इन ऊंटों पर क्यों बैठूं सुना है इन पर बैठ कर भी कुत्ता काट लेता है कभी कभी !!


दाहिने मुड़िये 
गड्ढे में जाईये 

सड़कों पर लगे संकेतकों को देखिये उनका अनुशरण कीजिये.....
और सीधे.... ऊपर पंहुचिये...
सड़कों पर लगे इनसंकेतकों की असलबयानी मेरे कैमरे की जुबानी... !!
सच है भारत में हम अपने घर और सड़कों पर कितने सुरक्षित हैं ये आप देख ही रहे हैं.. देश किधर जा रहा है ?  कभी सोचा आपने !! शायद सोचा होगा न भी सोचा हो तो कौन सा पहाड़ टूट जाएगा.. 
फ़िर सीधे ऊपर 
संकेतकों की मानें तो हम जिधर जा रहे वो रास्ता सिर्फ़ ऊपर ही जाता है . सच कहूं भारत ही नहीं समूचा विश्व भ्रामक संकेतकों से भ्रमित है..  मैं कोई ट्रेवलाग नहीं लिख रहा हूं मित्रो..! सिर्फ़ एक एहसास शेयर कर रहा हूं.. सच भी ये है कि हम सारे लोग किसी न किसी भ्रामक संकेतक से अत्यधिक प्रभावित हैं. यक़ीनन हर संकेतक सही है यह समझना ही मुश्किल है. जीवन-जात्रा में आप दिन भर टी.वी. पर समाचार देखिये .. आप की आंखों पर अंधेरा तारी होगा. जो एंकर तय करेगा उसे आप सच मानने लगेंगें....कदाचित...!
इन ऊंटों पर क्यों बैठूं
सुना है इन पर बैठ कर
भी कुत्ता काट लेता है
कभी कभी 
       जब लोगों का सारा जीवन-दर्शन, सियासती-तेवर, सामाजिक स्थिति , तंत्र का व्यवस्थापन यानी सब कुछ मीडिया तय करता है. तब  तो बहुत ज़रूरी हो गया है कि मीडिया अपनी इस प्रभावशीलता के साथ साथ न्याशीलता और नैतिकता की ज़िम्मेदारी भी स्वीकारें. कहे गये वाक्यों के शाब्दिक प्रभावों बनाम प्रतिक्रियात्मक आतंक के विस्तारण को भी रोकने की ज़िम्मेदारी भी लेनी होगी अपने सर...!
       मीडिया की ज़वाबदारी सचाई के प्रकटन के साथ साथ विध्वंस रोकने की भी है. टी.आर.पी. के चक्कर में पर बेलगाम होते संवादों पर लगाम लगा कर स्वायत्व-अनुशासन की मिसाल कायम कर सकता है मीडिया .
 चलिये हम कौन होते हैं प्रज़ातंत्र के इस स्तम्भ को सलाह देने वाले पर याद रहे अगर किसी एक उक्ति है.. "अति सर्वत्र वर्जयेत.." क्यों दीपक चौरसिया जी सही कहा न हमने..         

मित्रो आज़कल अपने राम अपने शहर से 145 किलोमीटर दूर जाकर रोटी कमा रहे हैं.. बच्चे पाल रहे हैं. जब अपने शहर आतें हैं शहर से वापस जाते हैं तो रास्ते भर कुछ न कुछ लिखने का अवसर मिल ही जाता है. तीन घंटे की यात्रा में कुछ न कुछ मिल ही जाता कै आपके लिये -
"रास्ते में ऊंट में दिखे सोचा कार से उतरकर ऊंट की सवारी ले लूं.. फ़िर सोचा न न ऐसा न कर पाऊंगा 
इन ऊंटों पर क्यों बैठूं सुना है इन पर बैठ कर  भी कुत्ता काट लेता है  कभी कभी !!

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!