राम दुआरे तुम रखवारे : नमः शिवाय अरजरिया

राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।

यह हनुमान चालीसा की एकमात्र ऐसी चौपाई है जो द्वैतवाद का समर्थन करती प्रतीत होती है। रखवारे या द्वारपाल का तात्पर्य ही ऐसे व्यक्ति से लिया जाता है, जो दहलीज पर खड़ा हो! जिसका अंतःपुर एवम वर्हिनगर में निर्वाध आवागमन हो। वस्तुतः द्वारपाल होना ही दो जगतों वाह्य एवं आन्तरिक का बोध कराता है, बिल्कुल सांख्य दर्शन के प्रकृति एवं पुरुष की तरह। 

हनुमान चालीसा कि इस चौपाई का शाब्दिक अर्थ है कि, आप राम द्वार के द्वारपाल हैं। आप राम द्वार की रक्षा करते हैं। आपकी आज्ञा के बिना कोई रामद्वार से अंदर प्रवेश नहीं पा सकता। इसका सामान्य अर्थ यह भी है कि आपकी कृपा के बगैर कोई राम की अनुकंपा हासिल नहीं कर सकता। परंतु इस चौपाई का विशिष्ट एवं श्लेषात्मक अर्थ क्या है? आज देवदत्त पटनायक द्वारा प्रणीत मेरी हनुमान चालीसा में जब इस चौपाई का अर्थ अन्वेषण किया तो पाया कि पाश्चात्य विचारकों की तरह पटनायक जी भी इस चौपाई की जड़ें भारतीय जाति व्यवस्था में खोजते हैं। उनका मानना है कि उच्च भारतीय जातियां अपनी पवित्रता, कुलीनता तथा जाति विषयक व्यावसायिक विशिष्टता को बनाए रखने के लिए अपने घर, महल या निवास के बाहर द्वारपाल रखती थी, जो निम्न जातियों को कुलीन लोगों से मिलने से रोकता था या नियंत्रित करता था। परन्तु आम जन से कुलीन शासक का कटाव ना हो इसीलिए ऐसे शासक वर्ष में एक या दो बार रथों पर सवार होकर आम जनों के बीच जाते थे, श्री पटनायक रथयात्रा को इसी का अवशेष बताते हैं। श्री देवदत्त पटनायक द्वारा प्रतिपादित इस तथ्य का जब वाल्मीकि रामायण एवं तुलसीकृत रामचरितमानस के आलोक में परीक्षण किया तो उक्त दोनों ग्रंथों में ऐसा कोई भी उदाहरण देखने को नहीं मिला जिसमें राघवेंद्र किसी निम्न जाति या वर्ण के व्यक्ति से मेल मिलाप में भेद करते हो। प्रभु श्री राम का जीवन तो ऐसे उदात्त उदाहरणों से भरा पड़ा है जिनका आलंबन करने से वर्तमान समाज में पाई जाने वाली जातीय या जनजातीय समस्याओं को समूल नष्ट किया जा सकता है। अहिल्या उद्धार, राम-केवट संवाद, वानर जाति से मित्रता, माता शबरी प्रसंग आदि ऐसे अनेकों कथानक हैं जो प्रतिपादित करते हैं कि भक्तों एवं श्री राम के बीच किसी भी जातीय भेद की बात अनर्गल वितंडवाद से इतर कुछ नही है। यद्यपि कुछ लोग शंबूक वध को लेकर मिथ्यारोपण करते हैं। इस संबंध में मेरा यही अन्वेषण है की मूल रामायण या रामचरितमानस में इसका उल्लेख नहीं है यह आख्यान परिवर्ती साहित्यकारों ने राम के उदार एवं उदात्त चरित्र को लघुतर करने के उद्देश्य से जोड़े हैं।

विशिष्ट एवं श्लेषात्मक अर्थ की खोज श्री पटनायक से इतर यूट्यूब पर कई वीडियो तक जारी रही, अंतर्मन से यही प्रश्न बार-बार प्रकट हो रहे थे कि, 
1-रामद्वार क्या है ?
2-द्वारपाल कौन है? उसमें कौन-कौन से गुण होना चाहिए?
3-पैसारे का क्या तात्पर्य है?

