पाठक बंधुओं!
वन्दे मातरम.
मैं मूलतः खड़ी बोली हिन्दीभाषी हूँ. देश के विविध भागों में हिन्दी विविध रूपों में बोली जाती है. मेरा प्रयास उन रूपों को समझकर उनमें लिख, पढ़ कर बोलने योग्य होना है. आज मैं आपके साथ निमाड़ी के दोहे बाँटने आया हूँ. इन्हें पढ़ें और समझें. राष्ट्रीय भाषिक एकता के लिए आवश्यक है कि हम अपनी मूल भाषा के साथ अन्य भाषाओँ को जानें. आशा है आप मेरा साथ देंगे. आगे अन्य भाषाओँ-बोलियों की रचनाएँ लेकर आऊँगा.
निमाड़ी दोहा:
संजीव 'सलिल'
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जिनी वाट मंs झाड नी, उनी वांट की छाँव.
नेह मोह ममता लगन, को नारी छे ठाँव..
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घणा लीम को झाड़ छे, न्यारो देस निमाड़.
धुला रंग कपास को, जंगल नदी पहाड़..
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लाल निमाड़ी मिर्च नंs, खूब गिराई गाजs.
पचरंग चूनर सलोणी, अजब अनोखी साजs.
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पेला-काला रंग की, तोर उड़दया डाल.
हरी मूंग-मक्की मिली, गले- दे रही ताल..
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ज्वारी-रोटो-अमाड़ी, भाजी ताकत लावs.
नेह नरमदा मंs नहा, खे चल जीवन-नावs..
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आदमी छे पंण मनुस नी, धन नी पंण धनवान.
पाणी छे पंण मच्छ नी, गाँव छे णी हनमान..
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--- दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम