निमाड़ी दोहा: संजीव 'सलिल'

पाठक बंधुओं!

वन्दे मातरम.

मैं मूलतः खड़ी बोली हिन्दीभाषी हूँ. देश के विविध भागों में हिन्दी विविध रूपों में बोली जाती है. मेरा प्रयास उन रूपों को समझकर उनमें लिख, पढ़ कर बोलने योग्य होना है. आज मैं आपके साथ निमाड़ी के दोहे बाँटने आया हूँ. इन्हें पढ़ें और समझें. राष्ट्रीय भाषिक एकता के लिए आवश्यक है कि हम अपनी मूल भाषा के साथ अन्य भाषाओँ को जानें. आशा है आप मेरा साथ देंगे. आगे अन्य भाषाओँ-बोलियों की रचनाएँ लेकर आऊँगा.

निमाड़ी दोहा:
संजीव 'सलिल'
*
जिनी वाट मंs झाड नी, उनी वांट की छाँव.
नेह मोह ममता लगन, को नारी छे ठाँव..
*
घणा लीम को झाड़ छे, न्यारो देस निमाड़.
धुला रंग कपास को, जंगल नदी पहाड़..
*
लाल निमाड़ी मिर्च नंs, खूब गिराई गाजs.
पचरंग चूनर सलोणी, अजब अनोखी साजs.
*
पेला-काला रंग की, तोर उड़दया डाल.
हरी मूंग-मक्की मिली, गले- दे रही ताल..
*
ज्वारी-रोटो-अमाड़ी, भाजी ताकत लावs.
नेह नरमदा मंs नहा, खे चल जीवन-नावs..
*
आदमी छे पंण मनुस नी, धन नी पंण धनवान.
पाणी छे पंण मच्छ नी, गाँव छे णी हनमान..
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--- दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

6 टिप्‍पणियां:

  1. nimaadi samajh nahin aayi lekin kavitaai poori samajh aayi.........

    isliye meri bhi badhai !

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  2. लोकभाषाओं को समझने के लिए बार-बार पढना पड़ता है. मेरे लिए तो भोजपुरी, निमाड़ी, अवधी सभी अपरिचित हैं पर मैं प्रयास करता हूँ कि इन्हें पढूँ, लिखूं और संभव हो हो तो बोलने का प्रयास करूँ. राष्ट्रीय भाषिक एकता ऐसे ही हो सकती है. आप भी इसमें सहभागी हों.

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  3. भाई गिरीश बिल्लोरे मूलतः निमाड़ के ही हैं. उनसे आग्रह है कि इं दोहों के अर्थ खड़ी बोली हिंदी में कर दें ताकि भाई अलबेला खत्री जी की कठिनाई दूर हो सके.

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  4. निमाड़ी दोहा:

    निमाड़ी दोहों के अर्थ न समझ पाने के कारण पाठकों को हुई असुविधा को देखते हुए दोहों का अर्थ दिया जा रहा है. यदि हर भारतवासी देश के विविध भागों में बोली जा रही भाषा-बोली को समझ सके तो राजनैतिक टकराव के स्थान पर साहित्यिक और सामाजिक एकता बलवती होगी. विवाह या आजीविका हेतु अन्य अंचल में जाने पर परायापन नहीं लगेगा.

    जिनी वाट मंs झाड नी, उनी वांट की छाँव.
    नेह मोह ममता लगन, को नारी छे ठाँव..
    जिस राह में वृक्ष हो वहीं छाँह रहती है. नारी में ही स्नेह, मोह, ममता और लगन का निवास होता है अर्थात नारी से ही स्नेह, मोह, ममता और लगन प्राप्त हो सकती है.
    *
    घणा लीम को झाड़ छे, न्यारो देस निमाड़.
    धौला रंग कपास को, जंगल नदी पहाड़..
    नीम के सघन वृक्ष की तरह मेरा निमाड़ देश भी न्यारा है जिसमें धवल सफ़ेद रंग की कपास (रुई), जंगल, नदी तथा पर्वत शोभ्यमान हैं.
    *
    लाल निमाड़ी मिर्च नंs, खूब गिराई गाजs.
    पचरंग चूनर सलोणी, अजब अनोखी साजs.
    निमाड़ में पैदा होने वाली तीखी सुर्ख लाल मिर्च प्रसिद्ध है. निमाड़ की तीखी लाल मिर्च ने छक्के छुड़ा दिए. पाँच रंगों में सजी सुंदरियों की शोभा ही न्यारी है.
    *
    पेला-काला रंग की, तोर उड़दया डाल.
    हरी मूंग-मक्की मिली, गले- दे रही ताल..
    निमाड़ में नरमदा नदी के किनारे झूमती फसलों को देखकर कवि कहता है पीले रंग की तुअर, काले रंग की उड़द तथा हरे रंग की मूंग और मक्का की फसलें खेतों में ताल दे-देकर नाचती हुई प्रतीत हो रही हैं. *
    ज्वारी-रोटो-अमाड़ी, भाजी ताकत लावs.
    नेह नरमदा मंs नहा, खे चल जीवन-नावs..
    ज्वार की रोटी, अमाड़ी की भाजी खाकर शरीर शक्तिवां होता है. पारस्परिक भाईचारे रूपी नरमदा में रोज नहाकर आनंदपूर्वक ज़िंदगी बिताओ.
    *
    आदमी छे पंण मनुस नी, धन नी पंण धनवान.
    पाणी छे पंण मच्छ नी, गाँव छे णी हनमान..
    यहाँ कवि विरोधाभासों को इंगित करता है. जो आदमी मनुष्य नहीं है वह भी कोई आदमी है. जिसके पास धन नहीं है वह भी धनवान है अर्थात धनवान वास्तव में निर्धन है. जहाँ पानी है पर मछली नहीं है वह व्यर्थ है क्योंकि कुछ न हो तो मछली पकड़-खा कर भूख मिटाई जा सकती है. मछली पानी को स्वच्छ करती है. मछली न होना अर्थात पानी गंदा होना जिसे पिया नहीं जा सकता. अतः वह व्यर्थ है. इसी तरह जिस गाँव में हनुमान जी का मन्दिर न हो वह भी त्याज्य है क्योंकि हनुमान जी सच्चरित्रता, पराक्रम, संयम, त्याग और समर्पण के पर्याय हैं जहाँ वे न हों वहाँ रहना व्यर्थ है.
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    --- दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

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कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!