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मयकदा पास हैं पर बंदिश हैं ही कुछ ऐसी ..... मयकश बादशा है और हम सब दिलजले हैं !!

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22 दिस॰ 2009

ब्रिगेड के एक नियमित पाठक कवि बसंत मिश्र

Posted by Girish Billore Mukul on दिसंबर 22, 2009 3 टिप्‍पणियां:
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लेबल: परसाई जी, बसंत मिश्र, ब्लाग, हिन्दी, हिन्दी कविता
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