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22 फ़र॰ 2011

एक कविता: धरती ----- संजीव 'सलिल'

एक कविता
धरती 
संजीव 'सलिल'

*
धरती काम करने
कहीं नहीं जाती
पर वह कभी भी
बेकाम नहीं होती.
बादल बरसता है
चुक जाता है.
सूरज सुलगता है
ढल जाता है.
समंदर गरजता है
बँध जाता है.
पवन चलता है
थम जाता है.
न बरसती है,
न सुलगती है,
न गरजती है,
न चलती है
लेकिन धरती
चुकती, ढलती,
बंधती या थमती नहीं.
धरती जन्म देती है 
सभ्यता को,
धरती जन्म देती है
संस्कृति को.
तभी ज़िंदगी
बंदगी बन पाती है.
धरती कामगार नहीं
कामगारों की माँ होती है.
इसीलिये इंसानियत ही नहीं
भगवानियत भी
उसके पैर धोती है..

**************

4 नव॰ 2010

नरक चौदस / रूप चतुर्दशी पर विशेष रचना: संजीव 'सलिल'

नरक चौदस / रूप चतुर्दशी पर विशेष रचना:                      

संजीव 'सलिल'
*
असुर स्वर्ग को नरक बनाते
उनका मरण बने त्यौहार.
देव सदृश वे नर पुजते जो
दीनों का करते उपकार..
अहम्, मोह, आलस्य, क्रोध,
भय, लोभ, स्वार्थ, हिंसा, छल, दुःख,
परपीड़ा, अधर्म, निर्दयता,
अनाचार दे जिसको सुख..
था बलिष्ठ-अत्याचारी
अधिपतियों से लड़ जाता था.
हरा-मार रानी-कुमारियों को
निज दास बनाता था..
बंदीगृह था नरक सरीखा
नरकासुर पाया था नाम.
कृष्ण लड़े, उसका वधकर
पाया जग-वंदन कीर्ति, सुनाम..
राजमहिषियाँ कृष्णाश्रय में
पटरानी बन हँसी-खिलीं.
कहा 'नरक चौदस' इस तिथि को
जनगण को थी मुक्ति मिली..
नगर-ग्राम, घर-द्वार स्वच्छकर
निर्मल तन-मन कर हरषे.
ऐसा लगा कि स्वर्ग सम्पदा
धराधाम पर खुद बरसे..
'रूप चतुर्दशी' पर्व मनाया
सबने एक साथ मिलकर.
आओ हम भी पर्व मनाएँ
दें प्रकाश दीपक बनकर..
'सलिल' सार्थक जीवन तब ही
जब औरों के कष्ट हरें.
एक-दूजे के सुख-दुःख बाँटें
इस धरती को स्वर्ग करें..

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12 अक्टू॰ 2010

गीत: जीवन तो... संजीव 'सलिल'

गीत:

जीवन तो...

संजीव 'सलिल'
*
जीवन तो कोरा कागज़ है...
*
हाथ न अपने रख खाली तू,
कर मधुवन की रखवाली तू.
कभी कलम ले, कभी तूलिका-
रच दे रचना नव आली तू.

आशीषित कर कहें गुणी जन
वाह... वाह... यह तो दिग्गज है.
जीवन तो कोरा कागज़ है...
*
मत औरों के दोष दिखा रे.
नाहक ही मत सबक सिखा रे.
वही कर रहा और करेगा-
जो विधना ने जहाँ लिखा रे.

वही प्रेरणा-शक्ति सनातन
बाधा-गिरि को करती रज है.
जीवन तो कोरा कागज़ है...
*
तुझे श्रेय दे कार्य कराता.
फिर भी तुझे न क्यों वह भाता?
मुँह में राम, बगल में छूरी-
कैसा पाला उससे नाता?

श्रम-सीकर से जो अभिषेकित
उसके हाथ सफलता-ध्वज है.
जीवन तो कोरा कागज़ है...
*

30 सित॰ 2010

हास्य कविता: कान बनाम नाक संजीव 'सलिल'

हास्य कविता:

कान बनाम नाक

संजीव 'सलिल'
*
शिक्षक खींचे छात्र के साधिकार क्यों कान?
कहा नाक ने- 'मानते क्यों अछूत श्रीमान?
क्यों अछूत श्रीमान, न क्यों कर मुझे खींचते?
क्यों कानों को लाड़-क्रोध से आप मींचते??

शिक्षक बोला- "छात्र की अगर खींच दूँ नाक,
कौन करेगा साफ़ यदि बह आयेगी नाक?
बह आयेगी नाक, नाक पर मक्खी बैठे.
ऊँची नाक हुई नीची, तो हुए फजीते..

नाक एक है कान दो, बहुमत का है राज.
जिसकी संख्या अधिक हो, सजे शीश पर ताज..
सजे शीश पर ताज, सभी संबंध भुनाते.
गधा बाप को और गधे को बाप बताते..

नाक कटे तो प्रतिष्ठा का हो जाता अंत.
कान खिंचे तो सहिष्णुता बढ़ती, बनता संत..
संत बने तो गुरु कहें सारे गुरुघंटाल.
नाक खिंचे तो बंद हो श्वास हाल-बेहाल..

कान ज्ञान को बाहर से भीतर पहुँचाते.
नाक दबा अन्दर की दम बाहर ले आते..
टाँग अड़ा या फँसा मत, खींचेगे सब टाँग.
टाँग खिंची, औंधे गिरा, बिगड़ेगा सब स्वांग..

खींच-खिंचाकर कान, हो गिन्नी बुक में नाम.
'सलिल' सीख कर यह कला, खोले तुरत दुकान..
खोले तुरत दुकान, लपक पेटेंट कराये.
एजेंसी दे-देकर भारी रकम कमाये..

हम भी खींचें जाएँ, दो हमको भी अधिकार.
केश निकालेंगे जुलुस, माँग न हो स्वीकार..
माँग न हो स्वीकार, न तब तक माँग भराएँ.
छोरा-छोरी तंग, किस तरह ब्याह रचाएँ?

साली जीजू को पकड़, खींचेगी जब बाल.
सहनशीलता सिद्ध हो, तब पायें वरमाल..
तब पायें वरमाल, न झोंटा पकड़ युद्ध हो.
बने स्नेह सम्बन्ध, संगिनी शुभ-प्रबुद्ध हो..

विश्वयुद्ध हो गृह में, बाहर खबर न जाए.
कान-केश को खींच, पराक्रम सुमुखि दिखाए..
आँख, गाल ना अधर खिंचाई सुख पा सकते.
कान खिंचाते जो लालू सम हरदम हँसते..

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