन्तु रात दारू की दूकान उसे गोया खींच लेती बिना किसी भुमिका के क़दम बढ जाते उसी दूकान पे जिसे आम तौर पे कलारी कहा जाता है. कुछ हो न हो सुरूर राजा सा एहसास दिला ही देता है. ये वो जगह है जहाँ उन दिनो स्कूल काम ही जाते थे यहाँ के बच्चे . अभी जाते हैं तो केवल मिड-डे-मील पाकर आपस आ जाते हैं . मास्टर जो पहले गुरु पद धारी होते थे जैसे आपके बी०के0 बाजपेई, मेरे निर्मल चंद जैन, मन्नू सिंह चौहान, आदि-आदि, अब शिक्षा कमी हो गए है . मुझे फतेचंद मास्साब , सुमन बहन जी सब ने खूब दुलारा , फटकारा और मारा भी , अब जब में किसी स्कूल में जाता हूँ जीप देखकर वे बेचारे बेवज़ह अपनी गलती छिपाने की कवायद मी जुट जाते. जी हाँ वे ही अब रोटी दाल का हिसाब बनाने और सरपंच सचिव की गुलामी करते सहज ही नज़र आएँगे आपको ,गाँव की सियासत यानी "मदारी" उनको बन्दर जैसा ही तो नचाती है. जी हाँ इन्ही कर्मियों के स्कूलों में दोपहर का भोजन खाकर पास धुआंधार में कूदा करतें हैं ये बच्चे, आज से २०-२५ बरस पहले इनकी आवाज़ होती थी :-"सा'ब चौअन्नी मैको" {साहब, चार आने फैंकिए} और सैलानी वैसा ही करते थे , बच्चे धुआंधार में छलाँग लगाते और १० मिनट से भे काम समय में वो सिक्का निकाल के ले आते थे , अभ उनकी संतति यही कर रही है....!!एक बच्चे ने मुझे बताया-"पापा"[अब बाबू या पिता जी नही पापा कहते हैं] दारू पियत हैं,अम्मा मजूरी करत हैं,तुम क्या स्कूल नहीं जाते ....?जाते हैं सा'ब नदी में कूद के ५/- सिक्का कमाते हैं....? शाम को अम्मा को देत हैंकित्ता कमाते हो...?२५-५० रुपैया और का...? तभी पास खडा शिल्पी का दूसरा बेटा बोल पडा-"झूठ बोल रओ है दिप्पू जे पइसे कमा के तलब[गुठका] खात है..

2 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ सोचने पर मजबुर कर दिया आप के लेख भेडाघाट के बच्चे ने, बहुत बहुत धन्यवाद

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कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!