Ad

contemporary hindi poetry लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
contemporary hindi poetry लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

14 जून 2011

सामयिक दोहा मुक्तिका: संदेहित किरदार..... संजीव 'सलिल

सामयिक दोहा मुक्तिका:
संदेहित किरदार.....
संजीव 'सलिल
*
लोकतंत्र को शोकतंत्र में, बदल रही सरकार.
असरदार सरदार सशंकित, संदेहित किरदार..

योगतंत्र के जननायक को, छलें कुटिल-मक्कार.
नेता-अफसर-सेठ बढ़ाते, प्रति पल भ्रष्टाचार..

आम आदमी बेबस-चिंतित, मूक-बधिर लाचार.
आसमान छूती मंहगाई, मेहनत जाती हार..

बहा पसीना नहीं पल रहा, अब कोई परिवार.
शासक है बेफिक्र, न दुःख का कोई पारावार..

राजनीति स्वार्थों की दलदल, मिटा रही सहकार.
देश बना बाज़ार- बिकाऊ, थाना-थानेदार..

अंधी न्याय-व्यवस्था, सच का कर न सके दीदार.
काले कोट दलाल- न सुनते, पीड़ित का चीत्कार..

जनमत द्रुपदसुता पर, करे दु:शासन निठुर प्रहार.
कृष्ण न कोई, कौन सकेगा, गीता-ध्वनि उच्चार?

सबका देश, देश के हैं सब, तोड़ भेद-दीवार.
श्रृद्धा-सुमन शहीदों को दें, बाँटें-पायें प्यार..

सिया जनास्था का कर पाता, वनवासी उद्धार.
सत्ताधारी भेजे वन को, हर युग में हर बार..

लिये खडाऊँ बापू की जो, वही बने बटमार.
'सलिल' असहमत जो वे भी हैं, पद के दावेदार..

'सलिल' एक है राह, जगे जन, सहे न अत्याचार.
अफसरशाही को निर्बल कर, छीने निज अधिकार..

*************

20 मार्च 2011

नवगीत: तुमने खेली हमसे होली -------संजीव 'सलिल'

नवगीत:                                                                    

तुमने खेली हमसे होली

संजीव 'सलिल'
*
तुमने खेली हमसे होली
अब हम खेलें.
अब तक झेला बहुत
न अब आगे हम झेलें...
*
सौ सुनार की होती रही सुनें सच नेता.
अब बारी जनता की जो दण्डित कर देता..
पकड़ा गया कलेक्टर तो क्यों उसे छुडाया-
आम आदमी का संकट क्यों नजर न आया?
सत्ता जिसकी संकट में
हम उसे ढकेलें...
*
हिरनकशिपु तुम, जन प्रहलाद, होलिका अफसर.
मिले शहादत तुमको अब आया है अवसर.
जनमत का हरि क्यों न मार ही डाले तुमको?
जनगण को ही रहे मराते हो तुम अक्सर.
जो रिश्वत ले,
शीश कटाये वही अकेले...
*
रंग-अबीर न आज चाहिए, रक्त-धार हो.
सीमा पर मरने अफसर-नेता तयार हो.
सुख-सुविधा जो भोग रहे उसकी कीमत दो-
नगद रहे हर सौदा ना कुछ भी उधार हो.
वीर शहीदों की समाधि पर
हों अब मेले...
*********

17 फ़र॰ 2011

मुक्तिका: तोड़ दिया दर्पण संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

तोड़ दिया दर्पण

संजीव 'सलिल'
*

शाम ढले इस सूने घर में मेला लगता है
मुझको तो ये मुल्क चाट का ठेला लगता है.

खबर चटपटी अख़बारों में रोज छप रही है.
सत्य खोजना सचमुच बहुत झमेला लगता है..

नेता-अफसर-न्यायमूर्ति पर्याय रिश्वतों के.
संसद का हर सत्र यहाँ अलबेला लगता है..

रीति-नीति सरकारों की बिन रीढ़, पिलपिली है.
गटपट का दौना जैसे पँचमेला लगता है..

साया-माया साथ न दे पर साथ निभाते हैं.
भीड़ बहुत, मुश्किल में देश अकेला लगता है..

ज्वर क्रिकेट का चढ़ा सभी को, लाइलाज है मर्ज़.
घूँटी में किरकिट ही खाया-खेला लगता है..

'सलिल'शक्ल बदसूरत देखी, तोड़ दिया दर्पण. 
शंकर भी कंकर माटी का डेला लगता है.

**************************************

3 नव॰ 2010

धनतेरसपर विशेष गीत... प्रभु धन दे... संजीव 'सलिल'

धनतेरसपर विशेष गीत...                          

प्रभु धन दे...

संजीव 'सलिल'
*
प्रभु धन दे निर्धन मत करना.
माटी को कंचन मत करना.....
*
निर्बल के बल रहो राम जी,
निर्धन के धन रहो राम जी.
मात्र न तन, मन रहो राम जी-
धूल न, चंदन रहो राम जी..

भूमि-सुता तज राजसूय में-
प्रतिमा रख वंदन मत करना.....
*
मृदुल कीर्ति प्रतिभा सुनाम जी.
देना सम सुख-दुःख अनाम जी.
हो अकाम-निष्काम काम जी-
आरक्षण बिन भू सुधाम जी..

वन, गिरि, ताल, नदी, पशु-पक्षी-
सिसक रहे क्रंदन मत करना.....
*
बिन रमेश क्यों रमा राम जी,
चोरों के आ रहीं काम जी?
श्री गणेश को लिये वाम जी.
पाती हैं जग के प्रणाम जी..

माटी मस्तक तिलक बने पर-
आँखों का अंजन मत करना.....
*
साध्य न केवल रहे चाम जी,
अधिक न मोहे टीम-टाम जी.
जब देना हो दो विराम जी-
लेकिन लेना तनिक थाम जी..

कुछ रच पाए कलम सार्थक-
निरुद्देश्य मंचन मत करना..
*
अब न सुनामी हो सुनाम जी,
शांति-राज दे, लो प्रणाम जी.
'सलिल' सभी के सदा काम जी-
आये, चल दे कर सलाम जी..

निठुर-काल के व्याल-जाल का
मोह-पाश व्यंजन मत करना.....
*

24 अक्टू॰ 2010

दोहा सलिला: भाई को भाई की, भाये कुछ बात..... संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:

भाई को भाई की, भाये कुछ बात.....

संजीव 'सलिल'
*
जो गिरीश मस्तक धरे, वही चन्द्र को मौन.
अमिय-गरल सम भाव से, करे ग्रहण है कौन?
महाकाल के उपासक, हम न बदलते काल.
व्याल-जाल को छिन्न कर, चलते अपनी चाल..
अनुज न मेरा कभी भी, होगा तनिक हताश.
अरिदल को फेंटे बना, निज हाथों का ताश..
मेघ न रवि को कभी भी, ढाँक सके हैं मीत.
अस्त-व्यस्त खुद हो गए, गरज-बरस हो भीत..
सलिल धार को कब कहें, रोक सकी चट्टान?
रेत बनी, बिखरी, बही, रौंद रहा इंसान..
बाधाएँ पग चूम कर, हो जायेंगी दूर.
मित्रों की पहचान का, अवसर है भरपूर..
माँ सरस्वती शक्ति-श्री का अपूर्व भण्डार.
सदा शांत रह, सृजन ही उनका है आचार..
कायर उन्हें  न मानिये, कर सकती हैं नाश.
काट नहीं उनकी कहीं, डरे काल का पाश..
शब्द-साधना पथिक हम, रहें हमेशा शांत.
निबल न हमको समझ ले, कोई होकर भ्रांत..
सृजन साध्य जिसको 'सलिल', नाश न उसकी चाह.
विवश करे यदि समय तो, सहज चले उस राह..
चन्द्र-चन्द्रिका का नहीं, कुछ कर सका कलंक.
शरत-निशा कहती यही, सत्य सदा अकलंक..
वर्षा-जल की मलिनता, से न नर्मदा भीत.
अमल-विमल-निर्मल बाहें, नमन करे जग मीत..
यह साँसों की धार है, आसों का सिंगार.
कीर्ति-कथा ही अंत में, शेष रहे अविकार..
जितने कंटक-कष्ट में, खिलता जीवन-फूल.
गौरव हो उतना अधिक, कोई न सकता भूल..
हम भी झेलें विपद को, धरे अधर-मुस्कान.
तिमिर-निशा को दिवाली, करते चतुर सुजान..
************************************

