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10 फ़र॰ 2009

पहल नशा पहला खुमार

इस से आगे बांची जाए



प्रेम-संदेशा, विरहनियों से सुन-सुन उनके हरजाई को भेजते कागा की करतूतें उनसे से कतई कमतर नहीं होतीं.......!!
वनन में बागन में बगर्‌यो बसंत है…">वनन में बागन में बगर्‌यो बसंत है…">01:-वैलेंटाईन - मायने कित्ते बदल गए भैया अब कानपुर के सुकुल जी -काग-कागी प्रेम चित्र छापे अपने दिल में सुईसितार गिटार सब बज गईं अपन नै सफ्फा-सफ्फा कह दओ-" अब देख्यो सुकुल भैया जे जो काग...जी...कागी-भौजी से चूंच लड़ा रए हैं अच्छो लगो मनो साँची बात जा है कै पिछले साल वैलेंटाईन उर्फ़ विलेनटाइम पे कागी-भौजी कोऊ और हथी !!पिछली साल वारी कागी-भौजी को आवेदन हमाए दफ्तर में दाखिल है हम घरेलू हिंसा क़ानून में हमें "संरक्षण-अधिकारी जो बनाओ है "जो भी कागी खों उनके कागा की हरकत अबके वैलेंटाईन पे परेशान करें सो हमाए पास आ जाएँ हम "डोमेस्टिक-इन्सिडेंस-रपट"D.I.R.) तैयार कर दें हैं ।
02:-एक दिन एक प्रेमिका ने प्रेमी हरकतों से तंग आकरसोचा की उसे सबक सिखायाजाए हजूर बस जिद्द पड़ गईसंत
वनन में बागन में बगर्‌यो बसंत है…">वैलेंटाईन दिवस पर बरगी डैम में क्रूज़ पे वहाँ के बाद नरमदा माई के किनारों पे कहीं चौंच लड़ाई जाए । मियाँ मोहब्बत लाल जी ने मित्र के खीसा खलासी ली और बस इश्क की राह पे निकल पडा । डेम पहुंचते क्रूज़ पे सवार हो अपनी ये जोड़ी तिकोना भाग देख-खोज रही थी। जहाँ टाईटैनिकी अंदाज़ में इश्क का इज़हार हो ज़नाब वहाँ उन महाशय की पुरानी प्रेमिका अपनी सखियों के साथ आयीं थी सब से मिल के पुरानी प्रेमिका ने इस जोड़े की वो गत बनाई कि दोनों के सर "इशक का भूत" यूँ गायब हुआ ज्यों कि कभी कभी पेट्रोल पम्प से प्रेट्रोल
03:- अपन भी इश्क से अछूते कहाँ थे कालेज के दिनों में जिस कन्या में अपन महबूबा की क्षवि देखरहे थे एक दिन हमारी घर वो,उनके पापा,मम्मी, मुस्टंडा टाइप का भाई सब आए शायद यही कोईबसंत का महीना था सारे के सारे सपने हमारी भय के मारे काँप रहे थे जिसका अहसास हमारीजिस्म पे भी नज़र रहा हमें लगा कि आज हमारी खैर नहीं ...... जैसे ही माँ-बाबू जी ने उनका भावपूर्ण सम्मान किया उनकी बेटी को स्नेहिल दुलार दिया हमको संभावना नज़र आने लगी बसकनखियों से सुकन्या को निहारते कभी आदर्श पुत्र का एहसास दिलाते माँ-बाबू जी को
कन्या के माता-पिता नें बड़े प्रेम से बाबूजी को सुंदर सा कार्ड देकर कहा :-"ज़रूर आना भैया इकलौतीबिटिया की शादी है फ़िर आप का मार्ग दर्शन ज़रूरी भी है " बेटे तुम तो ज़रूर दो-चार दिन पहले से जाना तुम्हारी छोटी बहन की शादी समझो ....?
उनकी बीवी तपाक से बोली:-समझो क्या है इच्च .....!!



13 अग॰ 2008

इश्क...........लाली और ला........का !



