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17 फ़र॰ 2011

मुक्तिका: तोड़ दिया दर्पण संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

तोड़ दिया दर्पण

संजीव 'सलिल'
*

शाम ढले इस सूने घर में मेला लगता है
मुझको तो ये मुल्क चाट का ठेला लगता है.

खबर चटपटी अख़बारों में रोज छप रही है.
सत्य खोजना सचमुच बहुत झमेला लगता है..

नेता-अफसर-न्यायमूर्ति पर्याय रिश्वतों के.
संसद का हर सत्र यहाँ अलबेला लगता है..

रीति-नीति सरकारों की बिन रीढ़, पिलपिली है.
गटपट का दौना जैसे पँचमेला लगता है..

साया-माया साथ न दे पर साथ निभाते हैं.
भीड़ बहुत, मुश्किल में देश अकेला लगता है..

ज्वर क्रिकेट का चढ़ा सभी को, लाइलाज है मर्ज़.
घूँटी में किरकिट ही खाया-खेला लगता है..

'सलिल'शक्ल बदसूरत देखी, तोड़ दिया दर्पण. 
शंकर भी कंकर माटी का डेला लगता है.

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5 सित॰ 2010

मुक्तिका: शतदल खिले.. संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

शतदल खिले..

संजीव 'सलिल'

*
*
प्रियतम मिले.
शतदल खिले..

खंडहर हुए
संयम किले..

बिसरे सभी
शिकवे-गिले..

जनतंत्र के
लब क्यों सिले?

भटके हुए
हैं काफिले..

कस्बे कहें
खुद को जिले..

छूने चले
पग मंजिलें..

तन तो कुशल
पर मन छिले..

*************

30 मई 2010

मुक्तिका: .....डरे रहे. --संजीव 'सलिल'













मुक्तिका

.....डरे रहे.

संजीव 'सलिल'
*
हम डरे-डरे रहे.
तुम डरे-डरे रहे.

दूरियों को दूर कर
निडर हुए, खरे रहे.

हौसलों के वृक्ष पा
लगन-जल हरे रहे.

रिक्त हुए जोड़कर
बाँटकर भरे रहे.

नष्ट हुए व्यर्थ वे
जो महज धरे रहे.

निज हितों में लीन जो
समझिये मरे रहे.

सार्थक हैं वे 'सलिल'
जो फले-झरे रहे.

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18 जन॰ 2010

तेवरी; पाखंडी झंडे लिये --संजीव 'सलिल'

तेवरी

संजीव 'सलिल'

पाखंडी झंडे लिये, रहे देश को लूट.

आड़ एकता की लिये, डाल रहे हैं फूट..

सज्जन पर पाबंदियाँ, लुच्चों को है छूट.

तुलसी बाहर फेंक दी, घर में रक्षित बूट..

चमचम-जगमग कलश तो, बिखरे पल में टूट.

नींव नहीं मजबूत यदि, भरी न जी भर कूट..

गुनी अल्प, निर्गुण करें, उन्हें निरंतर हूट.

ठग पुजता है संत सम, सर पर धरकर जूट..

माप श्रेष्ठता का हुआ, मंहगा चश्मा-सूट.

'सलिल' न कोई देखता, किसकी कैसी रूट?.

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8 जन॰ 2010

तेवरी: हुए प्यास से सब बेहाल. -संजीव 'सलिल'

तेवरी:

संजीव 'सलिल'


हुए प्यास से सब बेहाल.
सूखे कुएँ नदी सर ताल..

गौ माता को दिया निकाल.
श्वान रहे गोदी में पाल..

चमक-दमक ही हुई वरेण्य.
त्याज्य सादगी की है चाल..

शंकाएँ लीलें विश्वास.
नचा रहे नातों के व्याल..

कमियाँ दूर करेगा कौन?
बने बहाने हैं जब ढाल..

सुन न सके मौन कभी आप.
बजा रहे आज व्यर्थ गाल..

उत्तर मिलते नहीं 'सलिल'.
अनसुलझे नित नए सवाल..