जहां तक मेरा मानना है कि राम द्वार से तात्पर्य ऐसे किसी महल या कुटिया से नहीं है ना ही साकेत स्थित कनक भवन से है जिसके दरवाजे पर द्वारपाल के रूप में दनुजवन कृशानु दशग्रीव का दर्प दमन करने वाले बजरंगबली विराजमान हो। वास्तव में इन सभी आख्यानों के प्रतीकात्मक अर्थ अधिक महत्वपूर्ण हैं- जैसे राम द्वार से तात्पर्य है - सत चित आनंद में प्रवेश का दरवाजा अर्थात राम के गुणों का समूह। यह दशा या लक्षण किसी भी मानव मात्र में उत्पन्न हो सकते हैं। परंतु प्रकृति का स्वभाव ऐसा है कि यहां अगर हृदय रूपी प्रवेश द्वार पर एक और गणनीय सद्गुण प्रवेश हेतु आते हैं तो दूसरी ओर ह्रदय देश में प्रवेश हेतु दुर्गुणों की अगणित भीड़ एकत्रित है। हम ह्रदय देश के द्वार पर खड़े द्वारपाल पर निर्भर हैं कि वह अंतस्थ में सद्गुणों को प्रवेश की इजाजत दे या दुर्गुणों को। वस्तुतः हनुमान जी महाराज द्वारपाल के रूप में सदगुरुदेव की ही भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। गुरु ही है जो साधक के दुर्गुणों को कुम्हार की तरह ठोक ठोक कर दूर करता है तथा उसका साक्षात्कार परम तत्व से कराता है। यही कारण है कि आचार्य शंकर से लेकर कबीरदास जी तक सभी प्रज्ञा वान व्यक्ति गुरु के महत्व को अपने-अपने ढंग से निरूपित या प्रतिपादित करते हैं। कबीर दास जी तो यहां तक कहते है- 

गुरु गोविंद दोऊ खड़े,काके लागुं पांय।
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए ।।

अर्थात साधक के समक्ष अगर भगवान प्रकट हो भी जाएं तो साधक पहचान नहीं पाएगा, पहचान के लिए गुरु एक कसौटी की तरह कार्य करता है। तुलसीदास जी के जीवन में तो इसका प्रत्यक्ष अनुभव रहा है, हनुमान जी सदैव तुलसीदास जी के लिए एक प्रेरक गुरु के रूप में रहे हैं यद्यपि तुलसीदास जी के हृदय में श्री राम को पाने की उत्कट अभिलाषा थी। वह प्रभु दर्शन के लिए बहुत विकल भी रहते थे, लेकिन सम्मुख आने पर भी अपने आराध्य श्री राम को वह पहचान ना पाए। ऐसी दशा में सद्गुरु हनुमान जी ने इशारा कर तुलसीदास जी को अपने आराध्य प्रभु श्रीराम से परिचय कराया।

 चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीर।
 तुलसीदास चंदन घिसे तिलक करे रघुवीर।।

वस्तुतः हनुमान जी महाराज ज्ञान एवं गुणों के सागर हैं, आप अमित बल के स्वामी हैं, अत्यंत चतुर एवं विद्यावान है, तपस्वी हैं और इन सबसे ऊपर समर्पण एवं विनम्रता में वरेण्य हैं। सामान्यतः द्वारपाल में चार गुण होना चाहिए-

