हरित-क्रांति

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कभी ये अपने देश की धरती

हरी भरी लहराती थी
नदी किनारे ,पर्वत घाटी
पवन सुगंध बहाती थी
अब न मिलती शीतल छाया
वन उपवन हो रहे हैं कम
हरित क्रान्ति का बिगुल बजाएं
आओ सब मिलजुलकर हम ..

- विजय तिवारी " किसलय "

7 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक शब्द मंजूषा
    मिश्र जी का भी सादर अभिवादन

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  2. सही आगाज...जगाये हैं अलख हम भी..पेड़ लगाओ धरा बचाओ..अभियान से.लोगो ब्लॉग पर लगा है.

    किसलय जी को साधुवाद!!

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  3. पर्यावरण पै केन्द्रित आपकै कविता बड़ी
    नीक लागि | अनाज कै महिमा समझत
    हौ, बड़ा उत्तम अहै |
    भइय्या हमरे ब्लाग पै कमेन्ट बुन्देली
    माँ कीन करौ |हमरौ ग्यान बढ़े |
    यक बुन्देली प्रेमी का यक अवधी
    प्रेमी कै सलाम ... ...
    धन्नबाद ...........

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कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!