********************
इसे दिव्य नर्मदा में भी पढिए 

2 जन॰ 2010

गीतिका: तुमने कब चाहा दिल दरके? --संजीव वर्मा 'सलिल'

गीतिका

संजीव वर्मा 'सलिल'
*
तुमने कब चाहा दिल दरके?

हुए दिवाने जब दिल-दर के।

जिन पर हमने किया भरोसा

वे निकले सौदाई जर के..

राज अक्ल का नहीं यहाँ पर

ताज हुए हैं आशिक सर के।

नाम न चाहें काम करें चुप

वे ही जिंदा रहते मर के।

परवाजों को कौन नापता?

मुन्सिफ हैं सौदाई पर के।

चाँद सी सूरत घूँघट बादल

तृप्ति मिले जब आँचल सरके.

'सलिल' दर्द सह लेता हँसकर

सहन न होते अँसुआ ढरके।

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29 दिस॰ 2009

गीतिका: वक्त और हालात की बातें --संजीव 'सलिल'

गीतिका
संजीव 'सलिल'

वक्त और हालात की बातें
खालिस शह औ' मात की बातें..

दिलवर सुन ले दिल कहता है .
अनकहनी ज़ज्बात की बातें ..

मिलीं भरोसे को बदले में,
महज दगा-छल-घात की बातें..

दिन वह सुनने से भी डरता
होती हैं जो रात की बातें ..

क़द से बहार जब भी निकलो
मत भूलो औकात की बातें ..

खिदमत ख़ुद की कर लो पहले
तब सोचो खिदमात की बातें ..

'सलिल' मिले दीदार उसी को
जो करता है जात की बातें..
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19 नव॰ 2009

तेवरी के तेवर : दिल ने हरदम चाहे फूल. - संजीव 'सलिल'

दिल ने हरदम चाहे फूल.
पर दिमाग ने बोये शूल..

मेहनतकश को कहें गलत.
अफसर काम न करते भूल..

बहुत दोगली है दुनिया
तनिक न भाते इसे उसूल..

पैर मत पटक नाहक तू
सर जा बैठे उड़कर धूल..

बने तीन के तेरह कब?
डूबा दिया अपना धन मूल..

मँझधारों में विमल 'सलिल'
गंदा करते हम जा कूल..

धरती पर रख पैर जमा
'सलिल' न दिवास्वप्न में झूल..

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14 नव॰ 2009

तेवरी : ताज़ा-ताज़ा दिल के घाव. --संजीव 'सलिल'

तेवरी : संजीव 'सलिल'



ताज़ा-ताज़ा दिल के घाव.
सस्ता हुआ नमक का भाव..

मँझधारों-भँवरों को पार
किया, किनारे डूबी नाव..

सौ चूहे खाने के बाद
हुआ अहिंसा का है चाव..

ताक़तवर के चूम कदम
निर्बल को दिखलाया ताव..

ठण्ड भगाई नेता ने.
जला झोपडी, बना अलाव..

डाकू तस्कर चोर खड़े.
मतदाता क्या करे चुनाव..

नेता रावण जन सीता
कैसे होगा 'सलिल' निभाव?.

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5 नव॰ 2009

तेवरी: मार हथौडा, तोड़ो मूरत. -आचार्य संजीव 'सलिल'

तेवरी

आचार्य संजीव 'सलिल'

मार हथौडा, तोड़ो मूरत.
बदलेगी तब ही यह सूरत..

जिसे रहनुमा मन हमने
करी देश की उसने दुर्गत..

आरक्षित हैं कौए-बगुले
कोयल-राजहंस हैं रुखसत..

तिया सती पर हम रसिया हों.
मन पाले क्यों कुत्सित चाहत?.

खो शहरों की चकाचौंध में
किया गाँव का बेड़ा गारत..

क्षणजीवी सुख मोह रहा है.
रुचे न शाश्वत-दिव्य विरासत..

चलभाषों की चलाचली है.
'सलिल' न कासिद और नहीं ख़त..

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