bundeli muktika: bhatak rae -sanjiv

बुन्देली मुक्तिका:
बरगद बब्बा
संजीव
*
बरगद बब्बा सिसक रए।
सठिया गए तो ठसक रए।।
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तोंद फुला रए सेठ पसर
पेट श्रमिक खें पिचक रए।।
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पंडत जी उपवास धरे-
ढेर मिठाई गटक रए।।

बेजा  बात बनाउत हैं
कदम न धरते बिचक रए।।
*
अपना-तुपना समय किते
मोंड़ा-मोंडी मटक रए।।
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बऊ-दद्दा खों ठगबे में
नेता  तनक न हिचक रए।।
*
खाली जेब मोबाइल लै
कदम गैल पे भटक रए।।
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कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!