माँ आज से तुमने महायात्रा शुरू की थी..!

#स्मृतियों_गलियारे_से
    आज 28 दिसंबर 2004 है । रात गहरा रही है । वैसे भी मुझे तो दिसंबर का यह माह बहुत डराता है..!  कुछ दिनों पहले ही शायद 2 हफ्ते पहले मां सव्यसाची प्रमिला बिल्लोरे भोपाल चली गई थीं ।  10 दिन तक भंडारी हॉस्पिटल में भर्ती रहने कैंसर से बचाव का कोई रास्ता नहीं निकल रहा था। तय हुआ कि नागपुर या भोपाल में से किसी एक जगह ले जाया जाए और फिर भोपाल डॉ अग्रवाल के पास इलाज के लिए ले जाया गया।

   अक्सर फोन पर यही सूचना मिलती थी अब ठीक हो रहे हैं अब ठीक हो रही हैं । मैं जानता था कि यह मन के संतोष के लिए और उदासी को दूर रखने के लिए सूचनाएं दी जा रही है। होता भी यही है होना भी यही चाहिए कि आप हिम्मत ना हारें । खासतौर पर तब जबकि ऐसी कोई स्थिति हो।
वास्तविक स्थिति यह थी कि मां जबलपुर में सबसे मिल चुकी थीं । वह मिलना चाहती थी अपने भाइयों से यानी मेरे मामा परिवार से उन बच्चों से जो अक्सर माँ को खास नजरिए से देखते थे अंतहीन प्यार बिखेरने वाली मेरी कई चचेरे भाई बहन की भोपाल में ही रहते हैं । बहुत खुश थी जब उनको भोपाल इलाज के लिए ले जाने की बात तय हुई ।
और आज की रात चिकित्सकों ने हाथ खड़े कर दिए। वे उन सब से मिल चुकी थीं जिन से मिलना चाहती थीं ।
   उनके स्वप्न संदेश से मेरी धर्मपत्नी को एहसास हुआ कि वह अब पूरी तरह स्वस्थ हो चुकी है पूरा गोल लाल कुमकुम का टीका देवी की तरह देदीप्यमान चेहरा यह उनका अंतिम स्वप्न दर्शन आशीर्वाद के साथ 1 दिन पूर्व सुलभा ने देखा था ।
रात हरीश  एवं सतीश भैया का संदेश मिला
अब तुम लोग जबलपुर से भोपाल के लिए निकल आओ। संदेश स्पष्ट था।
  बेचैनी भरी रात जागते जागते कटने वाली थी भाइयों ने तय किया कि अब मां को जबलपुर ही लाया जाएगा । यह अलग बात है कि हम रात 12:00 बजे के बाद भोपाल के लिए रवाना होने वाले थे।
गृहस्थ साध्वी मां के बारे में बताया कि वे आखिरी पल तक आत्म चिंतन में तल्लीन थीं । बाबू जी कहते हैं कि निश्चित ही वे या तो मानस पूजा कर रही होंगी या शिव महिमा स्त्रोत। अपने महाप्रस्थान के एक या 2 दिन पूर्व उन्होंने अपना गुरु मंत्र *ॐ श्री राम कृष्ण हरि:* सार्वजनिक कर दिया था .
और आज ही  के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उन्होंने अपनी महा यात्रा प्रारंभ की थी । अभी भी सपनों में आना जाना होता है उनका..! मां श्रेष्ठ होती है कहीं भी हो किसी की भी हो मां मां होती है ।
मुझे कुछ गुलाबों के इंतजाम के लिए कहा गया  इस बार  वह इंतजाम अपने चचेरे भाई स्वर्गीय शरद बिल्लोरे को सौंप दिया । 28 दिसंबर का यह समय लगभग 2:00 का समय था पार्थिव देह गोद में लेकर आँगन में प्रवेश करते सतीश भैया ने जो कहा - हम बचा न सके..! अन्तस् में पीढ़ा की लकीरों का नुकीले पेन से कैसे खिंचता है यह समझ तो थी अर्थ आज समझ पाया । 
आंतरिक चैतन्य की प्रणेता मां को शत-शत नमन ।
माँ तुम जहां भी होगी वहाँ  ईश्वर का सानिध्य ही होगा । तुम्हारी गर्भ में हम छह भाई बहन खुद को पावन होने का सुख प्राप्त कर चुके हैं। मां तुम..! विराट थीं ऐसा महसूस होता है । यह मैं नहीं कह रहा हूं हम सब महसूस करते हैं। और जिसने भी आपका सानिध्य पाया है वह भी यही कहता है यही मानता है और यही जानता है । मां सूक्ष्म में विराट का अनुभव करा देना तुम्हारे लिए बाएं हाथ का खेल हुआ करता था।
  अब जब तुम साथ में नहीं हो तब तुम्हारे विचार गुरु विचार की तरह सब के मस्तिष्क में उभर उभर कर आते हैं।
शत शत नमन माँ...!
समस्त परिवार

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कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!