सूत्र :सूत्र::02 सूत्र::03 एवम सूत्र::04 "प्रेम"

 22/09/1960
सूत्र::02 
 दुर्बल व्यक्ति प्रेम नहीं कर सकता और प्रेमी दुर्बल नहीं रह सकता धैर्यवान,बलवान,श्रेष्ठ व्यक्तियों को ही प्रेम का वरदान मिलता है. प्रेम शरणागति नहीं चाहता. 
                              प्रेम स्वयं त्याग करता है. प्रेम के अधिराज्य में शोक,दु:ख,और शिकायत नहीं होती. प्रेम-रसायन विपरीतता और प्रतिकूलता को दिव्य समन्वय में परिवर्तित करता है. प्रेम-व्यापार(वाणिज्य) नहीं, न प्रेम मृत्य है जो सब कुछ छुड़ा लेती है. प्रेम है अनंत का अमृत,जब बरसता है तब अनंत का आदेश देता है, और उस चिरचैतन्य की प्राप्ति का मार्गदर्शक होता है
 23/09/1960
सूत्र::03
वासना नरक है. प्रेम दिव्य भाव है. अपनी पत्नि से प्यार करना है तो वासना से नहीं अपितु भगवति का एक अलौकिक आविर्भाव- इस नाते से अंतर को उत्कट प्रेम-भाव से भरकर देखो, फ़िर उसके साथ जो भी लीला करोगे वो वासना से निवृत्त होगी. उसमें आपको अप्रतिम सुख होगा. आपके स्पर्श मात्र से उसके हृदय,भावना,वृत्ति इनमें परिवर्तन होगा. वह आपकी अनुगामिनी बन जाएगी.आपकी साधना में शक्ति बनेगी. उस पर जो मोह का पटल है , वह निकल जायेगा. आपका गृह आश्रम्बनेगा, आपके पुत्र बटुक, और कन्याएं भैरवी बनेंगीं. आपके मित्र उपासक बनेंगें.
और आपको आपकी साधना इस ब्रह्माण्ड के नि:स्वासओं का अंग बनकर सुगंधित पुष्प की भांति अपने सौरभ को मुखरित करती रहेगी. 
 23/09/1960
सूत्र:: 04
 मन अकारण प्रसन्न रहे . प्रसन्न्ता ही उसका नित्य भाव हो,वही प्रसन्न्ता प्रति मुहूर्त बढ़्ती जावे. प्रत्येक आचार-विचार, और विक्षोभ उसी प्रसन्न्ता को शतगुणित करे. जैसे अग्नि में आहुति-द्रव्य क्षण में अग्नि को प्रज्जवलित कर स्वयम अग्नि बन जाता है. 
    प्रसन्नता ही देवता सानिध्य है. सच्चिदानन्द घन परमात्मा का एक अविछिन्न भाग है. प्रसन्नता से आपके सामर्थ्य का प्रवाह-वेग बढ़ता है. प्रसन्नता  साधना का एकमात्र आधार है. इसलिये प्रसन्न रहो .
      प्रसन्नता प्रेम का सिंहासन है, प्रसन्नता ही प्रेम का आदिम-प्रकाश है. 
                                "प्रेम का एक मात्र प्राण है शुद्धानंद (शुद्ध + आनंद) " 
         

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!