क्या पढूं...?


                  
याद होगा आपको क्या लिखूं नि:बंध पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी साहब बड़े  विचार मग्न थे, और इसी विचार प्रवाह में  डूब कर  बक्शी जी ने लिख मारा एक निबंध ! निबंध क्या सच्चाई थी। लिखने के बाद टोपी टांगने की समस्या खूंटी खोजना भी उनकी है समस्या थी ना ।
   उन्हें  लिखने की समस्या थी मुझे पढ़ने की समस्या है। ज्यादातर किताबों में रेफरेंसेस संदर्भ कई किताबों कई लेख कई सृजन  नहीं होते बल्कि कभी-कभी रेफरल बुक नजर आते हैं तो कभी कभी शब्दकोश से उठाए गए शब्दों का संयोजन लगते हैं। कभी वह डाक्ट्रिन लगते हैं तो कभी दाएं बाएं से किए गए कमिटमेंटस नजर आते हैं। कविताओं की दशा भी यही है। कभी कहीं कदाचित आ जाता है नर्मदा महाकाव्य स्त्रियां घर लौटती है वरना वही सब  जैसा ऊपर बताया है। बुरा मत मानिए कलमकार कई सारी रचनाएं ऐसा लगता है कि बहुत पहले कभी खड़ी हैं वास्तव में ऐसा ही होता है। फिर से शब्द संयोजन बदल जाता है मामला जस का तस परोस देते हैं हमारे कलमकार।  क्या करें गिलहरी और अखरोट का रिश्ता ही ऐसा है !
   फफक फफक के रोया था जब बंटवारे पर ट्रेन टू पाकिस्तान महसूस की थी और दूसरी बार जब कथाकार मित्र गंगा चरण मिश्रा जी ने अपनी कहानी घर आकर पढ़कर सुनाई। याद नहीं आ रहा शायद धर्मयुग अथवा साप्ताहिक हिंदुस्तान में काली आंधी उपन्यास जो कमलेश्वर ने लिखी जी को भी पढ़ कर एक बेचैनी सी महसूस हुई थी। किशोरावस्था से निकलते निकलते पता चला की रोटी भी कमाना है यह अलग बात है कि वह गालियां दे रहा था-" मैं कोई नौकरी नहीं करता" ! खैर छोड़ो नादान है समझ नहीं है अनुदान पर जीना भी एक कला है ।
   बड़ा अजीबोगरीब उत्पन्न हो गया है कोविड-19 के बाद जब टोटल लॉकडाउन हुआ था तब लोग अचानक अद्भुत रूप से पवित्र हो गए थे फिर धीरे-धीरे वही ढाक के तीन पात..!
  कहीं वैचारिक चिंतन में संक्रमण निर्लज्जता तो इतनी कि भाई तिरंगे के समानांतर अपना झंडा लगा आए..!  और कुछ एक उनको जस्टिफाई कर रहे हैं। यकीन कीजिए टोटल लॉकडाउन में मेरे शहर में कोई भूखा नहीं सोया तुम्हारे शहर उसके गांव इसकी बस्ती सब जगह ऐसा ही हुआ था। तो फिर अन्नदाता के लिए संवेदी क्यों नहीं हुई यही जनता कारण वही था भीड़ थी तुम जिसका लाभ कुछ डंडे वाले कुछ झंडे वाले यानी गंदे वाले लोग उठा रहे थे और तुम समझ ना सके अन्नदाता समझो।
   समाज वही स्वीकारेगा जो एकात्मता का गीत होगा। आयातित विचारधारा नहीं सिखाती।
   पता नहीं इतना साहित्य बिखरा हुआ है भारत के वातावरण में कहानी लिख लो कविता रच लो, निबंध लिख लो पर कई लोगों का कंटेंट आयातित क्यों है ? समझ में नहीं आ रहा...!
    अभिज्ञान शाकुंतलम् और हैमलेट में  अंतर क्या है ?
     अभी तो कुमारसंभव की बात ही नहीं कर रहा चलो करता भी नहीं ।
    अब तो मैंने तय कर दिया है कि-"आंखों तुम केवल हिस्ट्री पढ़ो..!
  हिस्ट्री है कि टाइमलाइन सेट नहीं कर पा रही लिखने में मिस्टेक हो गई किस सोच समझकर यह लिखा गया-" श्री राम कृष्ण केवल कपोल कल्पनाएं हैं ।
   अब यह वाक्य पढ़कर आपको लग रहा होगा कि यह बांए बाजू से उभरा कोई चिंतन है ?
   निश्चित तौर पर यही घोषित कर रहे हैं लोग और जैसे ही अरुण पांडे जी ने भरतमुनि के नाट्य शास्त्र का उल्लेख किया तो समझ में आया की कोई कुछ भी कह ले लेकिन विद्वान अपने जान संदर्भों को अंगीकार कर रहे हैं।
   तो समझ लीजिए कि मैं बात कर रहा हूं मानवतावादी वैश्विक तानेबाने की..! जहां से अनुगुंजित होता है-" वसुधैव कुटुंबकम" का उद्घोष ।
   कल ही किसी मुद्दे पर चर्चा चल रही थी विद्वान मित्र शैलेन्द्र पारे जी ने कहा था -" एकला चलो भी जरूरी है लेकिन सब को लेकर चलना भी जरूरी है...!"
बदलती परिस्थिति में जड़ता को कोई स्थान नहीं है ....  it's a very clear nothing is final truth...! Why you are wasting your time  for final truth...?
    समय बदलता है परिस्थितियां बदलती है कभी-कभी तो स्थितियों के वजह से विज्ञान की प्रतिपादित सिद्धांत भी खंडित हो जाती हैं और हमें चकित कर देते हैं ।
    क्या जरूरत है वैश्विक वैमनस्यता बोने की जरूरत तो यह है कि जो बोया है अगर वह कटीला है तो कांटो को तोड़ दिया जाए कुछ नया उगाया जाए।
   कबीर के बाद कबीर पत्थर के बनाके उन्हें पूजें तो  कबीर हंसेंगे कि बेवजह लिखा था दोहा कि-
पाहन पूजे हरि मिले तो मैं पूजू पहाड़
तासे जा चाकी भली, पीस खाय संसार ।
    कबीर ने जो कहा अपने मदमस्त अंदाज में कहा। कभी की अभिव्यक्ति के संदर्भ को समझना चाहिए ।
    अब के कबीर कमिटेड हैं पक्षपाती भी । मिर्जा गालिब और अनोखे निकले
कह गए -"कहीं ऐसा न कि वाँ ही वही..!
   अब यह देश क़बीरों का नहीं है मिर्जा गालिबों का नहीं है । अब इसमें आयातित विचारधाराएं राज करती हैं ।
वही पढ़ो जो हम पढ़ाएं
वहीं सुनो जो हम सुनाएं ।
जो राग उनने बना के रखी
उसी पे शब्दों को हम सजाएं..?
न वोल्गा से कथा शुरू है
न गंगा के आ रुकी है ।
न चार पाठों की संस्कृति है-
न गीत की गति कभी रुकी है ।।
      अब आप ही बताएं क्या पढ़े और क्या पढ़ाएं। मैं मंदिर इसलिए जाता हूं कि वहां एक शिल्पी में अथक मेहनत कर एक मूर्ति रखी है शिल्पी की आस्था पर मोहित हूँ और मुझे उसकी आस्था पर आस्था है । मैं मुशरिक नहीं हूं इस बात का सर्टिफिकेशन भी नहीं चाहिए । मुझे मेरा आनंद चाहिए वह चाहे अकेले में मिले या मेले में। तो बता दो ना कि मैं क्या पढूँ और क्यों पढूँ..?
द्वैत अद्वैत साकार निरंकार अलौकिक अलौकिक यह सब हमारे फलसफे में है। पर कुछ गिरोह अनावश्यक गुमराह कर रहे हैं।
    चलो तो जब तय करना तब बता देना फिलहाल सोता हूं रात गहरा चुकी है ।
     

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!