बमबुलियाँ:गाते हैं नर्मदा परिक्रमा करने वाले

ऊपर की फोटो गूगल से साभार नीचे धुंआधार सेल फोन फोटो


नर्मदा के दर्शन को जाने वाले /नर्मदा परिक्रमा करने वाले,बुन्देल खंड के नर्मदा भक्त यात्री बमबुलियाँ गा के अपनें सफर की शुरुआत करतें हैं । ये आवाजें उन दिनों खूब लुभातीं थीं अल्ल सुबह जब "परकम्मा-वासी "[नर्मदा की प्रदक्षिणा करने वाले ] रेल से उतर कर सीधे नर्मदा की और रुख करते और कोरस में उनके स्वर बिखरते हौले-हौले स्वर मध्धम होते जाते । जी हाँ माँ नरमदा के सेवकों का जत्था भेड़ाघाट रेलवे स्टेशन से सीधे भेडाघाट की संगमरमरी चट्टानों को धवल करती अपनी माँ के दर्शन को जाता । पक्के रंगों की साडियों में लिपटीं देवियाँ ,युवा अधेड़ बुजुर्ग सभी दल के सदस्य सब के सब एक सधी सजी संवरी आवाज़ गाते मुझे आज भी याद हैं । सच जिस नर्मदा की भक्ति इनको एक लय एक सूत्र में पिरो देती है तो उसकी अपनी धारा कैसी होगी ? जी बिलकुल एक सधी किंतु बाधित होते ही बिफरी भी चिर कुंवरी माँ नर्मदा ने कितने पहाडों के अभिमान को तोडा है.
बमबुलियाँ:
पढ़ें लिखों को है राज
बिटिया....$......हो बाँच रे
पुस्तक बाँच रे.......
बिन पढ़े आवै लाज बिटिया बाँच रे
हो.....पुस्तक बाँच रे.......!!
[01]
दुर्गावती के देस की बिटियाँ....
पांछू रहे काय आज
बिटिया........बाँच ......रे......पुस्तक बाँच ........!
[02]
जग उजियारो भयो.... सकारे
मन खौं घेरत जे अंधियारे
का करे अनपढ़ आज रे
बाँच ......रे....बिटिया ..पुस्तक बाँच ........!
[03]
बेटा पढ़ खैं बन है राजा
बिटियन को घर काज रे.....
कैसे आगे देस जो जै है
पान्छू भओ समाज रे.....
कक्का सच्ची बात करत हैं
दोउ पढ़ हैं अब साथ रे .............!!

गिरीश बिल्लोरे मुकुल
969/ए-2,गेट नंबर-04 जबलपुर म.प्र.
MAIL : girishbillore@gmail.com
Phone’s: 09926471072

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी तहरीर है...अपने ब्लॉग में आपके ब्लॉग का लिंक दे रही हूं...

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  2. नर्मदा के दर्शन के लिये आभार !

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  3. बमबुलियाँ : लोकगीत रूप में बड़ी सारगर्भित बात कहती है ; शिक्षा का बीजारोपण माँ की गोद से ही होता है , शिवाजी अपनी माता के कारण ही शिवाजी बनपाये अतः " प्रथम गुरु ज्ञान बीज माता ,द्वितियम गुरु ज्ञान अंकुरं पिता,तृतीयं ज्ञान पौध शिक्षकम ,परम गुरु पूर्ण वृक्षं ईश्वरः तथा काल अनुभवं "|
    अन्योनास्ति-झरोखा पर आगमन का दिल से शुक्रिया ,अभी जो सेटिंग या फारमेट चाहता हूँ वह हो नही पारहा है ज्यादा तकनिकी ज्ञान नही है || निम्न स्थलों पर भी आकर अपनी सलाह दें||
    ब्लागस्ते
    अन्योनास्ति
    "कालचक्र" की

    "चौपाल " के

    "झरोखा "से

    "कबीरा"
    झरोखे पर नियमित आते रहें अकेला होने के कारण रोज का वादा तो अभी नही कर पाउँगा ,परन्तु दूसरे तीसरे अथवा सप्ताह में एक बार अवश्य उसे अद्यातन कराने का प्रयत्न करूंगा |दूसरा कारण सेवाकाल का अन्तिम उलटी गणना शुरू हो चुकी है उसकी व्यस्तता भी है |

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कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!