ये इश्क हाय बैठे बिठाए ज़न्नत दिखाए हाँ
सावन की मदिर फुहार से हरियाया पथ तट और यहीं-कहीं एकांत में
थोड़ा रूमानी होने का हक सबको है
फोटो:संतराम चौधरी,

20 दिस॰ 2007

प्रेम ही संसार की नींव है


शुक्र और चांद अचानक नहीं इनका मिलाना तयशुदा था। उस दिन जब चंद्रमा और शुक्र का मिलन तय था और मेरे शहर का आकाश अगरचे बादलों भरा न होया तो इस पल को सब निहारते। कईयों ने तो इसे निहारा भी होगा .....उनके आकाश में बादल जो नहीं हैं ।
प्रेम की परिभाषा भी यहीं कहीं मिलती है ....!
"प्रेम"एक ऐसा भाव है जिसको स्वर,रंग ,शब्द , संकेत, यहाँ तक कि पत्थरों ने भी अभिव्यक्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ी ...... खजुराहो से ताजमहल तक उर्वशी से मोनालिसा तक ,जाने कितनी बातें हैं जो प्रेम के इर्दगिर्द घूमतीं हैं ....!
"सच प्रेम ही संसार कि नींव है "......आसक्ति प्रेम है ही नहीं ! प्रेम तो अहो ! अमृत है ! प्रेम न तो पीड़ा देता है न ही वो रुलाता। आशा और विश्वास का अमिय है ..प्रेम सोंदर्य का मोहताज कभी नहीं हो सकता ...परंतु जब यह अभिव्यक्त होता है तो जन्म लेतें कुमारसंभव जैसे महाकाव्य !! किसी ने क्या ख़ूब कहा -"जिस्म कि बात नहीं ये "
सच !यदि दिल तक जाने कि बात हो तो ....आहिस्ता आहिस्ता जो भाव जन्मता है वोही है प्रेम।
अगर आप सच्चा प्रेम देखना चाहतें हैं ..... एक ऐसी मजदूर माँ को देखिए जो मौका मिलते ही अपने शिशु को अमिय पान करा रही है...क्या आप देख नहीं पा रहे हैं अरे ! इसके लिए आपमें वो भाव होना ज़रूरी जो स्तनपान करते शिशु में है।
अगर इसे आप प्रेम का उदाहरण नहीं माने तो फिर आप को एक बार फिर जन्म लेना ही होगा !
शिवाजी ने सिपाही द्वारा लायी गयी विजित राज्य की महिला को "माँ" कहा तो भारत को एक नयी परिभाषा मिल ही गयी प्रेम की।
मैंने प्रेम को लेकर कहां:-
"इश्क कीजे सरेआम खुलकर कीजे .... भला पूजा भी कोई छिप-छिप के किया करता है "
इसके कितने अर्थ निकालिए निकलते रहेंगे लगातार गुरु देव शुद्धानन्द नाथ ने आपने सूत्र में कहा :-"दुर्बल व्यक्ति प्रेम नहीं कर सकता प्रेमी दुर्बल नहीं हों सकता "

यदि मैं कहूं कि " मुझे कई स्त्रियों से प्रेम है , मुझे कई पुरुषों से प्रेम है तो इसे फ्रायड के नज़रिये से मत देखो भाई। प्रेम के अध्यात्मिक अर्थ की खोज करते-कराते जाने कितने योगी भारत ही नहीं विश्व के कोने कोने में भटकते रहे.......!ग्रंथ लिखे गए "हेरी मैं तो प्रेम दीवानी" गाया गया .... ये इश्क-इश्क है दुहराया गया.... आज रंग है तो मस्त कर देता है फिर भी हम केवल फ्रायड की नज़र से इश्क को जांचते हैं....? ऐसा क्यों है
क्या हम देह से हट के कभी मानस पर मीरा खुसरो को बैठा कर अपने माशूक या माशूका को निहारिए
यही है तत्व ज्ञान है...!
चिट्ठाजगत

कितना असरदार

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