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26 जुल॰ 2008

"ये अजीब ब्राह्मण हैं....दहेज़ नहीं लेते ..!"

वर का पिता गाँव के स्नेहियों,परिजनों इष्ट मित्रों के साथ बारात लेकर आता है साथ ही वर पक्ष ग्यारह या तेरह वस्त्र जिसमें पुरूष वस्त्र [जो वधु के छोटे भाई के लिए होतें हैं],स्वर्णाभूषण,सूखे मेवे,ताजे-फल,वधु के लिए सम्पूर्ण श्रृंगार-प्रसाधन, लेकर आता है।
"इतना ही नहीं वर पक्ष आते ही वधु पक्ष के सम्मान का ध्यान भी रखता इस हेतु लाया जाता है गुलाब जल,इत्र,गुलाल,पान-सुपारी,वर का पिता अपने पुत्र,दामाद,बंधू-बांधवों के साथ वधु के परिजनों को सम्मानित करता है "
कुमकुम कन्या जौल्या [सफ़ेद रेशमी साड़ी] में लिपटी दुल्हन के हाथ गंगा जल के समान जल से भरे तांबे के पात्र में जिसे "गंगाल" कहा जाता है वर के हाथ में सौंप देता है वधु का पिता । तब पीला या हलके लाल रंग का अन्तर पट वैदिक मंत्रोच्चार के साथ खोल देतीं है सुवाएं यानी सौभाग्य वतियाँ ......ताम्रपात्र की गंगा की प्रतीकात्मक साक्ष्य में संपन्न होता है "पाणिग्रहण".....!
यानी कुल मिला कर विवाह परम्परा कामोबेश एक ही तरह की होती है। जैसा अन्य भारतीय हिंदू परिवारों में होता है तो "इन इन-ब्राहमणोंविवाह पद्धति" में नया क्या है...?
पाठको , इन ब्राहमणों में ठहराव कर वर बेचना आज भी अपराध है. जब हर जाति में दहेज़ का दावानल कई वधुएँ जला चुका हो इस समाज में इस बुराई को कोई स्थान नहीं है. नारी को इस समाज में दोयम दर्जा नहीं है. यदि दहेज़ है तो उसका स्त्रीधन स्वरुप आज भी बरकरार है.सौभाग्य से मुझे इस जाति में जन्म लेने का अवसर मिला मैं ईश्वर का कृतज्ञ हूँ . नार्मदेय-ब्राहमण-समाज नर्मदा के किनारे बसे ब्राहमण हैं जिनका धर्म सदाचार ही है वरना सभी जानते है मया महा ठगनी हम जानी "
पान तलाई के किसान श्री सुरेश जोषी जी कहतें है:-मुझे लगता है नार्मदेय ब्राहमण समाज जैसी विवाह परम्परा सर्वत्र हो तो सारा भारत स्वर्ग बन जाएगा ।

20 जुल॰ 2008

श्रीयुत काशीनाथ नाथ अमलाथे कृत नर्मदाष्टक विवेचन....!

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संस्कार धानी के वयोवृद्ध श्रीयुत काशीनाथ अमलाथे की कृति नर्मदाष्टक विवेचन एवं गोत्र ऋषि परिचय का लोकार्पण स्वामी सत्य मित्रानंद गिरी जी ने किया

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