माचिस की तीली के ऊपर बिटिया की पलती आग:भाग दो

माचिस की तीली के ऊपर
बिटिया की पलती आग
यौवन की दहलीज़ पे जाके
बनती संज्ञा जलती आग
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जब   विकास  का  घूमा  पहिया 
 तन  पत्तों से ढांप लिया   ...,
 कौन है अपना कौन पराया 
यह सच हमने भांप लिया !
तभी भूख ने दल बनवाये 
उगी मन मन भ्रम की आग !
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कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!