नवगीत: माटी में- /मिलना परिपाटी... --संजीव 'सलिल'

नवगीत:

संजीव 'सलिल'

काया माटी,
माया माटी,
माटी में-
मिलना परिपाटी...
*
बजा रहे
ढोलक-शहनाई,
होरी,कजरी,
फागें, राई,
सोहर गाते
उमर बिताई.
इमली कभी
चटाई-चाटी...
*
आडम्बर करना
मन भाया.
खुद को खुद से
खुदी छिपाया.
पाया-खोया,
खोया-पाया.
जब भी दूरी
पाई-पाटी...
*
मौज मनाना,
अपना सपना.
नहीं सुहाया
कोई नपना.
निजी हितों की
माला जपना.
'सलिल' न दांतों
रोटी काटी...
*
चाह बहुत पर
राह नहीं है.
डाह बहुत पर
वाह नहीं है.
पर पीड़ा लख
आह नहीं है.
देख सचाई
छाती फाटी...
*
मैं-तुम मिटकर
हम हो पाते.
खुशियाँ मिलतीं
गम खो जाते.
बिन मतलब भी
पलते नाते.
छाया लम्बी
काया नाटी...
*

2 टिप्‍पणियां:

  1. Nice
    चाह बहुत पर
    राह नहीं है.
    डाह बहुत पर
    वाह नहीं है.
    पर पीड़ा लख
    आह नहीं है.
    देख सचाई
    छाती फाटी..

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  2. मैं-तुम मिटकर
    हम हो पाते.
    खुशियाँ मिलतीं
    गम खो जाते.
    बिन मतलब भी
    पलते नाते.
    छाया लम्बी
    काया नाटी...

    अगर ऐसा होता तो अद्भुत होता और यह दुनिया भी बहुत खूबसूरत होती जो की वास्तव में होती कहने की कोई बात नही होती..

    बढ़िया रचना...धन्यवाद

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कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!