कौन हूँ मैं

हिन्दु हूँ
या
मुस्लिम हूँ
मत पूछो,
कहाँ से आया,
कौन हूँ मैं
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बस!
इतना जानूँ
मानवता
धर्म मेरा
है यही
कर्म मेरा
बहता दरिया,
चलती पौन हूँ
मत पूछो,
कहाँ से आया,
कौन हूँ मैं
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दुनिया
एक रंगमंच
तो कलाकार हूँ मैं
धर्म रहित
जात रहित
एक किरदार हूँ मैं
जात के नाम पर
अक्सर
होता मौन हूँ मैं
मत पूछो,
कहाँ से आया,
कौन हूँ मैं
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जिन्दगी
है एक सफर
तो मुसाफिर हूँ मैं
जो छुपता नहीं
धर्म की आढ़ में
वो काफिर हूँ मैं
काट दूँ एकलव्य का अंगूठा
न कोई द्रोण हूँ मैं
मत पूछो,
कहाँ से आया,
कौन हूँ मैं
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पौन-पवन,

4 टिप्‍पणियां:

  1. हिंदू बनेगा न तू मुसलमान बनेगा,
    इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा...

    जय हिंद...

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  2. बहुत सुंदर रचना है आपकी। लिखते रहें।

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  3. बहुत सुन्दर बस एक सच्चा इन्सान है तू। और ये इन्सानियत बनी रहे आशीर्वाद्

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  4. आज अगर कोई सच्चा इंसान बन सके तो इससे बढ़ कर कुछ नही ........... अपने देश की आज ये सबसे बड़ी ज़रूरत है ........ बहुत अच्छा लिखा है .......

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कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!