2 अक्तूबर १८६९ से 2 अक्टूबर 2009 तक गांधी

2 अक्तूबर 1869 से 2 अक्टूबर 2009 तक  
गांधी  एक चिंतन के   सागर  थे  गांधी जी  को केवल  समझाया जाना हमारे लिए एक कष्ट कारक विषय है सच तो यह है की "मोहन दास करम चंद गांधी को " समझाने का साधन बनाने वालों से युग अब अपेक्षा कर रहा है की  वे पहले  खुद  बापू को समझें और फिर लोगों को समझाने की कोशिश करें.  महात्मा गाँधी की  आत्मकथा  के अलावा उनको किसी के सहारे समझने की कोशिश भी केवल बुद्धि का व्यापार माना जा सकता है.इस बात को भी नकारना गलत होगा   गांधीजी - व्यक्ति नहीं, विचार यही उनके बारे में कहा सर्वोच्च सत्य है . 140 बरस बाद भी गांधी जी का महान व्यक्तित्व सब पर हावी है क्या खूबी थी उनमे दृढ़ता की मूर्ती थे बाबू किन्तु अल्पग्य  उनका नाम "मज़बूरी" के साथ जोड़ते तो लगता है की हम कितने कृतघ्न हो गए .


बापू अब एक ऐसे दीप स्तम्भ होकर रह गए हैं जिसके तले  घुप्प तिमिर  में पल रहा है विद्रूप भारत . उसका कारण है कि बापू को जानते तो सब हैं पहचानने वाले कम हीं है. 
मुझे सबसे ज़्यादा आकृष्ट करती है कि बापू के साथ केवल सत्य है जो एक बच्चा बना आगे आगे चल रहा है. सोचिये क्या आज का नेता अफसर,पत्रकार,विधि-विज्ञानी, बापू का ऐसा साथी बनाना चाहता है. कदापि नहीं . 
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आज सबको सिगमेंट में जीने की आदत है कहीं कोई बिहार में कोई महाराष्ट्र में तो कोई छतीसगढ़ में जी रहा है ..... कहीं कोई जाती में तो कोई धर्म में तो कोई वर्ग में ज़िंदा है. मुझे कोई नहीं मिलता "भारत" में जीने वाला.  बताइये बापू किसे साथ रखगें अपने साथ .
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मेरे शहर के पूर्व महापौर गांधी जयंती की पूर्व संध्या पर खबर रटाऊ केबल समाचार को इंटरव्यू दे रहें हैं कि बापू की मूर्ती न लगाए जाने का विरोध बहुत क्रांतिकारी तरीके से करते नज़र आ रहे हैं ............ बापू आपकी "अहिंसा" आपके साथ इन लोगों ने आपकी भस्मी के साथ पवित्र नदियों में विसर्जित कर  दीं हैं .... आपकी सहयात्री दंडिका का दुरुपयोग ये अच्छी तरह से करना सीख गए बापूजी .
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    7 टिप्‍पणियां:

    1. dil ko chhoone wala lekh likhne aur ek durlabh tasweer dikhane ke liye aapka bahut-bahut shukriya.

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    2. गांधी जी को पूरे गांधियन तरीके से याद किया है आपने -शुक्रिया !

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    3. देश के दो लाल...एक सत्य का सिपाही...दूसरा ईमानदारी का पुतला...लेकिन अगर आज गांधी जी होते तो देश की हालत देखकर बस यही कहते...हे राम...दूसरी ओर जय जवान, जय किसान का नारा देने वाले शास्त्री जी भी आज होते तो उन्हें अपना नारा इस रूप मे नज़र आता...सौ मे से 95 बेईमान, फिर भी मेरा भारत महान...

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    4. अच्छा है कि बापू जीवित नही हैं ( नेतागण कहेंगे होते तो भी क्या कर लेते )

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    5. भारत के लाल ' शास्त्री जी ' को जयंती के पावन अवसर पर कोटि - कोटि नमन |

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    6. मुकुल भाई, इस महात्मा को याद करने का इससे बेहतर तरीक़ा और कोई भी नहीं। बहुमूल्य आलेख।

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    कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
    आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
    बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
    दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
    सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!