10 अक्टू॰ 2010

आदि शक्ति वंदना -------- संजीव वर्मा 'सलिल'

आदि शक्ति वंदना

संजीव वर्मा 'सलिल'
*
आदि शक्ति जगदम्बिके, विनत नवाऊँ शीश.
रमा-शारदा हों सदय, करें कृपा जगदीश....
*
पराप्रकृति जगदम्बे मैया, विनय करो स्वीकार.
चरण-शरण शिशु, शुभाशीष दे, करो मातु उद्धार.....
*
अनुपम-अद्भुत रूप, दिव्य छवि, दर्शन कर जग धन्य.
कंकर से शंकर रचतीं माँ!, तुम सा कोई न अन्य..

परापरा, अणिमा-गरिमा, तुम ऋद्धि-सिद्धि शत रूप.
दिव्य-भव्य, नित नवल-विमल छवि, माया-छाया-धूप..

जन्म-जन्म से भटक रहा हूँ, माँ ! भव से दो तार.
चरण-शरण जग, शुभाशीष दे, करो मातु उद्धार.....
*
नाद, ताल, स्वर, सरगम हो तुम. नेह नर्मदा-नाद.
भाव, भक्ति, ध्वनि, स्वर, अक्षर तुम, रस, प्रतीक, संवाद..

दीप्ति, तृप्ति, संतुष्टि, सुरुचि तुम, तुम विराग-अनुराग.
उषा-लालिमा, निशा-कालिमा, प्रतिभा-कीर्ति-पराग.

प्रगट तुम्हीं से होते तुम में लीन सभी आकार.
चरण-शरण शिशु, शुभाशीष दे, करो मातु उद्धार.....
*
वसुधा, कपिला, सलिलाओं में जननी तव शुभ बिम्ब.
क्षमा, दया, करुणा, ममता हैं मैया का प्रतिबिम्ब..

मंत्र, श्लोक, श्रुति, वेद-ऋचाएँ, करतीं महिमा गान-
करो कृपा माँ! जैसे भी हैं, हम तेरी संतान.

ढाई आखर का लाया हूँ,स्वीकारो माँ हार.
चरण-शरण शिशु, शुभाशीष दे, करो मातु उद्धार.....

**************

25 सित॰ 2010

नव गीत: कैसी नादानी??... संजीव 'सलिल'

नव गीत:

कैसी नादानी??...

संजीव 'सलिल'
*
मानव तो रोके न अपनी मनमानी.
'रुको' कहे प्रकृति से कैसी नादानी??...
*
जंगल सब काट दिये
दरके पहाड़.
नदियाँ भी दूषित कीं-
किया नहीं लाड़..
गलती को ले सुधार, कर मत शैतानी.
'रुको' कहे प्रकृति से कैसी नादानी??...
*
पाट दिये ताल सभी
बना दीं इमारत.
धूल-धुंआ-शोर करे
प्रकृति को हताहत..
घायल ऋतु-चक्र हुआ, जो है लासानी...
'रुको' कहे प्रकृति से कैसी नादानी??...
*
पावस ही लाता है
हर्ष सुख हुलास.
तूने खुद नष्ट किया
अपना मधु-मास..
मेघ बजें, कहें सुधर, बचा 'सलिल' पानी.
'रुको' कहे प्रकृति से कैसी नादानी??...
*

11 सित॰ 2010

भजन : एकदन्त गजवदन विनायक ..... संजीव 'सलिल'

भजन :

एकदन्त गजवदन विनायक .....

संजीव 'सलिल'
 *






*
एकदन्त गजवदन विनायक, वन्दन बारम्बार.
तिमिर हरो प्रभु!, दो उजास शुभ, विनय करो स्वीकार..
*
प्रभु गणेश की करो आरती, भक्ति सहित गुण गाओ रे!
रिद्धि-सिद्धि का पूजनकर, जन-जीवन सफल बनाओ रे!...
*
प्रभु गणपति हैं विघ्न-विनाशक,
बुद्धिप्रदाता शुभ फलदायक.
कंकर को शंकर कर देते-
वर देते जो जिसके लायक.
भक्ति-शक्ति वर, मुक्ति-युक्ति-पथ-पर पग धर तर जाओ रे!...
प्रभु गणेश की करो आरती, भक्ति सहित गुण गाओ रे!...
*
अशुभ-अमंगल तिमिर प्रहारक,
अजर, अमर, अक्षर-उद्धारक.
अचल, अटल, यश अमल-विमल दो-
हे कण-कण के सर्जक-तारक.
भक्ति-भाव से प्रभु-दर्शन कर, जीवन सफल बनाओ रे!
प्रभु गणेश की करो आरती, भक्ति सहित गुण गाओ रे!...
*
संयम-शांति-धैर्य के सागर,
गणनायक शुभ-सद्गुण आगर.
दिव्य-दृष्टि, मुद मग्न, गजवदन-
पूज रहे सुर, नर, मुनि, नागर.
सलिल-साधना सफल-सुफल दे, प्रभु से यही मनाओ रे.
प्रभु गणेश की करो आरती, भक्ति सहित गुण गाओ रे!...
******************
दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

5 सित॰ 2010

मुक्तिका: शतदल खिले.. संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

शतदल खिले..

संजीव 'सलिल'

*
*
प्रियतम मिले.
शतदल खिले..

खंडहर हुए
संयम किले..

बिसरे सभी
शिकवे-गिले..

जनतंत्र के
लब क्यों सिले?

भटके हुए
हैं काफिले..

कस्बे कहें
खुद को जिले..

छूने चले
पग मंजिलें..

तन तो कुशल
पर मन छिले..

*************

1 सित॰ 2010

बाल गीत: लंगडी खेलें..... आचार्य संजीव 'सलिल'

*
बाल गीत:

लंगडी खेलें.....

आचार्य संजीव 'सलिल'
*
आओ! हम मिल
लंगडी खेलें.....
*
एक पैर लें
जमा जमीं पर।
रखें दूसरा
थोडा ऊपर।
बना संतुलन
निज शरीर का-
आउट कर दें
तुमको छूकर।
एक दिशा में
तुम्हें धकेलें।
आओ! हम मिल
लंगडी खेलें.....
*
आगे जो भी
दौड़ लगाये।
कोशिश यही
हाथ वह आये।
बचकर दूर न
जाने पाए-
चाहे कितना
भी भरमाये।
हम भी चुप रह
करें झमेले।
आओ! हम मिल
लंगडी खेलें.....*
हा-हा-हैया,
ता-ता-थैया।
छू राधा को
किशन कन्हैया।
गिरें धूल में,
रो-उठ-हँसकर,
भूलें- झींकेगी
फिर मैया।
हर पल 'सलिल'
ख़ुशी के मेले।
आओ! हम मिल
लंगडी खेलें.....
*************

26 अग॰ 2010

गीत: आराम चाहिए... संजीव 'सलिल' * *

गीत:

आराम चाहिए...

