" स्वामी विवेकानंद और वर्तमान युवा भारत के युवा.. !"



( देश के युवाओं के नाम लेखक का खुला खत.....!)
प्रति
युवा साथियों
               वंदे मातरम
    युवा दिवस पर युवकों को हार्दिक शुभकामनाओं के साथ  सकेतक मित्र बनकर कहना चाहता हूं कि- "विवेकानंद वाणी विलास का विषय नहीं हैं।"
     विवेकानंद एक समर्थ युवा की परिभाषा के रूप में समझे जाने चाहिए। वर्तमान में युवक अपने बड़ों से अच्छी बातें अभिव्यक्त करना सीख चुके हैं परंतु यदि आप उनसे पूछिए कि आप का अंतिम लक्ष्य क्या है आप इस दौर के युवाओं से केवल महत्वाकांक्षा की पूर्ति का लक्ष्य बता देंगे। विवेकानंद ने भी यही तो किया था लेकिन उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षा को भारतीय जन जन की महत्वाकांक्षा की रूप में प्रदर्शित करने का सफल प्रयास किया।
यही सनातन का मूल तत्व है। और इस मूल तत्व को समझे बिना सनातन को समझा नहीं जा सकता। युवा मूर्ति के सामने नतमस्तक होता है यह हमारा लौकिक कर्तव्य है। परंतु युवाओं ध्यान रखो तुम्हारा एक और कर्तव्य है भारत को आगे ले जाना।
       युवाओं में अक्सर एक कमी साफ तौर पर नजर आती है और वह है अध्ययन एवं आत्मा अन्वेषण की कमी। क्योंकि स्वामी विवेकानंद ने कहा था- "गर्व से कहो कि हम हिंदू हैं..!" इस कारण से जरूरी है कि हमें अपने आधार को पहचान लेना चाहिए। आप अगर केवल पॉलीटिकल नजरिए से भारत को देखेंगे तो भारत में बहुत सारी कमियां सहज नजर आएंगी। यह नजरिया न केवल पॉलिटिकल है बल्कि वामपंथ ने तो इस दृष्टिकोण को कदाचित सौंठ, खारख, और जायफल वाली घुट्टी में जिसके पिला दिया है। और घुटी पीने के फल स्वरुप जो वातावरण निर्मित हुआ है वह सनातन के विरुद्ध है।
   जबकि आचार्य नरेंद्र ने ना केवल धर्म संसद में बल्कि भारत लौट कर भी सनातनी व्यवस्था के आधार का विश्लेषण कर दिया था।
भारतीय दर्शन को हम दो भागों में विभक्त करते हैं एक है जीवन दर्शन दूसरा अध्यात्मिक दर्शन मेरे मित्र समीर शर्मा अक्सर इसको लेकर बेहद संवेदी होते हैं वह हमेशा जीवन दर्शन और अध्यात्मिक दर्शन दोनों की शुद्धता और शुचिता पर ध्यान देने की बात करते हैं। मेरे मित्र हैं किंतु युवा है समीर जी। दुबई के एक और मित्र भाई रवि मिश्रा जी भी यही कहते हैं। भारत से हजारों किलोमीटर दूर रहकर भी अपने हृदय में भारत को बचाए रखना यह इन जैसे युवाओं मैं देखने को मिलता है। हम अक्सर अपने घरों में विदेश से लौटे अप्रवासी बच्चों को देखते हैं। वे हर बार एक नए रूप में नजर आते हैं। हमें इस बात की कोई आपत्ति नहीं है कि बदलाव ना हो रोजगार के प्रवास के कारण बदलाव होना  स्वाभाविक और सहज है। परंतु व्यक्तित्व का मूल स्वरूप ही बदल जाना ?... चिंता और चिंतन का विषय है। अब आपके सवाल होंगे कि- "हम युवा क्या करें कैसे अपनी संस्कृति से कैसे जुड़े रहें...!
    एक संभावित प्रश्न का उत्तर है कि हमें अपनी प्राचीन ग्रंथों को पढ़ने समझने की जरूरत है। यह आवश्यक नहीं है कि आप पूरे ग्रंथ को मूल स्वरूप में पढ़ें क्योंकि ना तो हमारे पास इतना वक्त है ना ही हममें इन किताबों की भाषा को समझने की क्षमता ही है। एक लेखक के तौर पर बस इतना अनुरोध है कि- भारत की वैदिक साहित्य वेदांत दर्शन तथा दो महाकाव्य क्रम से राम चरित्र मानस एवं श्रीमद भगवत गीता से हमारा काम चल सकता है। और उसकी व्याख्या का सार जब समझ में ना आए तो हमें विवेकानंद के साहित्य जिसका हिंदी और अंग्रेजी में अनुवाद उपलब्ध है पढ़ना उचित होगा। यदि आप इन साहित्य को पढ़ लेते हैं और इसे अपनी चिंतन दीर्घा में स्थापित कर लेते हैं तो निश्चित तौर पर यह मान लीजिए कि आप अपने जीवन में वही परिवर्तन पाएंगे जो स्वामी विवेकानंद ने महसूस किया था। क्योंकि आपको मालूम होगा कि स्वामी विवेकानंद ने अपने कठोर अनुभव के बाद कहा था कि - "वास्तव में तुम "हिन्दू" तभी कहलाओगे जब “हिन्दू" शब्द को सुनके तुम्हारे अंदर बिजली दौड़ जाये.. !"     
     हमें 100 या हजार बुद्धों  की जरूरत अब नहीं है आचार्य रजनीश और बुध की परिकल्पना करते हैं परंतु मैं 100 लोगों के बीच एक विवेकानंद जैसे ही युवा योगी की परिकल्पना दे रहा हूं उन विराम युवा दिवस पर शुभकामनाओं सहित
गिरीश बिल्लोरे

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कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!