The Partnership : for the protection of human rights in Balochistan and Sindhudesh
मयकदा पास हैं पर बंदिश हैं ही कुछ ऐसी ..... मयकश बादशा है और हम सब दिलजले हैं !!
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विजय के पद्य
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29 अक्टू॰ 2009
ज़िंदगी
दिखाई
दे जाती है
अपने ही
घर के
झरोखे से
छत की मुंडेर
सब्जी बाज़ार
किसी दूकान
गली-पनघट
किसी मोड़ पर
या फ़िर
किसी बाग़ में
मन-भावन
सुमन जैसी
अल्हड़पन की
दहलीज़ को
पार करती
खुशियों भरी
"
ज़िंदगी
"
-०-
- विजय तिवारी " किसलय "
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