संजीव 'सलिल'
*
*
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
*
प्रजातंत्र के बादशाह हम,
शाहों में भी शहंशाह हम.
दुष्कर्मों से काले चेहरे
करते खुद पर वाह-वाह हम.
सेवा तज मेवा के पीछे-
दौड़ें, ऊँचा दाम चाहिए.
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
*
पुरखे श्रमिक-किसान रहे हैं,
मेहनतकश इन्सान रहे हैं.
हम तिकड़मी,घोर छल-छंदी-
धन-दौलत अरमान रहे हैं.
देश भाड़ में जाये हमें क्या?
सुविधाओं संग काम चाहिए.
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
*
स्वार्थ साधते सदा प्रशासक.
शांति-व्यवस्था के खुद नाशक.
अधिनायक हैं लोकतंत्र के-
हम-वे दुश्मन से भी घातक.
अवसरवादी हैं हम पक्के
लेन-देन बेनाम चाहिए.
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
*
सौदे करते बेच देश-हित,
घपले-घोटाले करते नित.
जो चाहो वह काम कराओ-
पट भी अपनी, अपनी ही चित.
गिरगिट जैसे रंग बदलते-
हमको ऐश तमाम चाहिए.
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
*
वादे करते, तुरत भुलाते.
हर अवसर को लपक भुनाते.
हो चुनाव तो जनता ईश्वर-
जीत उन्हें ठेंगा दिखलाते.
जन्म-सिद्ध अधिकार लूटना
'सलिल' स्वर्ग सुख-धाम चाहिए.
हम भारत के जन-प्रतिनिधि हैं
हमको हर आराम चाहिए.....
****************
दिव्यनर्मदा.ब्लॉगस्पोट.कॉम

19 अग॰ 2010

एक कविता; होता था घर एक.' संजीव 'सलिल'

एक कविता;

होता था घर एक.'

संजीव 'सलिल'
*
*
शायद बच्चे पढेंगे
'होता था घर एक.'
शब्द चित्र अंकित किया
मित्र कार्य यह नेक.
अब नगरों में फ्लैट हैं,
बंगले औ' डुप्लेक्स.
फार्म हाउस का समय है
मिलते मल्टीप्लेक्स.
बेघर खुद को कर रहे
तोड़-तोड़ घर आज.
इसीलिये गायब खुशी
हर कोई नाराज़.
घर न इमारत-भवन है
घर होता सम्बन्ध.
नाते निभाते हैं जहाँ
बिना किसी अनुबंध.
भारत ही घर की बने
अद्भुत 'सलिल' मिसाल.
नाते नव बनते रहें
देखें आप कमाल.
बिना मिले भी मन मिले,
होती जब तकरार.
दूजे पल ही बिखरता
निर्मल-निश्छल प्यार.
मतभेदों को हम नहीं
बना रहे मन-भेद.
लगे किसी को ठेस तो
सबको होता खेद.
नेह नर्मदा निरंतर
रहे प्रवाहित मित्र.
भारत ही घर का बने
'सलिल' सनातन चित्र..
*
+++++++++++ + ++++

15 अग॰ 2010

स्वाधीनता दिवस पर विशेष रचना: गीत भारत माँ को नमन करें.... संजीव 'सलिल'

स्वाधीनता दिवस पर विशेष रचना:

गीत

भारत माँ को नमन करें....

संजीव 'सलिल'
*
*
आओ, हम सब एक साथ मिल
भारत माँ को नमन करें.
ध्वजा तिरंगी मिल फहराएँ
इस धरती को चमन करें.....
*
नेह नर्मदा अवगाहन कर
राष्ट्र-देव का आवाहन कर
बलिदानी फागुन पावन कर
अरमानी सावन भावन कर

राग-द्वेष को दूर हटायें
एक-नेक बन, अमन करें.
आओ, हम सब एक साथ मिल
भारत माँ को नमन करें......
*
अंतर में अब रहे न अंतर
एक्य कथा लिख दे मन्वन्तर
श्रम-ताबीज़, लगन का मन्तर
भेद मिटाने मारें मंतर

सद्भावों की करें साधना
सारे जग को स्वजन करें.
आओ, हम सब एक साथ मिल
भारत माँ को नमन करें......
*
काम करें निष्काम भाव से
श्रृद्धा-निष्ठा, प्रेम-चाव से
रुके न पग अवसर अभाव से
बैर-द्वेष तज दें स्वभाव से

'जन-गण-मन' गा नभ गुंजा दें
निर्मल पर्यावरण करें.
आओ, हम सब एक साथ मिल
भारत माँ को नमन करें......
*
जल-रक्षण कर पुण्य कमायें
पौध लगायें, वृक्ष बचायें
नदियाँ-झरने गान सुनायें
पंछी कलरव कर इठलायें

भवन-सेतु-पथ सुदृढ़ बनाकर
सबसे आगे वतन करें.
आओ, हम सब एक साथ मिल
भारत माँ को नमन करें......
*
शेष न अपना काम रखेंगे
साध्य न केवल दाम रखेंगे
मन-मन्दिर निष्काम रखेंगे
अपना नाम अनाम रखेंगे

सुख हो भू पर अधिक स्वर्ग से
'सलिल' समर्पित जतन करें.
आओ, हम सब एक साथ मिल
भारत माँ को नमन करें......
*******

Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

4 अग॰ 2010

अभिनव प्रयोग: हाइकु / कुण्डली गीत: मन में दृढ विश्वास संजीव 'सलिल'

अभिनव प्रयोग:

हाइकु / कुण्डली गीत:

मन में दृढ विश्वास

संजीव 'सलिल'
*

मन में दृढ
विश्वास रख हम
करें प्रयास...
*
अपनी क्या सामर्थ्य है?, लें हम पहले तोल.
और बाद में निकालें, अपने मुँह से बोल..
अपने मुँह से बोल, निकालें सरस हुलसकर.
जो सुन ले, प्रोत्साहित होकर मिले पुलककर..
कहे 'सलिल' कविराय, लक्ष्य साजन श्रम सजनी.
यही विनय है दैव!, चुके ना हिम्मत अपनी..
*
जब भी पायें
त्रास, तब मंजिल
रहती पास...
*
अपनी रचना से करें, मानव का अभिषेक.
नव विकास के दीप शत, जला सकें सविवेक..
जला सकें सविवेक, प्रकाशित हो सब दुनिया.
कान्हा-राधा से, घर-घर हों मुन्ना-मुनिया..
कहे 'सलिल' कविराय, पूर्णिमा हो हर रजनी.
प्रभु जैसी कथनी, वैसी हो करनी अपनी ..
*
दिखे सभी में
निज सदृश, प्रभु
का है आवास...
*
-दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

20 जुल॰ 2010

हास्य कुण्डली: संजीव 'सलिल'



















हास्य कुण्डली:
 संजीव 'सलिल'
*
घरवाली को छोड़कर, रहे पड़ोसन ताक.
सौ चूहे खाकर बने बिल्ली जैसे पाक..
बिल्ली जैसे पाक, मगर नापाक इरादे.
काश इन्हें इनकी कोई औकात बतादे..
भटक रहे बाज़ार में, खुद अपना घर छोड़कर.
रहें न घर ना घाट के, घरवाली को छोड़कर..
*
सूट-बूट सज्जित हुए, समझें खुद को लाट.
अंगरेजी बोलें गलत, दिखा रहे हैं ठाठ..
दिखा रहे हैं ठाठ, मगर मन तो गुलाम है.
निज भाषा को भूल, नामवर भी अनाम है..
हुए जड़ों से दूर, पग-पग पर लज्जित हुए.
घोडा दिखने को गधे, सूट-बूट सज्जित हुए..
*
गाँव छोड़ आये शहर, जबसे लल्लूलाल.
अपनी भाषा छोड़ दी, तन्नक नहीं मलाल..
तन्नक नहीं मलाल, समझते खुद को साहब.
हँसे सभी जब सुना: 'पेट में हैडेक है अब'..
'फ्रीडमता' की चाह में, भटकें तजकर ठाँव.
होटल में बर्तन घिसें, भूले खेती-गाँव..
*
दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

