माननीय अध्यक्ष महोदय सदन की राय है कि :-“ भारत जैसे विकास शील देशों के लिये राष्ट्र-मण्डल खेल जैसे भारी खेलो का आयोजन करना उचित नहीं…!”
मान्यवर मैं आधार हीन और बेबुनियाद सी सदन की राय को सिरे से ख़ारिज़ करने और खेल महोत्सव की सफ़लता की मुबारक़ बाद देने आज़ आज आप सबके सामने आईं हूं. विषय के पक्षधर साथियों का सोचना सतही है. जबकि मैं “विकासशील भारत के लिये आर्थिक गतिविधियों को गति देने वाले इस खेल महाकुम्भ का पुरजोर समर्थन अर्थशास्त्र की छात्रा होने के कारण भी करती हूं.
* मान्यवर, जहां तक भारत की विकास शीलतता की स्थिति का सवाल है है कोई बुरी स्थिति नहीं है इस देश की. आप हालिया दिनों में विश्व की महामंदी पर गौर कीजिये विश्व के बड़े-बड़े विकसित देशों का अर्थतंत्र छिन्नभिन्न हो रहा था और भारत , जी हां इसी भारत देश ने (जिसे सदन कमज़ोर समझ रहा है ) आर्थिक सुदृढ़्ता दिखाई वो भी अपने आम भारतीयों के बलबूते पर जो कर्म प्रधानता को श्रेष्ट मानतें हैं. जब विश्व का सर्वोच्च सुदृढ़ राष्ट्र अमेरिका रोज़गार के संकंट से निपटने की जुगत लगा रहा था तब भारत में सरकारी-गैर सरकारी संस्थान नौकरीयां दे रहे थे साथ ही साथ वेतन में इज़ाफ़ा हो रहा था. प्रति-व्यक्ति आय, सकल घरेलू उत्पादन, राष्ट्रीय आय के आंकड़ों पर गौर फ़रमाएं पक्षी गण लोकसभा में पेश आर्थिक सर्वे के मुताबिक प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोतरी-वर्ष 2008-09 में प्रति व्यक्ति आय 17,334 रुपये थी जबकि वर्ष 2007-08 में यह 17,097 रुपये थी। देश की अर्थव्यवस्था पर प्रारंभिक चरण में वैश्विक वित्तीय संकट का असर नहीं।वर्ष 2008-09 के दौरान विदेशी प्रत्यक्ष निवेश का प्रवाह बढ़ा। मार्च 2009 के अंत तक विदेशी मुद्रा भंडार में 252 अरब अमेरिकी डॉलर की राशि थी। 16 अक्टूबर 2010 की स्थिति में देश का विदेशी मुद्रा भंडार भंडार 295.79 अरब अमेरीकी डॉलर हो गया। यानी सरकार की कामयाब कोशिशें सफ़ल रहीं. ये विदेशी मुद्रा अगर हमारे खजाने में आतीं हैं तो उससे हमारा अर्थतंत्र मज़बूत होता है , जबकि रिज़र्व बैंक की ताज़ा रिपोर्ट अनुसार भारतीय स्वर्ण भण्डार लगभग 400 टन . और हमारे विद्वान मित्र विकास के इस वेग को देखे बगैर यह कहना कि हम अक्षम हैं एक खेल महोत्सव आयोजित नही कर सकते कोरी नासमझी भरीं बातें नहीं तो और क्या है ?
* आज़ अधिकांश भारतीय युवा अमेरीका जाकर कैरियर बनाना चाहते है जाते भी है. श्रेष्ट भारत का अप्रवासी युवा नाम और धन दौनों विदेश जाकर कमाता है. यदि हमारे खिलाड़ी अपनी माटी में यश और मान अर्जित करतें हैं तो बुराई क्या है..?इससे देश के आर्थिक विकास को दिशा मिल रही है. जाने आप किस गलत फ़हमी का शिकार हैं कि धन का दुरुपयोग हुआ या ऐसे आयोजनों से धन का दुरुपयोग होता है मैं आयोजन के पूर्व की अव्यवस्थाओं पर इस लिये कुछ नहीं कहना चाहती क्योंकि उसे सुधार लिया गया. वैसे सारे मामले में जैसा प्रस्तुत किया गया वो पीत-पत्रकारिता और राजनैतिक स्वार्थ का एक हिस्सा था. आप सबसे मेरा एक विनम्र निवेदन भी है कि :-उन कैंकड़ों की तरह चिंतन मत कीजिये जो एक बिना ढक्कन के बाक्स में रह कर एक दूसरे की टांग खींचते हुए विश्व भ्रमण कर आतें हैं किंतु सम्पूर्ण यात्रा में बाक्स से बाहर उन स्थानों की वास्तविकता नहीं देख पाते क्योंकि बाहर निकल ही नहीं पाते टांग खिचाई के चलते.
आप सोच रहे होंगे कि विकास के अन्य क्षेत्रों में धन का विनियोग (Investment) पर मेरी नज़र नहीं है सो बता दूं कि भारतीय अर्थ व्यवस्था जिसके कारण राज्य सरकारें जनोपयोगी सेवाऒं के देने की गारंटी दे रहीं हैं. इसका उदाहरण ताज़ा मध्य-प्रदेश सरकार है जो इस बात की गारंटी ले ही रही है. कृषि क्षेत्र, चिकित्सा,संचार,जिस क्षेत्र में नज़र डालिये विकास दिख रहा है. बस एक कमी अवश्य है कि हमारा नकारात्मक चिंतन हमें पंगु बना रहा है उसे बदलने की सख़्त ज़रूरत है.
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आशा है शिवानी को आशीर्वाद ज़रूर
देंगे
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