मयकदा पास हैं पर बंदिश हैं ही कुछ ऐसी ..... मयकश बादशा है और हम सब दिलजले हैं !!
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22 दिस॰ 2009
21 मई 2009
अपनी शक्ति के अनुप्रयोग से दूर
तुम जो सरकारें बनाते हो
तुम जो सरकारें सजाते हो
तुम जो जनतंत्र हो
कोई अपराधी नहीं
तो फिर क्यों
अपनी शक्ति के
अनुप्रयोग से दूर थे
तुम्हारा यही निठ्ल्ला-पन
तुमको एक बार फिर गुलाम
बना सकता है
जैसे अभी भी हो
आयातित विचारों के गुलाम
- गिरीश बिल्लोरे"मुकुल"
1 फ़र॰ 2009
सुनो !

"सच....?"
दुनियाँ और आप
एक दूसरे के लिए
"पहेली से हैं "
आप जो दुनियाँ को
अपना चाबुक मारें उसके पहले दुनियाँ
आपको चाबुक जड़ देगी
"झूठ .....!"
जी हाँ
सफ़ेद झूठ
की आप दुनियाँ को चला रहें हैं ...?
हाँ एक बात और
कुत्ता गाड़ी के नीचे रात भर चले
स्वामी भक्ति है
किंतु
बैल की बुराई न बताए कि
वो ही रात भर गाड़ी खींच रहा था ....!!
दुनियाँ और आप
एक दूसरे के लिए
"पहेली से हैं "
आप जो दुनियाँ को
अपना चाबुक मारें उसके पहले दुनियाँ
आपको चाबुक जड़ देगी
"झूठ .....!"
जी हाँ
सफ़ेद झूठ
की आप दुनियाँ को चला रहें हैं ...?
हाँ एक बात और
कुत्ता गाड़ी के नीचे रात भर चले
स्वामी भक्ति है
किंतु
बैल की बुराई न बताए कि
वो ही रात भर गाड़ी खींच रहा था ....!!
13 सित॰ 2008
उड़ानों में व्यस्त हैं।
मन का पंछी
मन का पंछी खोजता ऊँचाइयाँ,
और ऊँची और ऊँची
उड़ानों में व्यस्त हैं।
चेतना संवेदना, आवेश के संत्रास में,
गुमशुदा हैं- चीखों में अनुनाद में।
फ़लसफ़ों का ,
दृढ़ किला भी ध्वस्त है।
मन का पंछी. . .
कब झुका कैसे झुका अज्ञात है,
हृदय केवल प्रीत का निष्णात है।
सुफ़ीयाना, इश्क में अल मस्त है-
मन का पंछी. . .
बाँध सकते हो तो बाँधो,
रोकना चाहो तो रोको,
बँधा पंछी रुका पानी,
मृत मिलेगा मीत सोचा,
उसका साहस और जीवन
इस तरह ही व्यक्त है।।
मन का पंछी. . .
मन का पंछी खोजता ऊँचाइयाँ,
और ऊँची और ऊँची
उड़ानों में व्यस्त हैं।
चेतना संवेदना, आवेश के संत्रास में,
गुमशुदा हैं- चीखों में अनुनाद में।
फ़लसफ़ों का ,
दृढ़ किला भी ध्वस्त है।
मन का पंछी. . .
कब झुका कैसे झुका अज्ञात है,
हृदय केवल प्रीत का निष्णात है।
सुफ़ीयाना, इश्क में अल मस्त है-
मन का पंछी. . .
बाँध सकते हो तो बाँधो,
रोकना चाहो तो रोको,
बँधा पंछी रुका पानी,
मृत मिलेगा मीत सोचा,
उसका साहस और जीवन
इस तरह ही व्यक्त है।।
मन का पंछी. . .
2 सित॰ 2008
जो जिया वो प्रीत थी ,
जो जिया वो प्रीत थी ,अनजिया वो रीत है
शब्द भरम को तोड़ दे ,वोही तो मेरा गीत है
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प्रीत के प्रतीक पुष्प -माल मन है गूंथता
भ्रमर बागवान से -"कहाँ है पुष्प ?" पूछता !
तितलियाँ थीं खोजतीं पराग कण
पुष्प वेणी पे सजा उसी ही क्षण ,!
कहो ये क्या प्रीत है या तितलियों पे जीत है…….?
शब्द भरम को तोड़ दे ,वोही तो मेरा गीत है !
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सुबह,-"सुबह" उदास सी,उठी विकल पलाश सी
चुभ रही थी वो सुबह,ओस हीन घास सी
हाँ उस सुबह की रात का पथ भ्रमित सा मीत है
शब्द भरम को तोड़ दे ,वोही तो मेरा गीत है !
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तभी तो हम हैं हम ज़बाँ को रात में तलाशते
मिल गए तो खुश हुए,मिले न तो उदास से
यही तो जग की रीत है हारने में जीत है
शब्द भरम को तोड़ दे ,वोही तो मेरा गीत है !
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