14 जुल॰ 2010

दोहा सलिला: संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:

संजीव 'सलिल'
*
hindi-day.jpg



*
दिव्या भव्य बन सकें, हम मन में हो चाह.
'सलिल' नयी मंजिल चुनें, भले कठिन हो राह..
*
प्रेम परिश्रम ज्ञान के, तीन वेद का पाठ.
करे 'सलिल' पंकज बने, तभी सही हो ठाठ..
*
कथनी-करनी में नहीं, 'सलिल' रहा जब भेद.
तब जग हमको दोष दे, क्यों? इसका है खेद..
*
मन में कुछ रख जुबां पर, जो रखते कुछ और.
सफल वही हैं आजकल, 'सलिल' यही है दौर..
*
हिन्दी के शत रूप हैं, क्यों उनमें टकराव?
कमल पंखुड़ियों सम सजें, 'सलिल' न हो बिखराव..
*
जगवाणी हिन्दी हुई, ऊँचा करिए माथ.
जय हिन्दी, जय हिंद कह, 'सलिल' मिलाकर हाथ..
*
छंद शर्करा-नमक है, कविता में रस घोल.
देता नित आनंद नव, कहे अबोले बोल..
*
कर्ता कारक क्रिया का, करिए सही चुनाव.
सहज भाव अभिव्यक्ति हो, तजिए कठिन घुमाव..
*
बिम्ब-प्रतीकों से 'सलिल', अधिक उभरता भाव.
पाठक समझे कथ्य को, मन में लेकर चाव..
*
अलंकार से निखरता, है भाषा का रूप.
बिन आभूषण भिखारी, जैसा लगता भूप..
*
रस शब्दों में घुल-मिले, करे सारा-सम्प्राण.
नीरसता से हो 'सलिल', जग-जीवन निष्प्राण..
*

10 जुल॰ 2010

अभिनव प्रयोग- गीत: कमल-कमलिनी विवाह संजीव 'सलिल'

अभिनव प्रयोग-
गीत:

कमल-कमलिनी विवाह

संजीव 'सलिल'
*
pond_pink_lity_lotus.jpg


* रक्त कमल 

अंबुज शतदल कमल
अब्ज हर्षाया रे!
कुई कमलिनी का कर
गहने आया रे!...
*















* हिमकमल 
अंभज शीतल उत्पल देख रहा सपने
बिसिनी उत्पलिनी अरविन्दिनी सँग हँसने
कुंद कुमुद क्षीरज अंभज नीरज के सँग-
नीलाम्बुज नीलोत्पल नीलोफर भी दंग.

कँवल जलज अंबोज नलिन पुहुकर पुष्कर
अर्कबन्धु जलरुह राजिव वारिज सुंदर
मृणालिनी अंबजा अनीकिनी वधु मनहर

यह उसके, वह भी
इसके मन भाया रे!...
*















* नील कमल 
बाबुल ताल, तलैया मैया हँस-रोयें
शशिप्रभ कुमुद्वती कैरविणी को खोयें.
निशापुष्प कौमुदी-करों मेंहदी सोहे.
शारंग पंकज पुण्डरीक मुकुलित मोहें.

बन्ना-बन्नी, गारी गायें विष्णुप्रिया.
पद्म पुंग पुन्नाग शीतलक लिये हिया.
रविप्रिय श्रीकर कैरव को बेचैन किया

अंभोजिनी अंबुजा
हृदय अकुलाया रे!... 
*














* श्वेत कमल 
चंद्रमुखी-रविमुखी हाथ में हाथ लिये
कर्णपूर सौगन्धिक श्रीपद साथ लिये.
इन्दीवर सरसिज सरोज फेरे लेते.
मौन अलोही अलिप्रिय सात वचन देते.

असिताम्बुज असितोत्पल-शोभा कौन कहे?
सोमभगिनी शशिकांति-कंत सँग मौन रहे.
'सलिल'ज हँसते नयन मगर जलधार बहे

श्रीपद ने हरिकर को
पूर्ण बनाया रे!...
***************














* ब्रम्ह कमल

टिप्पणी:

* कमल, कुमुद, व कमलिनी का प्रयोग कहीं-कहीं भिन्न पुष्प प्रजातियों के रूप में है, कहीं-कहीं एक ही प्रजाति के पुष्प के पर्याय के रूप में. कमल के रक्तकमल, नीलकमल  तथा श्वेतकमल तीन प्रकार रंग के आधार पर वर्णित हैं. कमल-कमलिनी का विभाजन बड़े-छोटे आकार के आधार पर प्रतीत होता है. कुमुद को कहीं कमल, कहीं कमलिनी कहा गया है. कुमद के साथ कुमुदिनी का भी प्रयोग हुआ है. कमल सूर्य के साथ उदित होता है, उसे सूर्यमुखी, सूर्यकान्ति, रविप्रिया आदि कहा गया है. रात में खिलनेवाली कमलिनी को शशिमुखी, चन्द्रकान्ति, रजनीकांत,  कहा गया है. रक्तकमल के लाल रंग की श्री तथा हरि के कर-पद पल्लवों से समानता के कारण हरिपद, श्रीकर जैसे पर्याय बने हैं, सूर्य, चन्द्र, विष्णु, लक्ष्मी, जल, नदी, समुद्र, सरोवर आदि  से जन्म के आधार पर बने पर्यायों के साथ जोड़ने पर कमल के अनेक और पर्यायी शब्द बनते हैं. मुझसे अनुरोध था कि कमल के सभी पर्यायों को गूँथकर रचना करूँ. माँ शारदा के श्री चरणों में यह कमल-माल अर्पित कर आभारी हूँ. सभी पर्यायों को गूंथने पर रचना अत्यधिक लंबी होगी. पाठकों की प्रतिक्रिया ही बताएगी कि गीतकार निकष पर खरा उतर सका या नहीं?

 * कमल हर कीचड़ में नहीं खिलता. गंदे नालों में कमल नहीं दिखेगा भले ही कीचड़ हो. कमल का उद्गम जल से है इसलिए वह नीरज, जलज, सलिलज, वारिज, अम्बुज, तोयज, पानिज, आबज, अब्ज है. जल का आगर नदी, समुद्र, तालाब हैं... अतः कमल सिंधुज, उदधिज, पयोधिज, नदिज, सागरज, निर्झरज, सरोवरज, तालज भी है. जल के तल में मिट्टी है, वहीं जल और मिट्टी में मेल से कीचड़ या पंक में कमल का बीज जड़ जमता है इसलिए कमल को पंकज कहा जाता है. पंक की मूल वृत्ति मलिनता है किन्तु कमल के सत्संग में वह विमलता का कारक हो जाता है. क्षीरसागर में उत्पन्न होने से वह क्षीरज है. इसका क्षीर (मिष्ठान्न खीर) से कोई लेना-देना नहीं है. श्री (लक्ष्मी) तथा विष्णु की हथेली तथा तलवों की लालिमा से रंग मिलने के कारण रक्त कमल हरि कर, हरि पद, श्री कर, श्री पद भी कहा जाता किन्तु अन्य कमलों को यह विशेषण नहीं दिया जा सकता. पद्मजा लक्ष्मी के हाथ, पैर, आँखें तथा सकल काया कमल सदृश कही गयी है. पद्माक्षी, कमलाक्षी या कमलनयना के नेत्र गुलाबी भी हो सकते हैं, नीले भी. सीता तथा द्रौपदी के नेत्र क्रमशः गुलाबी व् नीले कहे गए हैं और दोनों को पद्माक्षी, कमलाक्षी या कमलनयना विशेषण दिए गये हैं. करकमल और चरणकमल विशेषण करपल्लव तथा पदपल्लव की लालिमा व् कोमलता को लक्ष्य कर कहा जाना चाहिए किन्तु आजकल चाटुकार कठोर-काले हाथोंवाले लोगों के लिये प्रयोग कर इन विशेषणों की हत्या कर देते हैं. श्री राम, श्री कृष्ण के श्यामल होने पर भी उनके नेत्र नीलकमल तथा कर-पद रक्तता के कारण करकमल-पदकमल कहे गये. रीतिकालिक कवियों को नायिका के अन्गोंपांगों के सौष्ठव के प्रतीक रूप में कमल से अधिक उपयुक्त अन्य प्रतीक नहीं लगा. श्वेत कमल से समता रखते चरित्रों को भी कमल से जुड़े विशेषण मिले हैं. मेरे पढ़ने में ब्रम्हकमल, हिमकमल से जुड़े विशेषण नहीं आये... शायद इसका कारण इनका दुर्लभ होना है. इंद्र कमल (चंपा) के रंग चम्पई (श्वेत-पीत का मिश्रण) से जुड़े विशेषण नायिकाओं के लिये गर्व के प्रतीक हैं किन्तु पुरुष को मिलें तो निर्बलता, अक्षमता, नपुंसकता या पाण्डुरोग (पीलिया ) इंगित करते हैं. कुंती तथा कर्ण के पैर कोमलता तथा गुलाबीपन में साम्यता रखते थे तथा इस आधार पर ही परित्यक्त पुत्र कर्ण को रणांगन में अर्जुन के सामने देख-पहचानकर वे बेसुध हो गयी थीं. 

* दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

6 जुल॰ 2010

कृति चर्चा: चुटकी-चुटकी चाँदनी : दोहा की मन्दाकिनी चर्चाकार : संजीव वर्मा 'सलिल'

कृति चर्चा: 
चुटकी-चुटकी चाँदनी : दोहा की मन्दाकिनी
चर्चाकार : संजीव वर्मा 'सलिल' 
*
कृति विवरण : चुटकी-चुटकी चाँदनी, दोहा संग्रह, चन्द्रसेन 'विराट', आकार डिमाई, सलिल्ड, बहुरंगी आवरण, पृष्ठ १५६, समान्तर प्रकाशन, तराना, उज्जैन, म.प्र. 
*

हिंदी ही नहीं विश्व वांग्मय के समयजयी छंद दोहा को सिद्ध करना किसी भी कवि के लिये टेढ़ी खीर है. आधुनिक युग के जायसी विराट जी ने १२ गीत संग्रहों, १० गजल संग्रहों, ३ मुक्तक संग्रहों तथा ६ सम्पादित काव्य संग्रहों के प्रकाशन के बाद प्रथम प्रयास में ही दोहा को न केवल सिद्ध करने में सफलता पाई है अपितु अपने यशस्वी कृतित्व को भी एक नया आयाम दिया है. विराट ने प्रत्यहम दोहा संग्रह में पद-पद पर, चरण-चरण पर प्रमाणित किया है कि वे केवल नागरिकी संरचनाओं को मूर्त रूप देने में दक्ष नहीं हैं अपितु अपनी मानस-सृष्टि में अक्षर-शब्द, भाव-रस, बिम्ब-प्रतीक, अलंकार-शैली तथा प्रांजलता-मौलिकता के पञ्च तत्वों से द्विपदी रचने की तकनीक में भी प्रवीण हैं. 

हिंदी की चिरपुरातन-नित नवीन छांदस काव्य परंपरा के ध्वजवाहक विराट ने इस छोटे छंद को बड़ी उम्र में रचकर यह अनकहा सन्देश दिया है कि न्यूनतम में अधिकतम या गागर में सागर को समाहित करने की कला तथा तकनीक परिपक्व चिंतन, उन्मुक्त मनन, लयबद्ध सृजन, सानुपातिक गठन तथा अभिनव कहन के समन्वित-संतुलित समन्वय-समायोजन से ही सिद्ध होती है. अपेक्षाकृत लम्बे गीतों-ग़ज़लों, मुक्तकों के बाद दोहों पर हाथ आजमाकर विराट ने 'प्रभुता से लघुता भली, प्रभुता से प्रभु दूर. चीटी ले शक्कर चली, हाथी के सिर दूर.' के चिरंतन सत्य को आत्मार्पित किया है. दोहांचार्य होते हुए भी स्वयं को मात्र छात्र माननेवाले विराट का कवि पानी और प्यास दोनों में जीवन की पूर्णता देखते हैं-

तृषा-तृप्ति का संतुलित, बना रहे अहसास.
जीवन में दोनों मिलें, कुछ पानी कुछ प्यास..

श्रेष्ठ-ज्येष्ठ दोहाकार-समीक्षक डॉ. अनंतराम मिश्र 'अनंत' ने इस दोहा संग्रह की भूमिका में गीति काव्य की अमरता का गुह्य सूत्र उद्घाटित किया है जिसे हर रचनाकार को आत्मसात कर लेना चाहिए- 'रचना में अर्थ की हर पर्त नहीं खोलना चाहिए, पाठक बहुत समर्थ होता है इसलिए कुछ अर्थ ग्रहण उस पर भी छोड़ देना चाहिए. कविता केवल वैचारिक वक्तव्य नहीं होती, उसमें रसोद्रेक के साथ मार्मिक मंतव्य भी होना चाहिए. यदि भाषा, बिम्ब, एवं प्रतीक अद्यतन हों तो यंत्र-व्यस्त जटिल जीवन भी गेय हो जाता है.' 

यह सनातन सत्य नवोदित कवियों विशेषकर छंद को न समझ-लिख पाने के कारण कथ्य-प्रगटीकरण में बाधक मानने का भ्रम पाले छंद-हीन रचनाएँ रचकर अपना और पाठकों का समय नष्ट कर रहे रचनाकारों को आत्मसात कर लेनी चाहिए.

विराट के विराट चिंतन को वामनावातारी दोहों ने गीतों और ग़ज़लों की तुलना में समान दक्षता से अभिव्यक्त किया है. सम सामयिक विसंगतियों पर विराट का शब्द-प्रहार द्रष्टव्य है-

असहज, अकरुण, अतिशयी, आत्यंतिकता ग्रस्त 
अधुनातन नर हो गया, अतियांत्रिक अतिव्यस्त..

भाती सीधी बात कब?, करते लोग विरोध.
वक्र-उक्ति ही मान्य है, व्यंग्य बना युग-बोध..
विराट की संवेदना हरियाली की नृशंस हत्या होते देखकर सिसक उठती है-

चले कुल्हाडी पेड़ पर, कटे मनुज की देह.
रक्त लाल से हो हरा, ऐसा उमड़े स्नेह..

विराट आरोप नहीं लगाते, आक्षेप नहीं करते, उनकी शालीनता और शिष्टता प्रकारांतर से वह सब कह देती है जिसके लये अन्य कवि आक्रामक भाषा और द्वेषवर्धक शब्दों का प्रयोग करते हैं. 

पेड़ काटने का हुआ, साबित यों आरोप.
वर्षा भी बैरन बनी, सूरज का भी कोप..

यहाँ वे किसी व्यक्ति, जीवन शैली या व्यवस्था को कटघरे में खड़े किए बिना ही विडम्बना का शब्द-चित्र उपस्थित कर देते हैं. मनुष्य के दोहरे चहरे और दुरंगा आचरण विराट को व्यथित कर देते हैं-

दिखते कितने सौम्य हैं, कितने सज्जन-नेक.
मगर कुटिल, कपटी, छली, यहाँ एक से एक..

दोहे की दो पंक्तियों में जीवन के दो पक्षों को अभिव्यक्त करने में विराट का सानी नहीं-

अधिक काम पर प्राप्ति कम, क्यों न आ रहा रोष?
इतना भी मिलता किसे, हमको तो संतोष..

