एक ख़त : नाना पाटेकर के नाम

नाना पाटेकर साहब
सादर अभिवादन
एक की क्या मजाल किसी भी आदमी को हिज़ड़ा बना देता है ये डायलाग अब ख़त्म हो चुका है, मेस्किटो- रैकेट जो सानिया जी के हाथ में है वैसा का वैसा रैकेट खोजा जा चुका है नाना जी जिसमें बिजली के प्रवाह से मच्छर का अन्तिम संस्कार तक सहजता से हो जाता है । और और क्या तुम्हारा डायलाग गलत साबित हो गया।
भाई आदमी ने अपने झूठे दंभ को कायम रखने औरत आदमी,गरीब अमीर , उंचा नीचा, जैसा वर्गीकरण किया है । नपुंसक वो नहीं जो दैहिक रूप से हो हो नपुंसक वो है जो "..............................?" सब जानतें हैं हाँ वही जो कमज़ोर के सामने ताकत दिखाए बलवान के सामने दुम हिलाए .........................

6 टिप्‍पणियां:

  1. कमाल की चिट्ठी है..मुझे लगता है जो पढ़ ली न नाना ने..तो अब तक छप्पन से अब तक सत्तावन हो जायेगी..बहुत ही उम्दा...

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कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!