तेवरी
संजीव 'सलिल'
पाखंडी झंडे लिये, रहे देश को लूट.
आड़ एकता की लिये, डाल रहे हैं फूट..
सज्जन पर पाबंदियाँ, लुच्चों को है छूट.
तुलसी बाहर फेंक दी, घर में रक्षित बूट..
चमचम-जगमग कलश तो, बिखरे पल में टूट.
नींव नहीं मजबूत यदि, भरी न जी भर कूट..
गुनी अल्प, निर्गुण करें, उन्हें निरंतर हूट.
ठग पुजता है संत सम, सर पर धरकर जूट..
माप श्रेष्ठता का हुआ, मंहगा चश्मा-सूट.
'सलिल' न कोई देखता, किसकी कैसी रूट?.
****************