नेस्तनाबूद कर दो
उस शरीर को जो धर्म के नाम पर आतंक मचाये
रेत के किलों से डहा दो
उन महलों को जहां से
उगतीं हैं धर्मांध पौध...........!
कोई पाप न होगा अगर तुम एक बार बचा लोगे
एक करकरे को
तुम जो नि:शब्द खड़े
धर्म के मामलों पर कुतर्क
सुन लेते हो
तुम जो खिड़कियाँ बंद कर व्यवस्था को गरियाते हो
तुम जो सुबह दफ्तर जाते हो
तुम जो सड़क पर गिरे घायल को
अनदेखा कर निकलते हो...
छोड़ दो ये चमड़ी बचाने की आदत
उठो हुंकारों शंखनाद करो नि:शब्द में शब्द भरो
फहरा दो विश्व में शान्ति का परचम
बहकाने न दो बच्चों के कदम
सिखाओ मानव धर्म
बेशक कठोर हो जाओ जब देश की प्रतिष्ठा को कोई आंच आए
विश्व का अंत करने वाली सोच का सर कुचल दो
शान्ति द्रोहियों को ठीक वैसे ही मारो जैसे
एक बन्दर सांप का सर पकड़ कर तब तक रगड़ रगड़ के मारता है जब तक उसका अंत न हो जाए
कोई अपराध नहीं है साथ दो हौसला दो वीरों को
शपथ लो
अब कोई हेमंत करकरे अकारण न शहीद होगा
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ब्रिगेडियर्स आफ़ जबलपुर ब्रिगेड
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Labels: 26/11, शहीद, हेमंत करकरे
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निर्मला कपिलाजी जिनका चर्चित ब्लॉग वीर बहूटी है पंकज बेंगाणी जी का जिनका ब्लॉग तरकश है ये तो सभी जानतें हैं पर यह नहीं जानतें की आज उन्होंने सभी चिट्ठाकारों को आमंत्रित किया है अब सब तो जा नहीं सकते सो एक दो तीन या चार जितने ट्रक "शुभकामनाएं" आज इनके जन्मदिन आप सबसे एकत्र होंगीं उसके लिए ट्रक चालक जो ब्रिगेडियर भी हैं तैयार हैं तुरंत रवाना करने को ये चालक है {१}: महाशक्ति {२} :बवाल {३} :विजय तिवारी " किसलय " {४} दीपक 'मशाल '
आप शुभकामनाएं लिख कर नीचे कमेन्ट बाक्स में डाल दीजिये ताकि समय रहते आपकी भावनाएं संबंधितों को भेजी जा सकें ........ हमारी जबलपुर-ब्रिगेड उनके प्रति हार्दिक शुभकामाएं व्यक्त करती है।
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स्मृति गीत:
पूज्य मातुश्री स्व. शांतिदेवी की प्रथम बरसी पर-
संजीव 'सलिल'
तुम जाकर भी
गयी नहीं हो...
*
बरस हो गया
तुम्हें न देखा.
मिति न किंचित
स्मृति रेखा.
प्रतिदिन लगता
टेर रही हो.
देर हुई, पथ
हेर रही हो.
गोदी ले
मुझको दुलरातीं.
मैया मेरी
बसी यहीं हो.
तुम जाकर भी
गयी नहीं हो...
*
सच घुटने में
पीर बहुत थी.
लेकिन तुममें
धीर बहुत थी.
डगर-मगर उस
भोर नहाया.
प्रभु को जी भर
भोग लगाया.
खाई न औषधि
धरे कहीं हो.
तुम जाकर भी
गयी नहीं हो...
*
गिरी, कँपा
सारा भू मंडल.
युग सम बीता
पखवाडा-पल.
आँख बोलती
जिव्हा चुप्प थी.
जीवन आशा
हुई गुप्प थी.
नहीं रहीं पर
रहीं यहीं हो
तुम जाकर भी
गयी नहीं हो...
*

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