-द्वारपाल को प्रथमतः सजग होना चाहिए जिससे कोई अनधिकृत व्यक्ति अंतस्थ में प्रवेश ना पा सके।
-द्वारपाल को बलवान होना चाहिए क्योंकि यदि कोई अनधिकृत प्रवेश की बलपूर्वक चेष्टा करें तो उसे उसी की भाषा में जवाब दिया जा सके।
-द्वारपाल का तीसरा लक्षण विवेकवान होना है
-द्वारपाल का चौथा लक्षण है कि उसे आग्रही होना चाहिए क्योंकि सद्गुण अत्यंत स्वाभिमानी होते हैं बार-बार आग्रह पर ही आमंत्रण स्वीकारते हैं एवं ह्रदयंगम होते हैं। सद्गुरु के रूप में हनुमान जी इन गुणों में सिद्धहस्त हैं। हनुमान जी इतने सजग हैं कि जितने में नाग माता सुरसा अपना मुख वापस पूर्व स्थिति में लाती है तत्समय में वह सुरसा के उदर से वापस भी आ जाते हैं। वह अतुलितबलधामं है उनके हृदय में स्वयं अतुलित बल के स्वामी एवं अतुलित बल की प्रभुताई धारण करने वाले श्री राम सदैव धनुष बाण लेकर निवास करते हैं। मारुतिनंदन के व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषता उनका विवेक ही है। विवेक मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं तन विवेक, मन विवेक, नयन विवेक एवं वाणी विवेक। किसी वृतांत के वर्णन में या आत्मपरिचय के समय हम सम्मुख उपस्थित व्यक्ति या समूह के समक्ष कैसे उठते या बैठते हैं कैसे हाव-भाव बनाते हैं यह तन विवेक है। हमारा परिधान कैसा हो यह भी तन विवेक की परिभाषा में आता है। मन विवेक दूसरे के कल्याण से संबंधित है। नयन विवेक दर्शन एवं आत्मा अवलोकन से संबंधित है। वही वाणी विवेक हमारे प्रभाव को दूसरे पर प्रकट करने में मदद करता है। किस व्यक्ति से किस समय हमें किस भाषा में क्या बोलना है यह वाणी विवेक का विषय है। यदि हमारी माता या पड़ोसी अनपढ़ हैं और हम उनसे आंग्ल भाषा में बातचीत करें तो यह वाणी विवेक के प्रतिकूल है। वस्तुतः प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की सफलता असफलता सामाजिक संबंध वृतांत विवेक पर ही निर्भर है। जब हम मारुतसुत के चरित्र पर विचार करते हैं तो पाते हैं उन्होंने श्री राम से प्रथम परिचय के दौरान ही उन्हें इतना अधिक प्रभावित किया कि, श्रीराम पहले उन्हें मंत्रमुग्ध होकर सुनते ही रहे एवं उनकी वाणी तथा हाव भाव से प्रसन्न होकर उन्हें अपना सचिव बना लिया। श्री राम लक्ष्मण से कहते हैं की- हनुमान ने आत्मपरिचय में भाषा व्याकरण आदि की कोई त्रुटि नहीं की है। कोई भी आदमी जिसने ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद को ठीक ठीक ढंग से ना सीखा पड़ा हो वह कभी ऐसे अच्छे ढंग से बात नहीं कर सकता। यह पक्का मानो कि इन्होंने संपूर्ण व्याकरण का अभ्यास किया है क्योंकि इतनी बातें कहने पर भी इनके मुंह से ऐसी बात नहीं निकली जिस पर टोका जा सके। इतनी देर में इनके मुख, आंख, मष्तिष्क या भौंह से बने हाव-भाव में कोई खोट दिखाई नहीं पड़ी। वह ना रुके, ना हकलाये ना नेत्र चलाएं ना माथे पर सिकुड़न पड़ने दी ना भौंहें तिरछी या बाकी होने दी। इनका स्वर ना बहुत मंद था एवं ना ही बहुत तीव्र। ह्रदय, कण्ठ एवं दिमाग से निकलने वाली इनकी बोली इतनी प्यारी है कि सुनकर प्रत्येक व्यक्ति का हृदय खिल सकता है। ऐसी बातें सुनकर मारने के लिए तलवार उठाए दुश्मन का निर्णय भी परिवर्तित हो जाएगा। हे लक्ष्मण बताओ जिस राजा के पास ऐसा अच्छा कार्य कुशल बुद्धिमान सेवक हो क्या उसका कोई कार्य सधने से रुक सकता है। हनुमानजी इसीलिए सदैव 'सत- चित- आनंद' रूपी परमात्मा श्रीराम के द्वार हृदयस्थल पर विराजमान है।

पैसारे

आचार्य तुलसी पर समकालीन भाषाओं का अत्यंत प्रभाव था। उन्होंने अपने ग्रंथों में ब्रज भाषा, उर्दू भाषा, अवधी भाषा एवं पंजाबी का बहुतायत में प्रयोग किया। इस चौपाई के अंत में वर्णित शब्द पैसारे पंजाबी भाषा से ही लिया गया है। गुरुवाणी में पसर जाने का प्रयोग समर्पण के संदर्भ में किया गया है। गुरु वाणी में लिखा है-

हम कूकर तेरे दरबार ।
भोंकन आगे बदन पसार।।

अर्थात हम तेरे दरबार के कुत्ते हैं जो दीन हीन होकर तेरे आगे भौंकते रहते हैं। इस प्रकार पसर जाना एक ऐसी दशा या अवस्था है जब व्यक्ति संपूर्ण आलंबनों को छोड़कर एकमात्र परम सत्ता के भरोसे स्वयं को छोड़ देता है तभी 'सत- चित- आनंद' रूपी परमात्मा ह्रदय देश में प्रकट होते हैं। इस दशा में साधक मान-सम्मान, यश- अपयश, हानि- लाभ से परे होकर द्रौपदी, प्रहलाद या गजेंद्र की तरह आर्त स्वर में दीन हीन बनकर एकमात्र ईश्वर का आलंबन ग्रहण करता है। इसी दशा में मानव मात्र का राम द्वार से सत चित आनंद रूपी परमात्मा में प्रवेश होता है। क्योंकि इस दरवाजे पर सद्गुरु रूपी रखवाले होना आवश्यक है। हनुमान जी महाराज सदैव ऐसे द्वार की रक्षा के लिए तत्पर हैं। वीर बजरंगबली से मेरी प्रार्थना है की आत्मा के मार्ग के प्रतीकों के लिए सत चित आनंद रूप राम द्वार के दरवाजे आग्रह पूर्वक खुले रखें।
लेखक नमः शिवाय अरजरिया मध्यप्रदेश शासन में संयुक्त कलेक्टर के पद पर पदस्थ हैं

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कँवल ताल में एक अकेला संबंधों की रास खोजता !
आज त्राण फैलाके अपने ,तिनके-तिनके पास रोकता !!
बहता दरिया चुहलबाज़ सा, तिनका तिनका छिना कँवल से !
दौड़ लगा देता है पागल कभी त्राण-मृणाल मसल के !
सबका यूं वो प्रिय सरोज है , उसे दर्द क्या कौन सोचता !!