नवगीत:नेह नर्मदा/मलिन हो रही --संजीव 'सलिल'

नवगीत

संजीव 'सलिल'

नेह नर्मदा
मलिन हो रही
'सलिल' बचायें...
*
स्वार्थ लहरियाँ,
लोभ मछलियाँ,
भँवर सुखों की.
डाह पंक,
वासना चोई,
दुर्गन्ध दुखों की.

संयम सहित
समन्वय साधें
विमल बनायें.
नेह नर्मदा
मलिन हो रही
'सलिल' बचायें...
*
श्वासों को
आसों की ताज़ा
प्राण वायु दें.
अपनों को
सपनों की सुखप्रद
दीर्घ आयु दें.

प्राण-दीप
प्रज्वलित दिवाली
दीप जलायें.
नेह नर्मदा
मलिन हो रही
'सलिल' बचायें...
*
मुट्ठी भर
साधन लेकिन
चाहें दिगंत हैं.
अनगढ़ पथ
डगमग पर
राहें अनंत हैं.

चलें, गिरें, उठ,
हाथ मिला, बढ़,
मंजिल पायें.
नेह नर्मदा
मलिन हो रही
'सलिल' बचायें...
*

2 टिप्‍पणियां:

  1. स्वार्थ लहरियाँ,
    लोभ मछलियाँ,
    भँवर सुखों की.
    डाह पंक,
    वासना चोई,
    दुर्गन्ध दुखों की.
    बहुत उम्दा बात कही सलिल जी।

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कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!