विराट का उदात्त जीवन दर्शन असंतोष से संतोष  सृजन करना जानता है. 'अति सर्वत्र वर्जयेत' की उक्ति विराट के दोहे में ढलकर आम आदमी के अधिक निकट आ पाती है, अत्यधिक मीठे में कीड़े पड़ने का सत्य हम जानते ही हैं. विराट कहते हैं -

ज्यादा अच्छाई नहीं, ज्यादा अच्छी बात.
अच्छाई की अधिकता, अच्छाई की मात..

इस संकलन के प्रेमपरक दोहों में विराट की कलम की निखरा-मुखरा छवि पटक के मन को बांधने में समर्थ है. प्रेम के संयोग-वियोग दोनों ही रूपों के प्रवीण पक्षधर विराट पता को असमंजस में डाल देते हैं कि कि वह किसे अधिक प्रभावी माने-

मिलन-क्षणों का दिव्य सुख, मुंदी जा रही आँख.
उड़े जा रहे व्योम में, हम जैसे बिन पाँख..

लगे न, गम था, जब लगे, नहीं लग रहे नैन.
ये तब भी बेचैन थे, ये अब भी बेचैन.. 

यहाँ 'नैन लगने' के मुहावरे का दुहरे अर्थ में प्रयोग और दोनों स्थितियों में समान प्रभाव को दोहे में कह सकना विराट के दोहाकार के कौशल की बानगी है. 

'चुटकी-चुटकी चाँदनी' के हर दोहे की हर पंक्ति मुट्ठी-मुट्ठी धूप लेकर आपके मन-आँगन को उषा की सुनहरी आभा से आलोकित करने में समर्थ है. यह संग्रह विराट के आगामी दोहा-संग्रह की प्रतीक्षा करने के लिये विवश करने में समर्थ है. सारतः 'अल्लाह करे जोरे करम और जियादा' ..
                                                                                                      -दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम
                                 ************************************************

भोपाल गैस त्रासदी : एक शब्द चित्र डॉ. कमल जौहरी डोगरा, भोपाल

भोपाल गैस त्रासदी : एक शब्द चित्र

डॉ. कमल जौहरी डोगरा, भोपाल

*

याद है उन्नीस सौ चौरासी
दो दिसंबर की वह भीषण रात
और तीन दिसम्बर का धुंधला सवेरा
बीत गए जिसके छब्बीस साल.

शीत ऋतु की काली रात वह
गैस त्रासदी के लिये कुख्यात.
बन गयी बिकाऊ खबर
विश्व-नक़्शे पर उभर आया भोपाल.

सहानुभूति-सहायता का समुद्र लहराया
पत्रकारों, छायाकारों की भारी भीड़
नेताओं की दौड़-भाग, गहमा-गहमी
सब उमड़ आये भोपाल में बादलों से.

कुछ देर में छँट गए थे बादल
बिना बरसे उड़ गए हवा में शीघ्र
रह गयी जनता कराहती, दुःख भोगती
अनाथ बच्चे, विधवा नारियाँ बिसूरती.

पुरुष जो बच गए, पुरुषार्थ से हीन
आजीविका कमाने में असमर्थ वे
परिवार बिखरे, कुछ के लापता सदस्य
जो आज तक गुमशुदा सूची में हैं.

कैसी घोर विपत्ति की थी रात?
सड़कों पर भीड़, भागता जन समूह
कहीं भी, कैसे भी भोपाल से
दूर भाग जाने को व्याकुल.

पर दिशाहीन इन मानवों के लिये
मार्गदर्शन देनेवाली वाणी मौन थी.
सरकारी घोषणा न थी कहीं कोई
भेड़ों सी भागती जनता थी सब कहीं.

स्मरण है हम भी भागे थे भीड़ में
आँख जब अचानक खुल गयी थी.
खांसी की तकलीफ से छोड़ा बिस्तर
पहुँचे थे पानी पास, आँख की जलन से.

पीड़ा न कम हो पाई पर किसी तरह
अचानक शोर-गुल सड़क पर सुन
जिज्ञासा-कौतूहल ने उकसाया था
पूछने पर सुना: ''तुम भी भागो.

गैस निकली है कार्बाइड से विषैली.
मर रहे हैं लोग, शहर से दूर जाओ.''
घर में न सवारी थी, न कोई पुरुष ही
केवल एक बालक, विद्यार्थी था.

मृत्यु के भय ने लगा दिये थे पंख
किसी तरह हड़बड़ी में ताला डालकर
भाग लिये थे हम, पैरों पर दौड़ते से
रास्ते पर वाहन भरे थे लोगों से.

कोई न सुन रहा था हमारी गुहार.
लिफ्ट देने की करुण प्रार्थना पुकार
न जगह थी, न समय उनके पास.
थी पीछे मौत, भागना था उससे दूर.

आखिर पैदल ही मीलों चले उस रात
कई और भी लोग थे हमारे साथ
रुके वहाँ जहाँ सो रहे थे निवासी
शरण ली के घर में परिचितों के साथ.

फिर पौ फटी, सूरज उग रहा था.
अफवाहों का घटाटोप भी छंटा.
कोई आया उनके घर, हादसे को देख
शवों, मूर्छितों से पटी सड़कें लाँघकर.

आँखों-देखी का वर्णन कर रहा था
अस्पतालों में पीड़ितों की भीड़
सड़कों पर नेताओं की कुछ जीपें
कितना विषैला प्रभाव था गैस का?

मानव ही नहीं मार्ग और गलियों में थी
गाय, बकरी, मुर्गियों की निर्जीव देहें.
झुलसे पेड़, पत्तियां थी जहर रहीं
मृत्यु की काली छाया सब पर पडी.

हो गया शहर का जीवन गतेहीन
केवल रुदन, कराहें, अस्पतालों में लोग
आवागमन के साधन भी न थे कहीं
न तांगा, न टेम्पो, न कोई बस.

मृतकों को ढो रही थीं सरकारी गाड़ियाँ
या कि एम्बुलेसों में जिंदा बेहोश देहें
स्वयंसेवक व्यस्त थे, मूर्छितों को ढोते.
झुग्गी-झोपडी से निकालते पीड़ितों को.

उधर दान का था दौर चल पड़ा
अस्पतालों में था अम्बर भोजन का.
औषधियाँ भी दान में आने लगीं थीं.
दानियों की भीड़ लगी थी, होड़ सी.

भाग्यशाली थे वे जो बच गये थे.
या कि वे जिन्हें कम क्षति पहुँची थी.
देखने को उत्सुक थे, चिंतित भी
वे ही दानी थे, वे ही सेवा में रत.

उज्जवल पक्ष एक था इस त्रासदी का
सरकारी चिकित्सकों ने किया रात-दिन एक.
भूखे-प्यासे जुटे थे वे बचाने में
पीड़ितों को जीवित मृत्यु-मुख से.

शहर के सब अस्पताल भर गए
बल्कि तम्बू भी तने थे शरण देने हेतु.
नागर में अफवाह थी: पानी, वनस्पति
हवा सब कुछ, हो गया दूषित यहाँ पर.

आतंकित थे लोग, हवा-पानी किस तरह छोड़ें?
सब्जी खाना छोड़ दी थी सभी ने.
सब कुछ अछूत सा हो गया था शहर में
जन-पलायन भी शुरू हो चला था.

कई मोहल्ले सूने हो गए पूरे के पूरे.
ताले लगे हुए थे द्वारों पर, पुराने भोपाल में.
कुत्ते भटक रहे थे भूख से व्याकुल बहुत
वीरान हो गया था शहर का बड़ा हिस्सा.

हमीदिया अस्पताल में देखे थे हमने
कुछ नन्हें बच्चे नर्सों की गोद में
जिनको लेने कोई नर-नारी न आया था.
अब अनाथों की सूची में थे वे लावारिस.

