केवल हिन्दुस्तान के हक़ में दुआ कीजिये

[images.jpg]. अब्दुल और पंडित दीनानाथ के बीच की दोस्ती इत्ती पक़्की है कि उसे अलग करना किसी कौमी फ़सादी के बस की बात नहीं. सब कुछ गोया उसके अल्लाह इसके भगवान ने तय कर दिया हो.  अब्दुल्ल की अम्मी की देह में कैन्सर के जीवाणु का बसेरा है उधर दीनानाथ भी अपनी अभाव ग्रस्त ज़िन्दगी से जूझ रहा था. वे दौनों ही एक पेड़ के नीचे बैठे आपसी चर्चा कर रहे थे कि  अचानक उन पर आकाश की सैर कर रहे  फ़रिश्ते और देवदूत की नज़र पड़ी .दौनों कौतुहल वश पेड़ की शाखा पे बैठ के मित्रों की बातें सुनने लगे. फ़रिश्ता जो अल्लाह का भेजा हुआ था सबसे पहले   प्रगट होकर  अब्दुल्ल से कहता है:- सुनो, तुम आज़ मस्ज़िद में जाकर जो दुआ करोगे कुबूल हो . अब्दुल बोला :- फ़रिश्ते, मेरे दोस्त के लिये भी...! फ़रिश्ता उस बात को सुने बिना ग़ायब हो गया. तभी देवदूत प्रगट हुआ उसने दीनानाथ से कहा:- दु:खी इंसान, आज़ तुम जो मंदिर की मूरत से मांगोगे वो होना अटल है...!



         अनोखे एहसास लेकर दौनो सत्यता के परीक्षण को निकल पढ़े एक मस्ज़िद तो दूसरा मन्दिर गया  दौनों ने अपनी अपनी बात रखी और घर पहुंचे तो अब्दुल की अम्मी की मेडिकल रिपोर्ट लिये खड़ी नफ़ीसा ने बताया:- अब कोई खतरा नहीं . उधर दीनानाथ को घर में सूचना मिली कि  कोर्ट का फ़ैसला उसके हक में आया है.अब उसे पैतृक सम्पत्ती का सत्तर फ़ीसदी हिस्सा मिल जाएगा. जिसमें वो दूकान भी शामिल है जो किसी के बलात कब्ज़े में थी. 
दौनो दोस्त अगले दिन मिले अब्दुल बोला-पंडत, मेरी अम्मी को कैन्सर नहीं है अब ये देख रिपोर्ट. 
वाह- अब्दुल वाह , मेरी ज़ायजाद मुझे वापस मिल गई है. पर ये हुआ कैसे होगा भई...
अब्दुल बोला:-कैंसर तो लाइलाज़ है, मैने तेरी बरक़त की दुआ मांगी थी. 
दीनानाथ:-यार, सच कहूं, मुझे यक़ीन न था कि मुझे ज़ायजाद मिल सकती है सो मैने देवदूत की सलाह पर दुआ मांगी तेरी अम्मी के निरोगी होने की . दोस्तो ठीक है न  तो ठीक है न बस केवल हिन्दुस्तान के हक़ में दुआ कीजिये

3 टिप्‍पणियां:

  1. सलाम दीनानाथ को अब्दुल को प्रणाम,
    कर भला होगा भला, भज अल्लाह,भज राम.

    -- mansoor ali hashmi
    http://aatm-manthan.com

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  2. काश मेरे देश के सारे लोग ऎसा ही सोचे, बहुत सुंदर

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  3. वाह... वाह... गिरीश जी बहुत खूब. सशक्त लघुकथा.

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कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!