Vashishtha Narayan Singh

Mr. Siddharth Slathia published 
Story of “Vashishtha Narayan Singh” on facebook 
This picture is of “Vashishtha Narayan Singh” one of the the greatest Mathematician alive. When most of us are striving hard to get a visa for USA this man came back to India in 1972 to serve in academics. The mathematician who challenged works of Great Scientist Albert Einstein needs our attention.
1961: Passed matriculation from Bihar Board
1961: Admitted to the prestigious Science College, Patna
1963: Went to University of California, Berkley to study Mathematics under Prof. John L. Kelley
1963 – 1969: Pursued special MSc in Mathematics.
1969: Got PhD from University of California, Berkley, USA
1969: Joined NASA as an Associate Scientist Professor in Washington DC, USA
1969 – 1972: Remained in NASA
1972: Returned to India
1972: Joined as a Lecturer in Indian Institute of Technology (IIT), Kanpur.
1972 – 1977: Joined as a lecturer in IIT Kanpur, Tata Institute of Fundamental Research (TIFR), Bombay and Indian Statistical Institute (ISI), Kolkata.
1977: shows symptom of Mental illness, Schizophrenia, admitted to the mental hospital at Ranchi, then Bihar, now in Jharkhand.
1977 – 1988:under treatment.
1988- Left home without informing anyone.
1988 – 1992: There was no information about him.
1992-(Feb. Month): He was found in a poor condition in Siwan, Bihar. At Present-Staying at Home,under treatment.
 2013 – Lives in complete anonymity with none to care for him.
Can we learn to respect?
Why do we always fail to respect true geniuses ?
[But many don't know about this extraordinary man because In India, Mathematician live a covert life and are ultimately forgotten because of the ignorance of the Government and the media.
He is neither a celebrity nor a Cricketer !! He is just a poor Ignored Indian Genius who challenged all western Mathematician]
   Please Don't Ignore This, Do #Share It With Others 
…………………….

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दूसरों से जलन की बीमारी : डा. प्रवीण तिवारी

डा. प्रवीण तिवारी का यह आलेख सादर प्रस्तुत है. मुझे बेहद अच्छा लगा शायद आपको भी पसंद आये. श्री तिवारी  ब्लाग है डा. पी. श्रीराम, ( http://drpraveenshriram.blogspot.in ) इस ब्लाग पर बेहद रुचिकर आलेख बड़ी सादगी से लिखे नज़र आएंगे.. 

मैंने हाल ही में एक कंस्ट्रक्शन कंपनी का विज्ञापन देखा। ये विज्ञापन कहता है कि हम आपको ऐसा घर देंगे जिसे देखकर दूसरे जलन करेंगे। आपको याद होगा कुछ ऐसा ही विज्ञापन एक टेलीविजन कंपनी ने भी कई सालों पहले किया था। वैसे देखा जाए तो ये कोई नया पैंतरा नही है आम तौर पर हम इस तरह के पैंतरे मार्केटिंग योजनाओं में देखते रहते हैं। एटवरटाइजर जानते हैं कि आजकल लोगों के दिल में दूसरों के सामने दिखावा करने की और खुद को उत्कृष्ट दिखाकर अपने आसपास के लोगों को जलाने की एक भावना रहती है। वहीं ये भी देखा गया है कि दूसरों की तरक्की और वैभव को देखकर भी कई लोगों में कुंठा का भाव जागृत होता है। अब जरा गंभीरता से विचार कीजिए आखिर ये स्थिती क्यों बनीविचार करने पर जवाब खुद मिल जाएगा लेकिन जो इस बीमारी से बुरी तरह ग्रसित हो चुके हैं वो इस पर विचार करने के बारे में भी सोच नहीं पाएंगे क्योंकि अब इसी तरह से सोचना उनके जीवन का हिस्सा बन चुका है। मनोविज्ञान पर किये गए तमाम शोध बहुत ही स्पष्टता से इस बात को सामने रखते हैं कि लगातार हम जिन बातों को सोचते रहते हैं वही हमारे कर्म में परिवर्तित होती हैं और लगातार हम जिन कर्मों को करते रहते हैं वही हमारे चरित्र में परिवर्तित होता है। यही चरित्र हमारा अस्तित्व बन जाता है और फिर हम जीवन के हर क्षण और हर रण में इसी के हिसाब से अपनी योजनाएं बनाते हैं। आप स्वयं अंदाजा लगा सकते है। जलना और दिखावा करना अगर किसी का चरित्र बन जाए तो ऐसे विकृत चरित्र के साथ वो क्या योजनाएं बनाएगा। दरअसल वैभव का दिखावा और उसकी चाहत दोनों आज की बात नहीं है शायद मानव सभ्यता के विकास के साथ ही इस विकृति का भी प्रादुर्भाव हो गया था। विकृति इसीलिए क्योंकि मानव सभ्यता के विकास से इसका कोई लेना देना नहीं है। दुनिया में जिन अविष्कारों और वैभवपूर्ण चीजों के विकास को आप देखते हैं वो मानव जिज्ञासा और विज्ञान के सतत विकास का नतीजा है। फिर इसका इस्तेमाल बाजार और व्यवसायियों ने किया। बड़ी चालाकी से मानव की इस सामान्य मनोवैज्ञानिक कमजोरी को भुनाया गया जिसमें वह दूसरों से बेहतर दिखना और रहना चाहता है। जरा गंभीरता से विचार कीजिए ऐसा करने से हमें क्या प्राप्त होता है और इससे हमारा और समाज का क्या विकास होता है? पीढ़ी दर पीढ़ी ये परंपरा कुछ इस तरह आगे बढ़ती गई की आज तो ये जीवनचर्या का सामान्य हिस्सा बन चुकी है। इसके बारे में अब सोचने की क्या आवश्यक्ता है। जब इंसान ने धरती से पहली बार चांद तारे देखे होंगे तो आश्चर्य चकित हुआ होगा। फिर उसकी जिज्ञासा पूर्ती के लिए खगोल शास्त्र बना और आज हम बेशक इन तारों के बारे में सबकुछ न जानते हो लेकिन बहुत कुछ तो जानते ही हैं। आज आसमान में झांकते हुए हमें उतना आश्चर्य नहीं होता और ये हमारे लिए सामान्य बात है। इसी तरह मानव सभ्यता के विकास के साथ कई बातें हमारे लिए बहुत सामान्य हो गई और हमने इन पर सोचना छोड़ दिया। अविष्कारों और सुविधाओं के साथ आमतौर पर कई मनोवैज्ञानिक विकृतियां भी हमारे समाज का हिस्सा बनती चली गई और यही वजह है कि आज समाज सुंदर और सुरक्षित के बजाय असुरक्षित ज्यादा लगता है। एक दूसरे के प्रति प्रेम के बजाय ईर्ष्या को ज्यादा भुनाया जाता है। दुनिया की छोड़िए कुछ देर अपने साथ बैठिए और सोचिए कहीं मैं भी तो अनजाने में इस रोग से पीड़ित नही हो गया हूंमन की इस चोरी को पकड़ लें और भविष्य के लिए सतर्क हो जाएं तो हमेशा हमेशा के लिए जलन की बीमारी से मुक्त हो सकते हैं।