स्कूल-कालेज बंद हो गए अनिश्चय में
पढने, पढ़ानेवाले दम साध घर में बैठे थे.
कुछ के संबंधी चल बसे थे, कुछ खुद पीड़ित थे.
कौन-किसे आदेश देता? जिसकी प्रतीक्षा थी.

दफ्तरों में हाजिरी थी न्यून याकि शून्य.
कुछ तो खुले ही न थे, खोलनेवाला न था.
डाक, तर, टेलीफोन सब बंद हो गये.
बहर के शहरों में दुखी-चिंतित थे संबंधी.

मृत्यु का तांडव नृत्य देखा आँखों से
भोपाल आ गया था काल की चपेट में.
अकाल मौत की छाया मंदर रहे एथी
सब ओर हाहाकार, आशंका और भय था.

ऐसे दिन कभी न देखे थे जीवन में.
कितने प्राणियों को डँस लिया था
कितनों को निर्जीव-अपंग बना था
'युनियन कार्बाइड' के कारखाने ने.

यह कारखाना जो कभी खुला था
सौभाग्य बनकर इस धरती पर
हजारों की आजीविका का साधन बनकर
अधिकारी बन गए थे कुछ  पहुँचवाले.

उनका व्ही. आई. पी. गेस्ट हाउस
शरण देता था बहुतों को कृपा कर
फिर भला कौन जाँच करता उनके
जन-घातक कारनामों की समय पर.

पहले भे एछुत-पुट घटनाएँ हुईं थीं
विधान सभा में उठे प्रश्न, हुई चर्चा
दबा दी गयी आवाज़ सत्य- न्याय की
दफना दी गयीं घटनाएँ फाइलों में.

शासन की यही उपेक्षा भारी पड़ गयी
बन गयी महाकाल के तांडव की वज़ह.
काल-सर्प डँस गया हजारों को भोपाल में
लिख गया इतिहास भयावना-डरावना.

दोषी कोई और, पाप किसी और का
फल भोग निर्दोष नागरिकों ने, भाग गए
ज़िम्मेदार नेता, जन प्रतिनिधि, अधिकारी
बची रही सभी की कुर्सी, की कर्त्तव्य की उपेक्षा.

प्रधानमंत्री ने लगाया फेरा अस्पताल का
दिया आश्वासन पूरी सहायता का, 'की कृपा?'
बोले मुख्यमंत्री, 'सभी साधन हैं यहाँ',
'सफ़ेद झूठ' कह हँसा महाकाल. कौन सुनता?

विदेशों से आये आश्वासन, संवेदनाएँ, राशियाँ
समां गए प्रशासन के भस्मासुरी पेट में,
कट न पाये कष्ट बेबस जनता के आज तक
हो नहीं सका है न्याय, न आशा शेष है न्याय की.

विदेशी पत्रकार लिये कीमती कैमरे
आ धमके अमरीकी वकील, दिलायेंगे न्याय
लुटेरे बाँटेंगे खैरात?, कैसा ढकोसला?
हाय रे मानव! पीड़ितों को दिलासा भी झूठी.

आने लगे शोधकर्ता क्रमवार, पूछते प्रश्न
चिकित्साशास्त्र के विद्यार्थी, कुरेदते घाव
समाजशास्त्र के शोधकर्ता जुटते आँकड़े
किसे चिंता पीड़ितों की?, सभी चाहते तथ्य.

आया ए.आई.एम्. संस्थान करने परीक्षण
परखने 'मिक' का दुष्प्रभाव मनुज शरीर पर
दी होगी कुछ सच्ची-कुछ झूठी रिपोर्ट
जनता तक न पहुँचने दी गयी उसकी भनक.

अखबारी खबर: 'सरकार ने छिपाली रपट.
कैसे और कौन करता प्रकाशन? खुलता झूठ
बेनकाब होता शासन-प्रशासन. हद तो यह
घातक रोगों से घिरे जन को न दी गयी जानकारी.

कौन किसे कब कैसे देगा मार्गदर्शन?
इस विपदा से जूझने का, न जानता था कोई.
अँधेरे में सुई टटोलते से, रोगियों को
सतही स्तर पर दावा दे रहे थे चिकित्सक.

लक्षणों पर आधारित पद्धति से हो रहा था
इलाज साधनहीन सरकारी अस्पतालों में.
चिकित्सकों को भी ज्ञात न था उस वक़्त
कौन से विषैले रासस्याँ मिले थे गैस में.

'कार्बाइड मौन था, सरकार चुप्प, अँधेरा घुप्प.
अधिकारी थे संवेदना शून्य-उदासीन.
लोगों में व्याप्त थी दहशत, दानवी कारखाने से
अब भी बची थी भारी मात्रा में 'मिक' भंडारों में.

किसी भी दिन फ़ैल सकती है विषैली गैस.
वायुमंडल को कर सकती है दूषित.
लौट न पा रहे थे लोग, इसी भय से.
अतः, घोषणा हुई 'ऑपरेशन फेथ' की.

भगोड़ा अर्जुन आया तानकर सीना, बोला:
'वैज्ञानिक करेंगे नष्ट 'मिक को, न हों भयभीत'
न हुआ भरोसा किसी को झूठे-लबार  पर
तिथि तय हुई, फिर भागे लोग जन बचाने.

वह दिन भी आया और निकल गया
शनैः-शनैः हुआ था भय कुछ कम.
पनप रहे थे रोग- घातक, असाध्य, पीड़ादायी
चल रही थी दावा लम्बे समय की.

क्रमशः दम तोड़ रहे थे पीड़ित
मृत्यु दर तीव्रता से बढ़ रही थी.
सरकारी आँकड़े कह रहे थे कुछ और
फिर भी संख्या पहुँची हजारों में.

जो बच भी गए वे कमाने काबिल न थे.
खाँसते-कराहते थे रात-दिन अस्पतालों में.
धरती या खाट पर पड़े कमजोर-कंकाल
भविष्य की फ़िक्र में तिल-तिल घुल रहे थे.

खुले थे कुछ वार्डों में अस्थायी कैम्प.
बँट रहा था अनाज गरीब तबकों में.
कुछ ज़रूरी राशन कुछ को मिला मुफ्त.
ले रहे थे काँपते हाथ, हताश चेहरे, बुझी नज़रें.

धीरे-धीरे आ रही थी गति शहर में
खुले थे दफ्तर, शालाएँ, महाविद्यालय भी.
पर चहल-पहल न थी कहीं, सर्वत्र उदासी
तूफ़ान के बाद की सी शांति फ़ैली थी.

गैस-राहत का दफ्तर खुल गया था'
अधिकारी भी नियुक्त किए गये थे उनमें.
 सक्रिय हो रहे थे वे धीरे-धीरे,
बन रहे थे कानून,निबटने समस्या से..

सरकारी तंत्र चलता है जिस तरह 
समय तो लगना ही था व्यवस्था में,
किन्तु काल कब करता है इन्तिज़ार?
उसकी गति तेज़ थी निगलने की..

यंत्रवत सा सब चलने लगा था.
दिनचर्या चलने लगी पर निर्जीव सी,
लोग आने लगे वापिस, पलायन रुका
बँट रहे थे फार्म 'दावे; के प्रचुरता से..

उस हेतु भी वापिस आ रहे थे लोग
आशा बंध गयी थी कि कुछ होगा अब.
क्षतिपूर्ति का लाभ मिलेगा शीघ्र ही
धंधा-इलाज सब कर सकेंगे जिससे..

किन्तु एक साल बाद ही मिल पाये थे
केवल दो सौ पचास रुपये प्रति माह के.
'अंतरिम राहत' के नाम से, भीख की तरह
अनेक चक्करों और लंबी कतारों के बाद..

