वो
दिव्य चक्षु
नर्मदा तट पर
जब
बिखेरता है
एकतारे की तान !!
स्तब्ध हो जातीं हैं
मन में प्रवाहित वेदनाएं
रुक जातीं थीं
पथचारी की बे परवाह कुंठाएं !!
लौटतीं हैं जब एक तारे की तान
भेडाघाट की संग-ए-मरमर टकरा कर
तब लगता है साक्षात अध्यात्म और सुकून कहीं और नहीं
"यहीं है हाँ यहीं है "