आमिर खान साब -यूं तो हमाम में सब नंगे होते हैं पर भारत तुम्हारा हमाम नहीं बर्खुरदार




डिस्क्लैमर
सुधि पाठको.. प्रस्तुत कथा सत्यघटना पर आधारित है.. इसका किसी भी मृत व्यक्ति से अथवा उसकी भटकती आत्मा से कोई सरोकार नहीं. जिन जीवित व्यक्तियों से इसका संबंध है..भी तो कोई संयोग नहीं.. जानबूझकर मैं लिख रहा हूं ताकि सनद रहे वक़्त पर आम आए.. लेखक

             समय समय पर  हथकण्डे बाज़ लोगों की  हरक़तें मंज़र-ए-आम हो जाया करतीं हैं. यक़ीनन लोग अपने किये को अमृत दूसरे के किये को विष्ठा ही मानते हैं. मुझे बेहद पसंद हैं आमिर खान उनकी अदद एक पिक्चर की बरस भर प्रतीक्षा करता हूं . ट्रांजिस्टर से अपनी लाज़ बचाते नज़र आए तो अपनी आस्था के किरचे किरचे मानस में घनीभूत हो गए . हमको लगा गोया हम नंगे फ़िर रहे हैं. अब भाई सल्लू मियां की छोड़ो वो तो सिल्वर स्क्रीन पर न जाने कितने बार बेहूदा दृश्य दिखा चुके हैं. वर्जनाओं के ख़िलाफ़ लामबंद होते ये कलाकार गोया इनके पास मौलिक रचनात्मकता समाप्त प्राय: हो चुकी है. जैसा प्रगतिशील आलोचक कहा करते हैं- "बाबा नागार्जुन के बाद विषय चुक गए हैं." 
         मित्रो, सर्जक को जान लेना चाहिये कि सृजन के विषय समाप्त कदापि नहीं होते. इन नंगों को कालजयी ओर महान कलाकार कहा जाएगा उसकी पुष्टि होगी हज़ारों नज़ीरें पेश की जावेंगी. लोग शोध करेंगे. आदि आदि ... इस सबसे मेरा आपका सबका सरोकार है.. ये वो ज़मात है जिसका दी-ओ-धरम चुक गया है न कि विषय चुके हैं . विषय सदा मौज़ूद थे हैं और रहेंगे भी. आमिर भाई नंगे मत हो ... तुम्हारी अदाकारी से मैं बेहद प्रभावित था पर अब ..आपके इस रूप को देख कर अपने स्नेह से आपको वंचित करते हुए दु:ख हो रहा है. वास्तव में आपको अपनी पब्लिसिटी के लिये ये हथकंडा अपना शोभा नहीं देता. बकौल अशोक बाजपेई 
फूल झरता है 
फूल शब्द नहीं!
बच्चा गेंद उछालता है,
सदियों के पार 
लोकती है उसे एक बच्ची!
बूढ़ा गाता है एक पद्य,
दुहराता है दूसरा बूढ़ा,
भूगोल और इतिहास से परे 
किसी दालान में बैठा हुआ!
न बच्चा रहेगा
न बूढ़ा,
न गेंद, न फूल, न दालान 
रहेंगे फिर भी शब्द 
भाषा एकमात्र अनन्त है! 
आमिर आप बच्चे नहीं हैं ... मेरी बात समझ गए होगें.. न समझो तो भी आप जैसों से अपेक्षा भी क्या करें.. आप को "निशान-ए-पाकिस्तान" से नवाज़ा जाए या कोळ्ड ड्रिंक्स से नहलाया जावे हम तो आम लोग हैं.. हमें क्या.. "यूं तो हमाम में सब नंगे होते हैं पर भारत तुम्हारा हमाम नहीं बर्खुरदार"


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