बैंकों की शाखाएँ खुलीं फिर तो
भीड़ जब सम्हाली न थी सरकारी तन्त्र से.
दावों की सुनवाई का चला नाटक
न्यायाधीशों की नियुक्ति ने लिये कुछ साल..

कराहती जनता कर रही थी एकत्र
साक्ष्य के लिये चिकित्सा के सबूत.
मृतकों के पोस्टमार्टम की रिपोर्ट
श्मशानों, कब्रिस्तानों के प्रमाण पत्र भी..

बहुत मुश्किल था यह सब जुटाना
कहाँ, किसके पास रखा था सुरक्षित
अशिक्षित जनता कहाँ जानती थी
इंसान से ज्यादा, कागजों का महत्त्व?

बेबस, बीमार, लाचार काट रहे थे चक्कर
न्याय पद्धति जटिल-जानलेवा-समयलेवा.
शासकीय मशीनरी जड़, संवेदना से शून्य.
न्यायाधीश करते कानून का पालन?

कानून जो होता है अंधा और बहरा
भीषणतम त्रासदी कभी कहीं नहीं घटी
इससे उसे क्या सरोकार? उसे चाहिए-
सबूत, आप जिंदा हैं? इसका भी..

कानून की इस प्रक्रिया ने ले लिये
कितने ही वर्ष?, पीड़ितों की दशा
बाद से बदतर हो रही थी प्रति पल
न्याय की आस में तोड़ गए दम कितने ही..

न वकील, न बहस, न तारिख
एक दिन आता कागज़- आइये! लेने मुआवजा
फलां दिन, फलां जगह, फलां समय...
श्रेणीबद्ध कर दिये पीड़ित, क्या पीड़ा भी?

ए, बी, सी, डी... श्रेणी में बाँटा था जिनने
नहीं विदित था उनको भी आधार रहा क्या?
भीषणतम विभीषिका थी यह इस शताब्दी की
इंसानों के साथ मरे पशु-पंछी अगणित..

जीवन भर को बन गए थे लाखों रोगी.
अस्थमा, खांसी, ह्रदय की बीमारियाँ.
नेत्र-ज्योति ही हानि, कैंसर से भयंकर रोग
पल-पुस रहे थे अगणित शरीरों में दिन-रात.

गर्भिणी महिलाएँ, गर्भस्थ शिशु भी
हुए थे दुष्प्रभावित विषैली गैस संक्रमण से.
आजीवन ही नहीं, पीढ़ियों तक रहेगा प्रभाव
हानि का मूल्य आँकना संभव नहीं.

सरकार ने आंकी थी कीमत, बहुत सस्ती
शासन के आकाओं की नज़र में
आदमी की पीड़ा की कीमत
न्यूनतम केवल बीस हज़ार ही थी.

अधिकतम?... कुछ ज्यादा हज़ार...
मृतकों का मुआवजा- लाख रुपये
इंसान की कीमत आंकी गयी जीवित रहते
उपार्जन क्षमता से, आयु से, रुतबे से.

करोड़ों की राशि लेकर बैठी सरकार
अत्यंत कृपण थी उसे पीड़ितों तक पहुँचाने में.
न योग्यता का मूल्य, न विशेषज्ञता का,
न विद्वता का, न त्याग-समर्पण का.

योजनायें बनाती रहीं, चलती रहीं
बरसों तक इलाज़ की, बसाहट की.
रोज़गार देने की, अशक्तों को
निराश्रितों को पेंशन दिलाने की.

खोले गए नए अस्पताल करोंड़ों के
कुछ तो आज तक न हो सके क्रियाशील
कैसी ढील?, कीमती मशीनों में लगी में जंग 
अब भी चल रहा है चक्र लगातार.

आधे-अधूरे मन से हो रहा है यहसब
किसी की सच्ची लगन या रूचि नहीं
नेता है राजनीति और वोटो के खेल में व्यस्त
अधिकारी लाल-फीताशाही के मद में ग्रस्त.

लंबी अंतहीन कहानी, न जाने कब तक चले?
एक और महत्वपूर्ण पक्ष है इस त्रासदी का
हत्यारों को दंड दिलाना भी तो जरूरी था
जो जिम्मेदार थे हजारों प्राणियों की मौत के.

कंपनी के मलिक को न कर गिरफ्तार
भगाया था देश से सुरक्षित, सरकारी यान से
फिर बन कमजोर केस, कई दिनों बाद
कुछ साल चलता रहा, ख़बरें छपती रही.

अंत में किया गया एक समझौता
राष्ट्रीय अस्मिता से, बहुत अपमानजनक ढंग से
केवल कुछ करोड़ रुपयों की राशि देकर
बरी हो गया अपराधी जघन्य अपराध से.

उत्पीड़ितों से कुछ न पूछ गया.
न जाना गया जनमत, वाह रे जनतंत्र.
इस समझौते से साफ़ हो गया कि आज भी
हम दास हैं विदेशी आकाओं के.

उस दिन इस स्वतंत्र देश का सिर नीचा हुआ.
भारतीयों की जान की कीमत कुछ भी नहीं.
भारतीय की हत्या देश में हो या विदेश में
अपराध नहीं बनती, सजा नहीं मिलती
कलंकित हुआ देश दुनिया और भावी पीढ़ियों के सामने.

किसने किया यह अन्यायपूर्ण  समझौता?
व्यक्ति हो सरका... किसने दिया अधिकार?
जनता दण्डित देना चाहती है कंपनी मालिकों को
'एंडरसन' को फाँसी होनी ही चाहिए.

हम दे न सके हत्यारों को सजा कोई.
धनराशि का हुआ भरपूर दुरूपयोग.
चिल्लाते हैं उत्पीडित आज भी
वर्षगाँठ मनती है हर बरस, होती हैं घोषणाएँ.

अब भी कहाँ सुरक्षित है यह शहर?
अब भी दबे हैं विशिले-घातक रसायन
कारखाने की मिट्टी और टैंकरों में.
ला सकते हैं कभी भी प्रलयंकर भूचाल.

भूलते जा रहे हैं वह भीषण रात क्रमशः.
प्रकृति का नियम है भूलो और जिओ
कितु याद न रखा तो- फिर-फिर होंगे हादसे
फिर-फिर होगा अन्याय देश में यहाँ या अन्यत्र.

दास्ताँ लंबी ही पीड़ितों की पीडाओं की
कहाँ तक कही-लिखी जाये?, इस घड़ी
सिर्फ और सिर्फ कलम की श्रृद्धांजलि
मृतकों को, संवेदना पीड़ितों के लिये अशेष.

**********************************************
-दिव्यन्र्म्दा.ब्लागस्पाट.कॉम

1 जुल॰ 2010

मुक्तिका: ज़ख्म कुरेदेंगे.... संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

ज़ख्म कुरेदेंगे....

संजीव 'सलिल'
*

peinture11.jpg

*
ज़ख्म कुरेदेंगे तो पीर सघन होगी.
शोले हैं तो उनके साथ अगन होगी..

छिपे हुए को बाहर लाकर क्या होगा?
रहा छिपा तो पीछे कहीं लगन होगी..

मत उधेड़-बुन को लादो, फुर्सत ओढ़ो.
होंगे बर्तन चार अगर खन-खन होगी..

फूलों के शूलों को हँसकर सहन करो.
वरना भ्रमरों के हाथों में गन होगी..

बीत गया जो रीत गया उसको भूलो.
कब्र न खोदो, कोई याद दफन होगी..

आज हमेशा कल को लेकर आता है.
स्वीकारो वरना कल से अनबन होगी..

नेह नर्मदा 'सलिल' हमेशा बहने दो.
अगर रुकी तो मलिन और उन्मन होगी..

*************************
दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम
Acharya Sanjiv Salil
http://divyanarmada.blogspot.com

कितना असरदार

Free Page Rank Tool

यह ब्लॉग खोजें